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स्वास्थ्य

क्या प्लास्टिक पर पलते वायरस फैला रहे रोगाणुरोधी प्रतिरोध?

वैज्ञानिकों ने चेताया है कि प्लास्टिस्फियर पर पलती सूक्ष्म दुनिया हमारी एंटीबायोटिक दवाओं को बेअसर बना सकती है

Lalit Maurya

  • वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि प्लास्टिक की सतह पर पनपने वाले वायरस रोगाणुरोधी प्रतिरोध को फैलाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

  • यह प्रतिरोध बैक्टीरिया के बीच जीनों के आदान-प्रदान से होता है, जिससे दवाओं की प्रभावशीलता कम हो सकती है। प्लास्टिक प्रदूषण अब केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरा बनता जा रहा है।

  • वैज्ञानिकों के मुताबिक, जब प्लास्टिक कचरा प्रकृति में पहुंचता है तो उसकी सतह पर जल्द ही बैक्टीरिया और अन्य सूक्ष्मजीवों की एक मोटी परत जम जाती है, जिसे प्लास्टिस्फियर कहा जाता है।

क्या प्लास्टिक सिर्फ नदियों, झीलों, समुद्रों और जमीन को ही गन्दा कर रहा है? जवाब बहुत सीधा सा है नहीं। वैज्ञानिकों के मुताबिक आज प्लास्टिक न केवल प्राकृतिक पर्यावरण बल्कि हमारी सेहत और दवाओं को भी चुनौती दे रहा है।

एक नए अध्ययन में सामने आया है कि प्लास्टिक की सतह पर पनपने वाले वायरस रोगाणुरोधी प्रतिरोध (एंटीबायोटिक रेसिस्टेन्स) को फैलाने में भी अहम भूमिका निभा सकते हैं, जिससे इंसानों और पर्यावरण दोनों के स्वास्थ्य के लिए नया अदृश्य खतरा पैदा हो रहा है।

प्लास्टिक पर पनपती सूक्ष्म दुनिया

वैज्ञानिकों के मुताबिक, जब प्लास्टिक कचरा प्रकृति में पहुंचता है तो उसकी सतह पर जल्द ही बैक्टीरिया और अन्य सूक्ष्मजीवों की एक मोटी परत जम जाती है, जिसे प्लास्टिस्फियर कहा जाता है।

यह पहले ही साबित हो चुका है कि प्लास्टिस्फियर पर रोगाणुरोधी प्रतिरोध से जुड़े जीन बड़ी मात्रा में मौजूद होते हैं। हालांकि अब तक इस पर मौजूद बैक्टीरिया पर ही ध्यान दिया गया था, लेकिन इस बार वैज्ञानिकों की नजर वायरस पर गई है। जर्नल बायोकंटैमिनेंट में प्रकाशित इस अध्ययन के मुताबिक वायरस, जो धरती पर सबसे अधिक संख्या में पाए जाने वाले जीव हैं, इन रोगाणुरोधी जीनों को माइक्रोब्स के बीच पहुंचाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

वायरस कैसे फैलाते हैं प्रतिरोध?

अध्ययन में सामने आया है कि वायरस, बैक्टीरिया के बीच जीनों का आदान-प्रदान करवा सकते हैं। इस प्रक्रिया को 'हॉरिजॉन्टल जीन ट्रांसफर' कहा जाता है।

प्लास्टिस्फियर में, जहां सूक्ष्मजीव एक-दूसरे के बहुत पास-पास रहते हैं, वहां वायरस के लिए रोगाणुरोधी प्रतिरोध से जुड़े जीन को एक प्रजाति से दूसरी, यहां तक कि रोग फैलाने वाले बैक्टीरिया तक पहुंचाना भी आसान हो जाता है। कुछ वायरस ऐसे अतिरिक्त जीन भी लेकर चलते हैं, जो कठिन हालात में बैक्टीरिया को जिन्दा रहने में मदद करते हैं।

