2023 में चबाने वाले तंबाकू से दुनिया में अनुमानित 2.51 लाख मौतें हुईं, जिनमें 84 प्रतिशत दक्षिण एशिया में दर्ज हुईं।
दुनिया में करीब 24.1 करोड़ लोग चबाने वाला तंबाकू इस्तेमाल करते हैं, पुरुषों में इसका चलन महिलाओं से दो गुना ज्यादा है।
भारत समेत दस देशों में पुरुषों से जुड़े 90 प्रतिशत से अधिक चबाने वाले तंबाकू का स्वास्थ्य बोझ दर्ज किया गया है।
स्ट्रोक और मुंह के कैंसर से होने वाला स्वास्थ्य नुकसान चबाने वाले तंबाकू के कारण सबसे ज्यादा पाया गया है।
1990 से 2023 के बीच चबाने वाले तंबाकू से जुड़े कुल स्वास्थ्य नुकसान में 116 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज हुई।
दुनियाभर में तंबाकू चबाने से लाखों लोगों की जिंदगी पर गंभीर असर डाल रहा है। इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवैल्यूएशन (आईएचएमई) के एक नए अध्ययन के अनुसार, साल 2023 में चबाने वाले तंबाकू के इस्तेमाल से करीब 2.51 लाख लोगों की मौत हुई। इसका सबसे ज्यादा असर दक्षिण एशिया में देखने को मिला।
यह अध्ययन ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज स्टडी 2023 का हिस्सा है और इसे 'द लैंसेट ग्लोबल हेल्थ' में प्रकाशित किया गया है। शोध में 1990 से 2023 तक 204 देशों और क्षेत्रों में चबाने वाले तंबाकू के इस्तेमाल और उससे होने वाले स्वास्थ्य नुकसान का अध्ययन किया गया।
24.1 करोड़ लोग करते हैं इस्तेमाल
शोधकर्ताओं के मुताबिक, 2023 में 15 साल और उससे अधिक उम्र के करीब 24.1 करोड़ लोग चबाने वाला तंबाकू इस्तेमाल कर रहे थे। दुनिया में इसकी कुल हिस्सेदारी करीब 3.9 प्रतिशत रही। पुरुषों में इसका इस्तेमाल महिलाओं की तुलना में दो गुना से ज्यादा पाया गया।
अध्ययन की एक अहम बात यह है कि 1990 से 2023 के बीच किसी भी देश में चबाने वाले तंबाकू के इस्तेमाल करने वालों की संख्या में महत्वपूर्ण कमी नहीं आई। वहीं, 24 देशों में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ी।
दक्षिण एशिया सबसे ज्यादा प्रभावित
दक्षिण एशिया चबाने वाले तंबाकू के इस्तेमाल का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है। साल 2023 में इस क्षेत्र में 15 साल और उससे अधिक उम्र की करीब 14.6 प्रतिशत आबादी चबाने वाला तंबाकू इस्तेमाल कर रही थी।
दक्षिण एशिया में इससे जुड़ी करीब 2.10 लाख मौतें हुईं, जो दुनिया में हुई कुल मौतों का लगभग 84 प्रतिशत है। देशों की बात करें तो पलाऊ में इस्तेमाल की दर 24.4 प्रतिशत रही। इसके बाद बांग्लादेश में 23.4 प्रतिशत और नेपाल में 17.5 प्रतिशत की दर दर्ज की गई।
भारत पर भी बड़ा खतरा
चबाने वाले तंबाकू से होने वाली मौतों और बीमारी का बड़ा हिस्सा कुछ ही देशों में केंद्रित है। पुरुषों में इससे जुड़े 90 प्रतिशत से ज्यादा स्वास्थ्य नुकसान भारत, बांग्लादेश, चीन, पाकिस्तान, म्यांमार, अमेरिका, नेपाल, श्रीलंका, फिलीपींस और मेडागास्कर में हुआ।
