दक्षिण अफ्रीका की बीट टीबी स्टडी ने दवा-प्रतिरोधी तपेदिक के इलाज को सरल और छह महीने तक छोटा करने में सफलता पाई। फोटो साभार: आईस्टॉक
स्वास्थ्य

दवा-प्रतिरोधी टीबी के इलाज में दक्षिण अफ्रीका की ‘बीट टीबी स्टडी’ ने बदली दुनिया की दिशा

दवा-प्रतिरोधी टीबी के इलाज में बड़ा बदलाव: दक्षिण अफ्रीका की 'बीट टीबी स्टडी' ने छोटा, सरल और प्रभावी उपचार विकसित कर वैश्विक दिशानिर्देश बदले

Dayanidhi

  • दक्षिण अफ्रीका की बीट टीबी स्टडी ने दवा-प्रतिरोधी तपेदिक के इलाज को सरल और छह महीने तक छोटा करने में सफलता पाई।

  • अध्ययन में सात दवाओं की जगह चार से पांच दवाओं का उपयोग कर बेहतर और प्रभावी उपचार विकल्प विकसित किया गया।

  • यह शोध कोविड-19 महामारी के दौरान भी जारी रहा और 400 से अधिक मरीजों को शामिल कर महत्वपूर्ण परिणाम दिए।

  • गर्भवती महिलाएं, बच्चे और स्तनपान कराने वाली माताएं भी अध्ययन में शामिल हुईं, जिससे इलाज अधिक समावेशी और सुरक्षित बना।

दक्षिण अफ्रीका के पूर्वी केप प्रांत के शहर ग्केबरहा (पूर्व पोर्ट एलिजाबेथ) में शुरू हुई एक क्लिनिकल स्टडी ने पूरी दुनिया में दवा-प्रतिरोधी टीबी के इलाज को नई दिशा दी है। इस अध्ययन का नाम बीट ट्यूबरक्लोसिस रखा गया था। यह शोध बाद में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इतना महत्वपूर्ण साबित हुआ कि इसके नतीजे दुनिया की प्रसिद्ध मेडिकल जर्नल न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित किए गए।

इस अध्ययन को दक्षिण अफ्रीका की यूनिवर्सिटी ऑफ द विटवाटर्सरैंड और देश के राष्ट्रीय स्वास्थ्य विभाग के सहयोग से किया गया। इसमें दो साल तक करीब 400 से अधिक मरीजों को शामिल किया गया और यह शोध कोविड-19 महामारी के कठिन समय में भी जारी रहा।

टीबी के इलाज में बड़ा बदलाव

इस शोध का मुख्य उद्देश्य दवा-प्रतिरोधी टीबी के इलाज को आसान और छोटा बनाना था। पहले इस बीमारी का इलाज बहुत लंबा और कठिन होता था। मरीजों को लगभग नौ महीने या उससे भी अधिक समय तक सात अलग-अलग दवाएं लेनी पड़ती थीं। यह इलाज न केवल लंबा था, बल्कि मरीजों के लिए इसे पूरा करना भी मुश्किल होता था।

बीट टीबी अध्ययन में एक नए इलाज का तरीका आजमाया गया। इसमें केवल चार से पांच दवाओं का उपयोग किया गया। इनमें कुछ नई और असरदार दवाएं जैसे बेडाक्विलिन और डेलामानिड भी शामिल थीं। इस नए इलाज की अवधि भी कम थी, लगभग छह महीने।

इस बदलाव से मरीजों को बड़ी राहत मिली क्योंकि अब इलाज कम समय में पूरा हो सकता था और दवाओं की संख्या भी कम थी।

सभी उम्र के लोगों को शामिल किया गया

इस अध्ययन की एक खास बात यह थी कि इसमें सभी तरह के मरीजों को शामिल किया गया। आम तौर पर क्लिनिकल रिसर्च में छोटे बच्चे, गर्भवती महिलाएं और स्तनपान कराने वाली माताएं शामिल नहीं की जातीं, लेकिन इस स्टडी में इन सभी को शामिल किया गया।

इस कारण इस इलाज को “पूरे परिवार के लिए इलाज” भी कहा जा रहा है। शोधकर्ताओं के अनुसार, जब परिवार के सभी सदस्य एक ही तरह के और कम समय के इलाज पर होते हैं, तो इलाज पूरा करने की संभावना बढ़ जाती है।

अध्ययन में शामिल 10 गर्भवती महिलाओं में से सभी ने स्वस्थ बच्चों को जन्म दिया और उनमें से नौ महिलाएं सफलतापूर्वक ठीक भी हो गईं।

दुनिया भर में असर और नई नीति

बीट टीबी अध्ययन के नतीजों का असर केवल दक्षिण अफ्रीका तक सीमित नहीं रहा। इस शोध के आधार पर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की नीतियों में भी बदलाव की दिशा दिखाई दी है। अब कई देशों में दवा-प्रतिरोधी टीबी के इलाज के लिए छोटे और सरल इलाज को अपनाने पर विचार किया जा रहा है।

दक्षिण अफ्रीका में भी यह नया इलाज धीरे-धीरे लागू किया जा रहा है। विशेष रूप से गर्भवती महिलाओं और बच्चों के इलाज में इसे अधिक प्राथमिकता दी जा रही है।

विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया

शोध में शोधकर्ता के हवाले से कहा गया है कि यह परियोजना उनके लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। उन्होंने बताया कि इस शोध के नतीजों ने अंतरराष्ट्रीय दिशा-निर्देशों को बदल दिया है। उनका कहना है कि दक्षिण अफ्रीका अब ऐसे शोध कर रहा है जो दुनिया भर के मरीजों के जीवन को बेहतर बना रहे हैं।

अध्ययन में राष्ट्रीय स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी ने कहा कि यह अध्ययन केवल वैज्ञानिक सफलता नहीं है, बल्कि इसे धीरे-धीरे पूरे देश और दुनिया में लागू किया जा रहा है।

टीबी के लक्षण और सावधानी

टीबी एक गंभीर बीमारी है, लेकिन इसका इलाज संभव है। इसके मुख्य लक्षणों में दो हफ्ते से अधिक समय तक खांसी रहना, वजन कम होना, रात में पसीना आना और बुखार शामिल हैं। यदि ऐसे लक्षण दिखें तो तुरंत नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र जाना चाहिए। वहां बलगम की जांच करके बीमारी की पुष्टि की जाती है और सही इलाज शुरू किया जाता है।

बीट टीबी अध्ययन ने यह साबित किया है कि आधुनिक चिकित्सा शोध के जरिए टीबी जैसे पुराने रोग का इलाज भी आसान और प्रभावी बनाया जा सकता है। यह अध्ययन न केवल दक्षिण अफ्रीका की वैज्ञानिक क्षमता को दिखाता है, बल्कि दुनिया भर में लाखों मरीजों के लिए नई उम्मीद भी लेकर आया है।