लेप्टोस्पायरोसिस घोड़ों में गर्भपात, नवजात मृत्यु और आंखों की गंभीर बीमारी का कारण बन सकता है, जिससे उनकी कार्यक्षमता प्रभावित होती है। प्रतीकात्मक छवि, फोटो साभार: आईस्टॉक
स्वास्थ्य

अमेरिका के घोड़ों में लेप्टोस्पायरोसिस का खतरा, 61 फीसदी से अधिक नमूनों में मिले संक्रमण के संकेत

कनेक्टिकट में घोड़ों पर लेप्टोस्पायरोसिस का खतरा, 61.5% नमूनों में मिले बैक्टीरिया के संपर्क के संकेत; वैज्ञानिकों ने इंसानों और पशुओं की सुरक्षा के लिए वन हेल्थ पर दिया जोर।

Dayanidhi

  • कनेक्टिकट में करीब 400 घोड़ों के नमूनों की जांच में 61.5 प्रतिशत नमूनों में लेप्टोस्पाइरा के संपर्क के संकेत मिले।

  • लेप्टोस्पायरोसिस घोड़ों में गर्भपात, नवजात मृत्यु और आंखों की गंभीर बीमारी का कारण बन सकता है, जिससे उनकी कार्यक्षमता प्रभावित होती है।

  • अध्ययन में डजासिमैन, ग्रिप्पोटीफोसा, ऑस्ट्रेलिस, पोमोना और इक्टेरोहैमरेजिया प्रमुख सीरोग्रुप के रूप में सामने आए, जिनसे घोड़ों का संपर्क हुआ था।

  • संक्रमित घोड़े बिना लक्षण दिखाए पेशाब के जरिए बैक्टीरिया फैला सकते हैं, जिससे पर्यावरण और इंसानों के स्वास्थ्य पर खतरा बढ़ सकता है।

  • वैज्ञानिकों ने सुरक्षा उपकरणों, स्वच्छ अस्तबल, सुरक्षित पानी और टीकाकरण पर जोर दिया; नई क्यू-पीसीआर जांच से बैक्टीरिया की पहचान बेहतर होगी।

घोड़ों की दुनिया में एक ऐसी बीमारी मौजूद है, जो बिना कोई स्पष्ट लक्षण दिखाए भी चिंता बढ़ा सकती है। यह बीमारी है लेप्टोस्पायरोसिस, जो बैक्टीरिया से फैलती है और घोड़ों के साथ इंसानों तथा दूसरे जानवरों को भी अपनी चपेट में ले सकती है।

अमेरिका के कनेक्टिकट राज्य में हुए एक नए अध्ययन ने इस बीमारी के प्रसार को लेकर अहम जानकारी सामने रखी है। शोध में जांचे गए नमूनों में 61.5 प्रतिशत में लेप्टोस्पाइरा के एक या अधिक प्रकारों से जुड़े एंटीजन मिले। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि इतने प्रतिशत घोड़े संक्रमित थे, बल्कि यह उनके बैक्टीरिया के संपर्क में आने का संकेत है।

करीब 400 नमूनों की जांच

यह अध्ययन अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ कनेक्टिकट (यूकॉन) के वैज्ञानिकों ने किया। शोध का नेतृत्व कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर, हेल्थ एंड नेचुरल रिसोर्सेज के पैथोबायोलॉजी और वेटरनरी साइंस विभाग के द्वारा किया गया है। टीम ने लगभग 400 नमूनों की जांच की और लेप्टोस्पाइरा के 40 अलग-अलग प्रकारों के खिलाफ उनकी प्रतिक्रिया का अध्ययन किया। यह अध्ययन बीएमसी वेटरनरी रिसर्च नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।

नमूने कनेक्टिकट वेटरनरी मेडिकल डायग्नोस्टिक लैबोरेटरी से हासिल किए गए थे। ये नमूने घोड़ों के मालिकों ने दूसरी बीमारियों की जांच के लिए जमा कराए थे। अध्ययन का उद्देश्य यह समझना था कि घोड़े इस बैक्टीरिया के संपर्क में कितनी बार आते हैं और किन प्रकारों से उनका संपर्क अधिक होता है।

आंखों की बीमारी से लेकर गर्भपात तक का खतरा

घोड़ों में लेप्टोस्पायरोसिस का असर गंभीर हो सकता है। इससे गर्भपात, मृत बच्चे का जन्म, नवजात बच्चों की मृत्यु और गर्भाशय से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं। इसके अलावा, यह बीमारी इक्वाइन रिकरेंट यूवाइटिस (ईआरयू) से भी जुड़ी है, जिसे आम भाषा में ‘मून ब्लाइंडनेस’ कहा जाता है। यह आंखों में दर्द और सूजन पैदा कर सकती है तथा गंभीर मामलों में घोड़े की रोशनी तक छिन सकती है।

