कश्मीर की झीलें सिर्फ घाटी की खूबसूरती नहीं, बल्कि यहां के लोगों के पानी, भोजन और आजीविका का आधार हैं। लेकिन एक नए अध्ययन ने इन जीवनदायिनी जलस्रोतों में बढ़ते प्रदूषण की गंभीर तस्वीर सामने रखी है।
डल झील समेत चार प्रमुख जल निकायों की जांच में पानी, तलछट और सिंघाड़े के पौधों में कैडमियम, क्रोमियम, कॉपर, निकेल और जिंक जैसी भारी धातुएं पाई गईं।
सबसे ज्यादा चिंता डल झील की है, जहां सिंघाड़े के फल में कैडमियम की मात्रा 0.11 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम मिली, जो सुरक्षित सीमा से करीब 5.5 गुणा अधिक है। जिंक भी निर्धारित सीमा से करीब 30 गुना ज्यादा पाया गया।
अध्ययन के मुताबिक प्रदूषित पानी और तलछट से भारी धातुएं सिंघाड़े की जड़ों में जमा हो रही हैं और कुछ मात्रा फल तक पहुंच रही है।
शोधकर्ताओं ने डल झील के सिंघाड़े के नियमित सेवन में सावधानी बरतने की सलाह दी है। यह अध्ययन साफ संकेत देता है कि झीलों का प्रदूषण सिर्फ पानी की समस्या नहीं रह गया है—यह धीरे-धीरे भोजन और मानव स्वास्थ्य तक पहुंच रहा है।
कश्मीर की खूबसूरत झीलें महज सैलानियों के आकर्षण का केंद्र नहीं हैं, बल्कि घाटी के जीवन की धड़कन हैं। सदियों से इन झीलों ने यहां के लोगों को पानी, भोजन और आजीविका दी है, साथ ही स्थानीय संस्कृति को भी समृद्ध किया है। इनके शांत पानी के नीचे जैव विविधता का एक अनमोल संसार बसता है, जिस पर हजारों लोगों की जिंदगी निर्भर है।
लेकिन बढ़ते इंसानी दबाव और प्रदूषण ने अब इन जीवनदायिनी झीलों की सेहत पर सवाल खड़ा कर दिया है। हालात यह हैं कि जिस पानी ने पीढ़ियों को सहारा दिया, उसी में आज धीरे-धीरे प्रदूषण का जहर घुल रहा है।
इस बारे में किए एक नए अध्ययन में कश्मीर के चार प्रमुख जल निकायों, डल झील, होकरसर आद्रभूमि, मानसबल झील और वुलर झील में भारी धातुओं और प्रदूषकों की मौजूदगी का पता चला है। यहां तक कि इनमें उगने वाले सिंघाड़े में भी कैडमियम जैसी भारी धातुओं के पाए जाने की पुष्टि हुई है।
इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने जल निकायों के पानी, तलछट और सिंघाड़े के अलग-अलग हिस्सों जैसे जड़, तना और फल के नमूनों की जांच की। इनमें आठ भारी धातुओं कैडमियम, क्रोमियम, तांबा, कोबाल्ट, लोहा, मैंगनीज, निकेल और जिंक का विश्लेषण किया है।
इनमें सबसे ज्यादा चिंता डल झील को लेकर सामने आई है। यहां उगने वाले सिंघाड़े में कैडमियम की मात्रा 0.11 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम तक मिली, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित सुरक्षित सीमा (0.02 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम) से करीब 5.5 गुणा अधिक है।
अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित नेचर जर्नल साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित हुए हैं।
डल झील में मिला सबसे ज्यादा प्रदूषण
इसी तरह जिंक की मात्रा भी 18.21 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम तक पाई गई, जो बताई गई निर्धारित सीमा से करीब 30 गुणा अधिक रही। यानी प्रदूषण अब सिर्फ झील के पानी तक सीमित नहीं है। वह पौधों की जड़ों में जमा हो रहा है और उसकी कुछ मात्रा फल तक भी पहुंच रही है।
ऐसे में शोधकर्ताओं ने डल झील से मिलने वाले सिंघाड़े के नियमित सेवन को लेकर सावधानी बरतने और प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण होने तक इसकी खपत सीमित करने की सलाह दी है।
अध्ययन से यह भी पता चला है कि डल झील के पानी, तलछट और सिंघाड़े के पौधों में भारी धातुओं का स्तर सबसे अधिक था। इसके बाद होकरसर आद्रभूमि का स्थान रहा। वहीं मानसबल और वुलर झीलों में इनका स्तर तुलनात्मक रूप से कम पाया।
शोधकर्ताओं के मुताबिक डल झील पर शहरीकरण और मानवीय गतिविधियों का दबाव ज्यादा है। घरेलू सीवेज, खेतों से बहकर आने वाला पानी, कचरा और हाउसबोट से निकलने वाला अपशिष्ट झील में प्रदूषण के बोझ को बढ़ा रहे हैं।
आखिर डल झील में क्यों है इतना प्रदूषण?
