पुराने कचरे के ढेर लगातार माइक्रोप्लास्टिक छोड़ रहे हैं, जो मिट्टी, पानी और हवा को व्यापक रूप से प्रदूषित कर रहे हैं।
वैज्ञानिकों ने 100 से अधिक शोधों का विश्लेषण कर प्लास्टिक कणों के पर्यावरण में फैलने का विस्तृत मार्ग समझाया है।
मानसून की बारिश और तेज हवाएं माइक्रोप्लास्टिक को लगातार भूजल, खेतों और दूर-दराज के क्षेत्रों तक पहुंचा रही हैं।
पॉलीथीन और पॉलीप्रोपाइलीन जैसे सामान्य प्लास्टिक खाद्य श्रृंखला में प्रवेश कर मानव स्वास्थ्य और कृषि को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहे हैं।
भारत में माइक्रोप्लास्टिक निगरानी और मानकीकृत परीक्षण विधियों की भारी कमी है, जिससे नीति निर्माण और कचरा प्रबंधन चुनौतीपूर्ण हो रहा है।
भारत में वर्षों से पड़े पुराने कचरे के ढेर अब सिर्फ गंदगी का ढेर नहीं रहे, बल्कि एक गंभीर पर्यावरणीय संकट का कारण बनते जा रहे हैं। वैज्ञानिकों के नए विश्लेषण में यह सामने आया है कि पुराने और बिना प्रबंधन वाले लैंडफिल से माइक्रोप्लास्टिक लगातार मिट्टी, पानी और हवा में फैल रहे हैं। यह समस्या धीरे-धीरे देश की खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा बन सकती है।
100 से अधिक शोधों का विश्लेषण
इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने 1998 से 2025 के बीच प्रकाशित लगभग 100 वैज्ञानिक शोधों का विश्लेषण किया। इसका उद्देश्य यह समझना था कि प्लास्टिक कचरा समय के साथ कैसे छोटे-छोटे कणों में टूटकर पर्यावरण में फैलता है। अध्ययन में पाया गया कि प्लास्टिक बैग, बोतलें और कपड़े जैसे बड़े कचरे वर्षों तक धूप, बारिश, दबाव और सूक्ष्म जीवों के प्रभाव में टूटते रहते हैं और अंत में बहुत छोटे कणों में बदल जाते हैं, जिन्हें माइक्रोप्लास्टिक कहा जाता है।
मिट्टी, पानी और हवा में फैलते जहरीले कण
यह माइक्रोप्लास्टिक कण आकार में पांच मिलीमीटर से भी छोटे होते हैं और बहुत आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान तक फैल जाते हैं। मानसून की बारिश इन कणों को जमीन के भीतर गहराई तक ले जाती है और यह भूजल को भी दूषित कर सकती है। दूसरी ओर तेज हवाएं हल्के प्लास्टिक कणों को हवा में उड़ा देती हैं, जो दूर-दराज के शहरों, खेतों और तटीय क्षेत्रों तक पहुंच जाते हैं। यह शोध एनवायरमेंटल साइंस: प्रोसेस एंड इम्पैक्टस नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।
वैज्ञानिकों ने यह भी पाया कि पॉलीथीन और पॉलीप्रोपाइलीन जैसे आम पैकेजिंग प्लास्टिक सबसे अधिक प्रदूषण फैला रहे हैं। ये कण खेती की मिट्टी में मिलकर खाद्य उत्पादन को भी प्रभावित कर सकते हैं।
कृषि और पीने के पानी पर खतरा
अध्ययन में बताया गया है कि जब ये माइक्रोप्लास्टिक खेती की जमीन में पहुंचते हैं, तो वे फसलों के माध्यम से भोजन श्रृंखला में प्रवेश कर सकते हैं। इससे इंसानों और जानवरों दोनों के स्वास्थ्य पर असर पड़ने की आशंका है। इसके अलावा, लैंडफिल से निकलने वाला जहरीला तरल, जिसे लीचेट कहा जाता है, भूजल को प्रदूषित कर सकता है, जो कई इलाकों में पीने के पानी का मुख्य स्रोत है।
नीतियों और निगरानी में बड़ी कमी
शोधकर्ताओं ने यह भी बताया कि भारत में इस समस्या पर पर्याप्त निगरानी नहीं है। स्वच्छ भारत मिशन जैसी योजनाएं पुराने कचरा ढेरों को साफ करने पर ध्यान देती हैं, लेकिन माइक्रोप्लास्टिक के फैलाव की कोई स्पष्ट निगरानी प्रणाली मौजूद नहीं है। इससे साफ-सफाई के दौरान भी यह खतरा और बढ़ सकता है क्योंकि पुराने कचरे को हिलाने से माइक्रोप्लास्टिक हवा में फैल सकते हैं।
इसके अलावा, देश के मध्य भाग के कई राज्यों में इस विषय पर वैज्ञानिक आंकड़ों की भारी कमी पाई गई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि भारत जैसे देश के लिए अंतरराष्ट्रीय मानक पूरी तरह उपयुक्त नहीं हैं, क्योंकि यहां कचरे की संरचना और जलवायु दोनों अलग हैं।
मानकीकरण और नए उपायों की जरूरत
अध्ययन में यह भी बताया गया है कि मिट्टी और कंपोस्ट जैसे जटिल वातावरण में माइक्रोप्लास्टिक की जांच के लिए एक समान और मानकीकृत तरीका अभी तक विकसित नहीं हुआ है। इसी कारण समस्या की वास्तविक गंभीरता को सही तरीके से समझना मुश्किल हो जाता है।
वैज्ञानिकों ने सुझाव दिया है कि पुराने कचरा ढेरों को हटाने की प्रक्रिया में माइक्रोप्लास्टिक की निगरानी को शामिल करना जरूरी है। इससे यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि सफाई के दौरान पर्यावरण को और नुकसान न हो।
भविष्य के लिए चेतावनी और समाधान की जरूरत
यह अध्ययन एक स्पष्ट संदेश देता है कि पुराने कचरे के ढेर अब निष्क्रिय नहीं हैं, बल्कि लगातार पर्यावरण को प्रभावित कर रहे हैं। यदि समय रहते उचित कदम नहीं उठाए गए, तो यह समस्या आने वाले वर्षों में और गंभीर हो सकती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि मजबूत नीतियां, बेहतर तकनीक और नियमित निगरानी से ही इस बढ़ते खतरे को नियंत्रित किया जा सकता है।