उदाहरण के लिए, जब बैक्टीरिया पर एंटीबायोटिक या प्रदूषकों का दबाव होता है, तब ये जीन उन्हें मजबूत बनाते हैं। इससे दवा-रोधी बैक्टीरिया को बढ़ने में मदद मिलती है।

पानी और मिट्टी में अलग-अलग भूमिका

शोधकर्ताओं के मुताबिक, वायरस का व्यवहार पर्यावरण के हिसाब से बदलता है। पानी में मौजूद प्लास्टिस्फियर में वायरस ऐसे तरीके अपनाते हैं, जिनसे जीन का आदान-प्रदान बढ़ सकता है। इससे रोगाणुरोधी प्रतिरोध के फैलने का खतरा बढ़ जाता है।

वहीं दूसरी तरफ मिट्टी में, वायरस कई बार दवा-रोधी बैक्टीरिया को नष्ट कर उनके प्रसार को सीमित भी कर सकते हैं।

वायरस की ये अलग-अलग भूमिकाएं दर्शाती हैं कि प्लास्टिक प्रदूषण के खतरे को समझते समय पर्यावरण की स्थिति को ध्यान में रखना बेहद जरूरी है, इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

क्यों जरूरी है चेतावनी?

चाइनिज एकेडमी ऑफ साइंसेज और अध्ययन से जुड़े वैज्ञानिक डोंग झू का प्रेस विज्ञप्ति में कहना है, “अब तक किए ज्यादातर शोध प्लास्टिस्फियर में मौजूद बैक्टीरिया तक सीमित थे। लेकिन वायरस हर जगह हैं और अपने मेजबान (होस्ट) से गहराई से जुड़े रहते हैं। अध्ययन दर्शाता है कि वे रोगाणुरोधी प्रतिरोध फैलाने के छिपे चालक हो सकते हैं।”

बोस्टन विश्वविद्यालय से जुड़े शोधकर्ताओं द्वारा किए एक अन्य अध्ययन में पता चला है कि माइक्रोप्लास्टिक के संपर्क में आने वाले बैक्टीरिया कई प्रकार की एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति प्रतिरोधी हो गए हैं। इन दवाओं का उपयोग आमतौर पर संक्रमण के इलाज में किया जाता है।

प्लास्टिक, वायरस और हमारी बेबस दवाएं

वहीं जर्नल ऑफ हैजर्डस मैटेरियल्स लेटर्स में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक माइक्रोप्लास्टिक के कारण बैक्टीरिया में रोगाणुरोधी प्रतिरोध 30 गुना तक बढ़ सकता है। शोध से पता चला है कि यह माइक्रोप्लास्टिक कई तरह के बैक्टीरिया और रोगजनकों को एंटीबायोटिक रेसिस्टेन्स बनने में मददगार हो सकते हैं।

साथ ही यह उनके जरिए अन्य स्थानों तक भी पहुंच सकते हैं, इस तरह से यह जलीय जीवों और इंसानी स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं।

शोधकर्ताओं का कहना है कि आगे और अध्ययन किए जाने चाहिए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि प्लास्टिक पर वायरस और बैक्टीरिया जीन का आदान-प्रदान कैसे करते हैं। साथ ही, वायरस में मौजूद रोगाणुरोधी जीन को पहचानने के आसान और बेहतर तरीके भी विकसित करने की जरूरत है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक, इससे प्लास्टिक कचरे की निगरानी और उसके प्रबंधन में सुधार होगा और रोगाणुरोधी प्रतिरोध का खतरा कम किया जा सकेगा। देखा जाए तो प्लास्टिक प्रदूषण अब महज आंखों से नजर आने वाला संकट नहीं रहा। यह हमारी दवाओं को बेअसर करने वाला एक अदृश्य जैविक खतरा भी बनता जा रहा है, जिसे काबू करने की जरूरत है।