श्रीनगर में भी घरेलू सीवेज का बढ़ता दबाव इस समस्या की गंभीरता को दर्शाता है। जम्मू-कश्मीर प्रदूषण नियंत्रण समिति की एक रिपोर्ट के मुताबिक, श्रीनगर में रोजाना करीब 19.3 करोड़ लीटर घरेलू सीवेज पैदा हो रहा है। इसमें से करीब 14 करोड़ लीटर का उपचार नहीं हो पाता और इसका बड़ा हिस्सा डल झील तक पहुंच रहा है।
पानी की गुणवत्ता की जांच में भी डल झील सबसे ज्यादा प्रभावित पाई गई। डल झील में जैविक ऑक्सीजन मांग (बीओडी) 16.12 मिलीग्राम प्रति लीटर और रासायनिक ऑक्सीजन मांग (सीओडी) 139.54 मिलीग्राम प्रति लीटर तक दर्ज की गई। गौरतलब है कि झील में जैविक और रासायनिक ऑक्सीजन मांग की मौजूदगी प्रदूषण का संकेत देती है। इनके ज्यादा होने का अर्थ है कि पानी पर प्रदूषण का दबाव अधिक है और उसकी प्राकृतिक रूप से खुद को साफ करने की क्षमता प्रभावित हो रही है।
कैडमियम ने बढ़ाई स्वास्थ्य को लेकर चिंता
चिंता की बात है कि अध्ययन में कैडमियम, क्रोमियम, आयरन, मैंगनीज और निकेल जैसे तत्वों का स्तर भी कई स्थानों पर सुरक्षित सीमाओं से अधिक पाया गया।
शोधकर्ताओं का मानना है कि पानी में ज्यादा पोषक तत्व और जैविक पदार्थ भारी धातुओं को अधिक गतिशील और पौधों के लिए उपलब्ध बना सकते हैं। शहरी अतिक्रमण और पानी के कम प्रवाह से भी प्रदूषक लंबे समय तक झील में बने रह सकते हैं।
इस पूरी कहानी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा झील की तलहटी में छिपा है। अध्ययन में डल झील की तलछट में कैडमियम की मात्रा 1.05 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम और कॉपर की मात्रा 16.32 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम तक मिली। विशेषज्ञों के मुताबिक भारी धातुएं पानी में मिट्टी और जैविक पदार्थों के साथ चिपककर धीरे-धीरे तलहटी में जमा होती रहती हैं। इसलिए तलछट लंबे समय तक प्रदूषण को अपने भीतर रोककर रख सकती है।
वहीं जब पानी का प्रवाह कम हो, तलछट हिले या उसमें ऑक्सीजन की स्थिति बदले, तो इन धातुओं का कुछ हिस्सा फिर पानी में आ सकता है। वहां से वे जलीय पौधों तक पहुंच सकते हैं। इस लिहाज से झील की तलहटी सिर्फ मिट्टी नहीं है, बल्कि वर्षों से जमा प्रदूषण का एक तरह का ‘भंडार’ बन सकती है।
सिंघाड़े की जड़ों ने सोखा सबसे ज्यादा जहर
अध्ययन में सिंघाड़े के पौधे के अलग-अलग हिस्सों की जांच में एक स्पष्ट तस्वीर सामने आई। भारी धातुओं का सबसे ज्यादा जमाव जड़ों में था। इसके बाद तना-पत्तियां और फिर फल में इनकी मात्रा कम होती गई। डल झील के सिंघाड़े की जड़ों में आयरन की मात्रा 322.5 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम तक मिली।
जिंक की मात्रा 82.45 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम रही। इसी तरह जड़ों में कैडमियम 0.42, कॉपर 8.65, क्रोमियम 3.42, कोबाल्ट 2.72, निकेल 6.12 और जिंक 82.45 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम तक पाया गया। इससे पता चलता है कि पौधे की जड़ें प्रदूषित पानी और तलछट से भारी धातुओं को प्रभावी ढंग से सोख रही हैं।
