कोंकण तट की रेत में आर्सेनिक का गंभीर प्रदूषण मिला, जिससे समुद्री पर्यावरण और स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य को लेकर चिंता बढ़ गई है। फोटो साभार: आईस्टॉक
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कोंकण के समुद्र तटों पर प्रदूषण का दोहरा खतरा; रेत में मिला आर्सेनिक, बढ़ी चिंता

कोंकण की रेत में आर्सेनिक, बैक्टीरिया में बढ़ा दवा प्रतिरोध, सीवेज और भारी धातुओं से समुद्री पर्यावरण पर बढ़ा खतरा, प्रदूषण के कारण खतरनाक बैक्टीरिया पनपने की आशंका

Dayanidhi

  • कोंकण तट की रेत में आर्सेनिक का गंभीर प्रदूषण मिला, जिससे समुद्री पर्यावरण और स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य पर चिंता बढ़ी।

  • अध्ययन में कई बैक्टीरिया पेनिसिलिन और एमोक्सिसिलिन जैसी आम एंटीबायोटिक दवाओं के खिलाफ प्रतिरोधी पाए गए।

  • वैज्ञानिकों ने भारी धातु प्रदूषण और बैक्टीरिया में बढ़ते एंटीबायोटिक प्रतिरोध के बीच संबंध की संभावना जताई है।

  • ई. कोलाई, क्लेबसिएला और एंटरोकोकस जैसे बैक्टीरिया मिले, जो तटीय इलाकों में सीवेज प्रदूषण का संकेत देते हैं।

  • शोधकर्ताओं ने बेहतर सीवेज व्यवस्था, औद्योगिक कचरे पर नियंत्रण और कोंकण तट की नियमित निगरानी की जरूरत बताई है।

महाराष्ट्र का कोंकण तट अपनी खूबसूरत समुद्री पट्टी और साफ-सुथरे समुद्र तटों के लिए जाना जाता है। लेकिन एक नए अध्ययन ने इस इलाके के तटीय पर्यावरण को लेकर चिंता बढ़ा दी है। शोधकर्ताओं को समुद्र तट की रेत में भारी मात्रा में आर्सेनिक मिला है। इसके साथ ही यहां ऐसे बैक्टीरिया भी मिले हैं, जिनमें कई आम एंटीबायोटिक दवाओं के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो चुकी है।

यह अध्ययन बीआरआईसी-नेशनल सेंटर फॉर सेल साइंस (बीआरआईसी-एनसीसीएस) और दिल्ली विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने किया है। टीम ने कोंकण तट के पांच प्रमुख स्थानों से रेत और तलछट के नमूने लिए। इनमें सावने, हरनाई, पालंदे और लाडघर जैसे समुद्र तट शामिल थे।

आर्सेनिक बना सबसे बड़ी समस्या

शोध में सामने आया कि इन इलाकों में आर्सेनिक प्रमुख प्रदूषक है। इसकी मात्रा कुछ नमूनों में इतनी अधिक थी कि वैज्ञानिकों ने उसे गंभीर प्रदूषण की श्रेणी में रखा। आर्सेनिक एक जहरीली धातु है और लंबे समय तक इसके संपर्क में रहना पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य दोनों के लिए नुकसानदायक हो सकता है।

लेकिन वैज्ञानिकों की चिंता केवल आर्सेनिक तक सीमित नहीं है। उनका कहना है कि भारी धातुओं का प्रदूषण बैक्टीरिया के व्यवहार को भी बदल सकता है। यह शोध कॉन्टिनेंटल शेल्फ रिसर्च नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।

प्रदूषण से बढ़ रहा एंटीबायोटिक प्रतिरोध

शोधकर्ताओं के अनुसार, भारी धातुओं और एंटीबायोटिक प्रतिरोध के बीच एक संबंध हो सकता है। इसे वैज्ञानिक भाषा में ‘को-सेलेक्शन’ कहा जाता है। जब बैक्टीरिया लगातार आर्सेनिक जैसी जहरीली धातुओं के संपर्क में आते हैं, तो उनके सामने जीवित रहने की चुनौती पैदा होती है। ऐसे में वे कुछ प्रतिरोधी गुण विकसित कर सकते हैं।

कई बार भारी धातुओं के खिलाफ प्रतिरोध और एंटीबायोटिक के खिलाफ प्रतिरोध से जुड़े जीन एक ही आनुवंशिक संरचना पर मौजूद होते हैं। इसलिए एक तरह का प्रदूषण दूसरे तरह के प्रतिरोध को भी बढ़ावा दे सकता है।

