हजारों साल पहले पंजाब और हरियाणा में सदानीरा नदियां बहती थीं, जिनके किनारे मानव बस्तियां और सभ्यताएं विकसित हुई थीं।
भूगर्भीय हलचलों और नदी मार्गों में बदलाव के कारण सतलुज और घग्गर जैसी नदियों का बहाव समय के साथ बदल गया।
शोधकर्ताओं को दिल्ली के उत्तरी इलाकों में 5,000 से 12,000 साल पुराने प्राचीन नदी अवसादों के प्रमाण मिले हैं।
फिरोज शाह तुगलक, शाहजहां और ब्रिटिश शासन के दौरान नहरों के निर्माण ने क्षेत्र की प्राकृतिक जल व्यवस्था प्रभावित की।
प्राचीन नदी मार्गों का अध्ययन आज भूजल संरक्षण, जल प्रबंधन और भविष्य में पानी की कमी से निपटने में मददगार हो सकता
आज पंजाब और हरियाणा के बीच का बड़ा इलाका सूखा और अर्ध-शुष्क नजर आता है। लेकिन हजारों साल पहले यहां नदियां सालभर बहती थीं। इनके किनारे जीवन फलता-फूलता था और बस्तियां बसती थीं। जियोसाइंस फ्रंटियर्स पत्रिका में प्रकाशित एक नए अध्ययन में संकेत मिले हैं कि उत्तर-पश्चिम भारत में कभी एक विशाल सदानीरा नदी तंत्र मौजूद था, जिसका संबंध सतलुज, घग्गर, सरस्वती और यमुना से था। समय के साथ धरती की हलचल, नदियों के रास्ते बदलने और इंसानी हस्तक्षेप ने इस पूरे क्षेत्र की जलधारा की तस्वीर बदल दी।
गुरुग्राम स्थित नॉर्मी रिसर्च फाउंडेशन और दिल्ली विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने घग्गर-सरस्वती-दृषद्वती नदी बेसिन का अध्ययन किया। इसमें भूगर्भीय हलचलों, नदियों के बहाव, प्राचीन नदी मार्गों और ऐतिहासिक नहरों की भूमिका को समझने की कोशिश की गई।
धरती की हलचल ने बदला नदियों का रास्ता
शोध के मुताबिक, इस इलाके में नदियों के रास्ते बदलने के पीछे धरती की आंतरिक हलचल की अहम भूमिका रही। जमीन के भीतर मौजूद दरारें, हिमालय से जुड़ी भूगर्भीय संरचनाएं और दिल्ली-हरिद्वार रिज जैसी संरचनाएं नदियों की दिशा बदलने के लिए परिस्थितियां तैयार कर सकती थीं। ऐसी प्रक्रियाओं में कभी एक नदी दूसरी नदी के जलग्रहण क्षेत्र में पहुंच जाती है। इसे नदी का रास्ता छिन जाना या ‘रिवर कैप्चर’ कहा जाता है।
आज सिरसा नदी नालागढ़ और रोपड़ के बीच पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है और सतलुज में मिलती है। लेकिन नदी तल में मिले कंकड़ों की दिशा के अध्ययन से संकेत मिलता है कि अतीत में इसका बहाव उलटा भी रहा होगा। शोधकर्ताओं के अनुसार, करीब 12 हजार साल पहले तक प्राचीन सतलुज का पानी सिरसा के रास्ते घग्गर तक पहुंचता था। बाद में भूगर्भीय बदलावों और नदी मार्गों के पुनर्गठन से यह व्यवस्था बदल गई।
पुराने नक्शों में छिपी नदी की कहानी
शोधकर्ताओं ने उपग्रह तस्वीरों, डिजिटल नक्शों और भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) की मदद से प्राचीन नदी मार्गों का पता लगाया। उन्होंने 1800 ईस्वी से पहले और उसके बाद के ऐतिहासिक नक्शों की तुलना भी की।