शोधकर्ताओं को यह भी पता चला है कि सिंघाड़ा भारी धातुओं को अपनी जड़ों में रोकने की मजबूत क्षमता रखता है। अध्ययन में सभी धातुओं के लिए ट्रांसलोकेशन फैक्टर एक से कम रहा।
सरल शब्दों में इसका अर्थ है कि पौधा भारी धातुओं को जड़ों में ज्यादा रोकता है और उनका ऊपर के हिस्सों तथा फलों तक पहुंचना सीमित करता है। यह पौधे के लिए एक तरह की प्राकृतिक सुरक्षा है। हालांकि यह सुरक्षा भी पूरी तरह कामयाब नहीं है। डल झील में कैडमियम और दूसरी धातुओं की कुछ मात्रा फल में भी पाई गई है।
सबसे बड़ी चिंता इस बात को लेकर है कि झीलों का प्रदूषण सिंघाड़े के जरिए इंसानों तक कितना पहुंच सकता है। अध्ययन में सिंघाड़े के फल को खाने से होने वाले संभावित स्वास्थ्य जोखिम की जांच की गई। इसमें कैडमियम सबसे ज्यादा चिंता का कारण बना।
डल झील के सिंघाड़े में कैडमियम का स्वास्थ्य जोखिम सूचकांक एक से अधिक पाया गया। आम तौर पर इसके स्तर का एक या उससे अधिक होना स्वास्थ्य के लिए संभावित जोखिम की चेतावनी माना जाता है।
वुलर और मानसबल में स्थिति बेहतर
इसी तरह क्रोमियम का जोखिम भी डल झील और होकरसर आद्रभूमि में अपेक्षाकृत ज्यादा पाया गया। हालांकि इसका जोखिम सूचकांक एक से नीचे रहा। वहीं कॉपर, कोबाल्ट, आयरन, मैंगनीज, निकेल और जिंक के लिए सभी जगह सूचकांक एक से काफी कम रहा, यानी यह मौजूदा समय में स्वास्थ्य के लिए खतरा हैं, इसके कोई सबूत नहीं मिले हैं।
अध्ययन में आयरन और जिंक की मात्रा भी अधिक मिली है, लेकिन ये दोनों शरीर के लिए जरूरी पोषक तत्व भी हैं। सिंघाड़े के फलों में आयरन 45.88 से 98.65 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम और जिंक 8.6 से 18.21 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम तक पाया गया।
शोधकर्ताओं के अनुसार सामान्य मात्रा में सिंघाड़े का सेवन आयरन और जिंक जैसे जरूरी सूक्ष्म पोषक तत्वों की दैनिक जरूरत में योगदान कर सकता है। साथ ही इन दोनों तत्वों से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों की पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में हर भारी धातु को एक जैसा जहरीला मानना सही नहीं होगा। असली चिंता इस बात से है कि कौन-सी धातु कितनी मात्रा में मौजूद है और वह शरीर तक किस रास्ते से पहुंच रही है।
प्रदूषण का ‘जैविक सेंसर’ बन सकता है सिंघाड़ा
सिंघाड़े की भारी धातुओं को सोखने की क्षमता का एक सकारात्मक पहलू भी है। शोधकर्ताओं के मुताबिक यह पौधा प्रदूषण की निगरानी के लिए बायोइंडिकेटर यानी जैव-संकेतक के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। किसी जल निकाय में भारी धातुओं का स्तर बढ़ने पर पौधे के ऊतकों में भी उनका जमाव बढ़ सकता है।