अध्ययन में करीब 37 प्रतिशत अलग किए गए बैक्टीरिया का मल्टीपल एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस इंडेक्स 0.2 से अधिक पाया गया। इसका मतलब है कि इन बैक्टीरिया पर मानव गतिविधियों से पैदा होने वाले दबाव का असर हो सकता है।

आम दवाओं के खिलाफ भी प्रतिरोध

वैज्ञानिकों ने बैक्टीरिया की जांच दो तरीकों से की। पहले उन्होंने बैक्टीरिया को प्रयोगशाला में उगाकर अलग-अलग एंटीबायोटिक दवाओं के खिलाफ उनकी प्रतिक्रिया देखी। इसमें पाया गया कि कई बैक्टीरिया पेनिसिलिन और एमोक्सिसिलिन जैसी आम और पुरानी दवाओं के प्रति प्रतिरोधी थे। हालांकि कुछ नई दवाएं अभी भी इन बैक्टीरिया पर असरदार पाई गईं।

इसके बाद शोधकर्ताओं ने रेत से सीधे डीएनए निकालकर उसकी जांच की। इस तरीके से उन सूक्ष्म जीवों की जानकारी भी मिली, जिन्हें प्रयोगशाला में आसानी से उगाया नहीं जा सकता। जांच में फर्मिक्यूट्स और प्रोटीओबैक्टीरिया समूह के बैक्टीरिया प्रमुख रूप से पाए गए।

समुद्र में सीवेज का खतरा

अध्ययन में एक और गंभीर समस्या सामने आई। शोधकर्ताओं को ई. कोलाई, क्लेबसिएला और एंटरोकोकस जैसे मल से जुड़े बैक्टीरिया मिले। इनकी मौजूदगी समुद्री पानी और आसपास के इलाकों में सीवेज प्रदूषण का संकेत देती है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि कुछ स्थानों पर घरेलू सीवेज के पर्याप्त उपचार के बिना समुद्र में पहुंचने की संभावना है। ऐसे बैक्टीरिया मनुष्यों में कई तरह के संक्रमण पैदा कर सकते हैं। जब सीवेज से आए बैक्टीरिया भारी धातुओं से प्रदूषित वातावरण में रहते हैं, तो एंटीबायोटिक प्रतिरोध बढ़ने की आशंका और गंभीर हो जाती है।

समुद्र तटों की निगरानी जरूरी

शोधकर्ताओं ने इस अध्ययन में पर्यावरण, बैक्टीरिया और मानव स्वास्थ्य को एक साथ देखने की कोशिश की है। यही वजह है कि इसे ‘वन हेल्थ’ दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसका मतलब है कि इंसानों का स्वास्थ्य, जानवरों का स्वास्थ्य और पर्यावरण एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

हालांकि वैज्ञानिकों ने यह भी स्पष्ट किया है कि अध्ययन की कुछ सीमाएं हैं। नमूने सीमित स्थानों से और एक निश्चित समय पर लिए गए थे। समुद्र तटों की स्थिति मौसम, ज्वार और मानसून के साथ बदलती रहती है। इसलिए पूरे साल की स्थिति जानने के लिए अलग-अलग मौसम में और अधिक नमूनों की जरूरत होगी।

डीएनए में किसी प्रतिरोधी जीन की मौजूदगी का यह अर्थ भी जरूरी नहीं है कि वह जीन उसी समय सक्रिय रूप से काम कर रहा हो।

बेहतर सीवेज व्यवस्था की जरूरत

अध्ययन ने कोंकण तट के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी दी है। समुद्री तटों पर भारी धातुओं और एंटीबायोटिक प्रतिरोधी बैक्टीरिया की मौजूदगी पर्यावरण के साथ-साथ लोगों के स्वास्थ्य के लिए भी चिंता का विषय है।

विशेषज्ञों के अनुसार, इस समस्या से निपटने के लिए बेहतर सीवेज उपचार व्यवस्था, औद्योगिक कचरे की सख्त निगरानी और नियमित तटीय जांच जरूरी है। कोंकण के समुद्र तट पर्यटन और स्थानीय मछली पालन के लिए महत्वपूर्ण हैं। इसलिए समय रहते प्रदूषण पर नियंत्रण करना न केवल पर्यावरण, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा के लिए भी जरूरी है।