महिलाओं में 90 प्रतिशत से ज्यादा स्वास्थ्य नुकसान भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, इंडोनेशिया, म्यांमार, चीन, थाईलैंड, कंबोडिया, वियतनाम और नेपाल में दर्ज किया गया। हालांकि शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया है कि कुल मौतों और बीमारी का बोझ केवल इस्तेमाल की दर पर निर्भर नहीं करता। बड़ी आबादी वाले देशों में कुल संख्या अधिक हो सकती है, भले ही वहां इस्तेमाल की दर कुछ दूसरे देशों से कम हो।
स्ट्रोक और कैंसर का बड़ा खतरा
अध्ययन में चबाने वाले तंबाकू से जुड़े छह प्रमुख स्वास्थ्य परिणामों का आकलन किया गया। इनमें स्ट्रोक, होंठ और मुंह का कैंसर, खाने की नली का कैंसर, गले के अन्य कैंसर, गले के ऊपरी हिस्से का कैंसर और नाक के पीछे होने वाला कैंसर शामिल हैं।
इनमें स्ट्रोक से होने वाला स्वास्थ्य नुकसान सबसे ज्यादा पाया गया। इसके बाद होंठ और मुंह के कैंसर का स्थान रहा। दुनिया में होंठ और मुंह के कैंसर से होने वाले स्वास्थ्य नुकसान का 17.3 प्रतिशत हिस्सा चबाने वाले तंबाकू से जुड़ा पाया गया। दक्षिण एशिया में यह आंकड़ा बढ़कर 30.5 प्रतिशत हो गया।
33 साल में स्वास्थ्य नुकसान दोगुने से ज्यादा
शोध के अनुसार, 1990 से 2023 के बीच चबाने वाले तंबाकू से जुड़े कुल स्वास्थ्य नुकसान में 116 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। 2023 में इससे जुड़े कुल 64.8 लाख स्वस्थ जीवन-वर्षों का नुकसान हुआ। इनमें 61.7 लाख साल समय से पहले हुई मौतों के कारण गंवाए गए।
उम्र और लिंग के हिसाब से भी अंतर
चबाने वाले तंबाकू का इस्तेमाल उम्र और लिंग के अनुसार भी अलग-अलग है। दुनियाभर में पुरुष इसका इस्तेमाल महिलाओं से अधिक करते हैं। उम्र बढ़ने के साथ इसका इस्तेमाल बढ़ता है और पुरुषों में 60 से 64 साल की उम्र के बीच यह सबसे अधिक पाया गया।
दक्षिण एशिया में करीब हर पांच में से एक पुरुष और हर दस में से एक महिला चबाने वाला तंबाकू इस्तेमाल करती है। हालांकि सभी देशों में स्थिति एक जैसी नहीं है। उदाहरण के लिए बांग्लादेश में 30 साल से अधिक उम्र के लोगों में कई आयु वर्गों में महिलाओं के बीच इसका इस्तेमाल पुरुषों से ज्यादा पाया गया।
नियंत्रण के लिए अलग रणनीति जरूरी
विशेषज्ञों का कहना है कि चबाने वाले तंबाकू को रोकने के लिए सभी देशों में एक जैसी रणनीति काम नहीं करेगी। उम्र, लिंग, स्थानीय संस्कृति और सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार जागरूकता और तंबाकू छोड़ने की योजनाएं तैयार करनी होंगी।
अध्ययन के मुताबिक, धूम्रपान की तुलना में चबाने वाले तंबाकू पर लंबे समय तक कम ध्यान दिया गया है। इसके इस्तेमाल को कम करने के लिए तंबाकू नियंत्रण और गैर-संचारी रोगों से जुड़ी स्वास्थ्य योजनाओं में चबाने वाले तंबाकू की रोकथाम और इसे छोड़ने में मदद को ज्यादा महत्व देना जरूरी है।