चूंकि सिंघाड़ा पानी और तलछट दोनों के संपर्क में रहता है, इसलिए यह आसपास के प्रदूषण की स्थिति का संकेत दे सकता है। साथ ही इसकी भारी धातुओं को सोखने की क्षमता इसे प्रदूषित जल निकायों के उपचार यानी फाइटोरेमेडिएशन के लिए भी उपयोगी बना सकती है। लेकिन यहां एक बड़ा विरोधाभास है, अगर यही पौधा खाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, तो प्रदूषण को सोखने की उसकी क्षमता खाद्य-सुरक्षा का जोखिम भी बढ़ा सकती है।
चार झीलों में अलग-अलग तस्वीर
अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि सभी झीलों की स्थिति एक जैसी नहीं है। डल झील में सबसे ज्यादा भारी धातुओं का जमाव मिला। यहां शहरी और घरेलू प्रदूषण का दबाव अधिक है। इसी तरह होकरसर आद्रभूमि में भी प्रदूषण का स्तर ऊंचा रहा। यह वेटलैंड प्रदूषकों को रोकने में मदद करता है, लेकिन लगातार आने वाला कचरा और अपशिष्ट इसके दबाव को बढ़ा रहा है।
इसी तरह मानसबल झील में प्रदूषण तुलनात्मक रूप से कम रहा। वहीं वुलर झील में चारों जल निकायों में भारी धातुओं का सबसे कम प्रदूषण दर्ज किया गया। पानी का अधिक प्रवाह और बेहतर जल विनिमय इसके पीछे एक कारण हो सकता है।
इससे स्पष्ट है कि किसी झील का आकार ही उसकी सुरक्षा तय नहीं करता। आसपास की मानवीय गतिविधियां, सीवेज, कृषि, पानी का प्रवाह और तलछट में जमा प्रदूषण, ये सभी मिलकर उसकी सेहत तय करते हैं।
शोधकर्ताओं का कहना है कि कश्मीर में झीलों को बचाने के लिए केवल सतही सफाई पर्याप्त नहीं होगी। सीवेज का पूरा उपचार, कृषि अपवाह पर नियंत्रण और प्रदूषित तलछट का प्रबंधन भी जरूरी है। इसके साथ ही उन जगहों पर जहां सिंघाड़ा और दूसरी जलीय फसलें खाने के लिए उगाई जाती हैं, वहां नियमित रूप से भारी धातुओं की जांच होनी चाहिए।
खासकर डल झील जैसे अधिक प्रदूषित जल निकायों में सिंघाड़े की खेती और बिक्री को नियंत्रित किया जा सकता है।
चेतावनी सिर्फ सिंघाड़े के लिए नहीं
अध्ययन की एक सीमा यह भी है कि इसमें अलग-अलग मौसमों में भारी धातुओं के स्तर में होने वाले बदलावों को शामिल नहीं किया गया। इसलिए भविष्य में लंबे समय तक और अलग-अलग मौसमों में अध्ययन की जरूरत होगी।
फिर भी यह अध्ययन एक महत्वपूर्ण सवाल हमारे सामने रखता है, जब झील प्रदूषित होती है, तो क्या उसका असर सिर्फ पानी तक रहता है? कश्मीर के सिंघाड़े में मिली भारी धातुएं बताती हैं कि जवाब ‘नहीं’ है।
प्रदूषण पानी से तलछट में जाता है, तलछट से पौधे की जड़ों में पहुंचता है और वहां से कुछ हिस्सा फल तक भी पहुंच सकता है।
यानी झील में फेंका गया कचरा आखिरकार उसी समुदाय की थाली तक लौट सकता है, जिसकी जिंदगी उस झील से जुड़ी है। ऐसे में कश्मीर की झीलों को बचाना सिर्फ पर्यावरण को बचाने की लड़ाई नहीं है। यह पानी, भोजन, जीविका और लोगों के स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने की भी जंग है।