खेलकूद और दौड़ में इस्तेमाल होने वाले घोड़ों की क्षमता भी इससे प्रभावित हो सकती है। छोटे घोड़ों यानी फॉल्स में गंभीर बीमारी का खतरा विशेष रूप से रहता है। शोध के अनुसार, घोड़े कनेक्टिकट के लोगों के मनोरंजन, खेल और कारोबार का अहम हिस्सा हैं। ऐसे में उनकी प्रजनन संबंधी समस्याएं आर्थिक नुकसान का कारण भी बन सकती हैं।

पांच प्रमुख समूहों पर नजर

अध्ययन में डजासिमैन, ग्रिप्पोटीफोसा, ऑस्ट्रेलिस, पोमोना और इक्टेरोहैमरेजिया प्रमुख सीरोग्रुप के रूप में सामने आए। सीरोग्रुप बैक्टीरिया के ऐसे समूह होते हैं, जिनकी पहचान उनकी सतही एंटीजन संरचना के आधार पर की जाती है।

घोड़ों के लिए उपलब्ध टीका मुख्य रूप से पोमोना सीरोग्रुप को लक्षित करता है। अध्ययन में सकारात्मक परिणामों में पोमोना की हिस्सेदारी लगभग 10 प्रतिशत थी। हालांकि जांच से यह स्पष्ट नहीं हो सका कि मिले एंटीबॉडी प्राकृतिक संक्रमण के कारण बने थे या टीकाकरण के कारण। इसलिए केवल इस जांच के आधार पर घोड़ों में सक्रिय संक्रमण की पुष्टि नहीं की जा सकती।

गंदा पानी और संक्रमित पेशाब बन सकते हैं खतरा

लेप्टोस्पाइरा बैक्टीरिया संक्रमित जानवरों के सीधे संपर्क या दूषित वातावरण के माध्यम से फैल सकता है। नमी वाली परिस्थितियों में यह लंबे समय तक जीवित रह सकता है। रुका हुआ पानी, भारी बारिश और बाढ़ के बाद दूषित वातावरण संक्रमण का खतरा बढ़ा सकते हैं।

चिंता की बात यह है कि कुछ घोड़े बिना लक्षण दिखाए भी अपने पेशाब के जरिए बैक्टीरिया बाहर निकाल सकते हैं। इससे खेतों, अस्तबलों और आसपास के वातावरण के दूषित होने की आशंका रहती है। इंसानों में संक्रमण दुर्लभ होने के बावजूद संभव है, खासकर उन लोगों में जो संक्रमित जानवरों के साथ काम करते हैं।

बचाव में सफाई और सावधानी जरूरी

विशेषज्ञों के अनुसार, घोड़ों के मालिकों और देखभाल करने वालों को संक्रमित जानवरों के पेशाब तथा गर्भस्थ शिशु से जुड़े ऊतकों के सीधे संपर्क से बचना चाहिए। दस्ताने और अन्य उपयुक्त व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण इस्तेमाल करना, अस्तबलों की साफ-सफाई बनाए रखना तथा वन्यजीवों और दूषित पानी से घोड़ों का संपर्क कम करना जरूरी है। टीकाकरण के बारे में पशु चिकित्सक से सलाह लेना भी उपयोगी है।

अब दूसरे राज्यों तक बढ़ेगा शोध

शोधकर्ताओं की टीम अब न्यू इंग्लैंड के अन्य राज्यों में भी अध्ययन का विस्तार कर रही है। वैज्ञानिकों ने एक नया क्यू-पीसीआर परीक्षण भी विकसित किया है, जिससे रोग पैदा करने वाले लेप्टोस्पाइरा की विभिन्न प्रजातियों का सीधे पता लगाया जा सकेगा।

इस शोध से साफ है - घोड़ों की बीमारी केवल पशुओं तक सीमित चिंता नहीं है। जानवरों, इंसानों और पर्यावरण की सेहत एक-दूसरे से जुड़ी है। इसी सोच को ‘वन हेल्थ’ कहा जाता है। बीमारी की समय पर पहचान, बेहतर जांच और सावधानी से न केवल घोड़ों को बचाया जा सकता है, बल्कि इंसानों के स्वास्थ्य की रक्षा भी की जा सकती है।