1800 से पहले के कुछ नक्शों में सतलुज-घग्गर-सरस्वती नदी तंत्र को पूर्व दिशा में बहते हुए दिखाया गया है। इस बहाव का एक मार्ग हिसार के पास से आगे बढ़कर दिल्ली के निकट यमुना से मिलता था। इसके विपरीत, बाद के नक्शों में कई धाराएं पश्चिम की ओर बहती दिखाई देती हैं। घग्गर की शाखाओं के रास्तों में बदलाव भी दर्ज किया गया।
जीआईएस विश्लेषण से संकेत मिला कि प्राचीन नदी मार्ग समय के साथ पश्चिम की ओर खिसकते रहे। इससे पता चलता है कि आज की नदियों का नक्शा हजारों साल पुराने जल तंत्र से काफी अलग हो सकता है।
दिल्ली में भी मिले प्राचीन नदी के संकेत
अध्ययन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा दिल्ली के उत्तरी इलाके में मिले पुराने जलोढ़ निक्षेपों का विश्लेषण था। शोधकर्ताओं ने बिखरे प्रकाश के अध्ययन पर आधारित तकनीक से इन अवसादों की उम्र का अनुमान लगाया। इसके आधार पर कुछ निक्षेपों की उम्र लगभग 5,000 से 12,000 साल के बीच आंकी गई।
इन संकेतों के आधार पर शोधकर्ताओं का अनुमान है कि कभी उत्तर-पश्चिम भारत में एक बड़ी, सालभर बहने वाली नदी दिल्ली तक पहुंचती थी और वर्तमान निगम बोध घाट के आसपास यमुना में मिलती थी। हालांकि, इस प्राचीन नदी की सटीक पहचान और उसके पूरे मार्ग को समझने के लिए और प्रमाण जरूरी हैं।
इंसान ने भी बदली जलधारा की किस्मत
नदियों का रास्ता केवल प्राकृतिक बदलावों से नहीं बदला। इतिहास में इंसानों ने भी पानी की दिशा मोड़ने की कोशिश की। अभिलेखों के अनुसार, फिरोज शाह तुगलक के शासनकाल (1351-1388) में नहर निर्माण को बढ़ावा मिला। वर्ष 1355 में सतलुज से घग्गर तक करीब 100 मील लंबी नहर का उल्लेख मिलता है। यमुना के पानी को हिसार और हांसी की ओर ले जाने के प्रयास भी किए गए।
बाद में शाहजहां के समय 1628 में अली मर्दान नहर बनवाई गई, लेकिन यह लंबे समय तक प्रभावी नहीं रही। ब्रिटिश शासन में 1817 से 1826 के बीच पश्चिमी यमुना नहर का निर्माण और विकास हुआ। समय के साथ गाद जमने और पानी का प्रवाह घटने से कई पुराने जलमार्ग मौसमी नालों में बदल गए। चौटांग, सरसुती और नजफगढ़ नाला इसी बदली हुई जल व्यवस्था की कहानी कहते हैं।
अतीत से सीख, भविष्य के लिए जरूरी
यह अध्ययन केवल सरस्वती जैसी प्राचीन नदी की खोज तक सीमित नहीं है। यह बताता है कि नदियां स्थिर नहीं रहतीं। भूगर्भीय हलचल, जलवायु और मानवीय गतिविधियां मिलकर पूरे क्षेत्र की जल व्यवस्था बदल सकती हैं। आज जब भूजल का स्तर गिर रहा है और पानी की कमी बढ़ रही है, तब प्राचीन नदी मार्गों को समझना भविष्य की जल योजनाओं के लिए उपयोगी हो सकता है।
कभी नदियों से समृद्ध रहा यह इलाका आज हमें एक अहम सबक देता है: पानी के रास्ते बदल सकते हैं, लेकिन उनके पीछे छूटे निशान इतिहास, प्रकृति और इंसानी सभ्यता के गहरे रिश्ते को समझने में मदद करते हैं।