एमएएसएलडी एक तेजी से बढ़ती लिवर बीमारी है, जो मोटापा, डायबिटीज और खराब जीवनशैली से जुड़ी होती है।
2023 में लगभग 1.3 अरब लोग एमएएसएलडी से प्रभावित थे, जो वैश्विक आबादी का करीब 16 प्रतिशत है।
2050 तक एमएएसएलडी के मामले बढ़कर लगभग 1.8 अरब तक पहुंचने का अनुमान।
यह बीमारी पुरुषों में अधिक पाई जाती है और मुख्य रूप से मध्यम आयु वर्ग और बुजुर्गों को प्रभावित करती है।
उच्च ब्लड शुगर, मोटापा और धूम्रपान एमएएसएलडी के मुख्य कारण हैं, जिनसे लिवर गंभीर रूप से प्रभावित होता है।
मेटाबोलिक लिवर बीमारी, जिसे पहले नॉन-अल्कोहोलिक फैटी लिवर डिजीज (एनएएफएलडी) कहा जाता था, अब मेटाबोलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टीटोटिक लिवर डिजीज (एमएएसएलडी) के नाम से जानी जाती है। यह एक ऐसी बीमारी है जिसमें लिवर या यकृत में जरूरत से ज्यादा चर्बी जमा हो जाती है। यह शराब के कारण नहीं होती, बल्कि शरीर के मेटाबॉलिज्म यानी चयापचय की गड़बड़ी से जुड़ी होती है।
यह बीमारी अक्सर मोटापे, ज्यादा ब्लड शुगर और खराब जीवनशैली से जुड़ी होती है। खास बात यह है कि यह लंबे समय तक बिना किसी स्पष्ट लक्षण के भी रह सकती है।
दुनिया भर में तेजी से बढ़ती समस्या
लैंसेट के एक नए वैश्विक अध्ययन के अनुसार एमएएसएलडी अब पूरी दुनिया में बहुत तेजी से बढ़ रही है। साल 2023 तक लगभग 1.3 अरब लोग इस बीमारी से प्रभावित हैं। इसका मतलब है कि दुनिया का करीब 16 प्रतिशत हिस्सा इस बीमारी के साथ जी रहा है।
साल 1990 में यह संख्या लगभग 50 करोड़ थी, लेकिन तीन दशकों में यह 143 प्रतिशत बढ़ गई है। अगर यही रफ्तार जारी रही, तो साल 2050 तक यह संख्या बढ़कर लगभग 1.8 अरब तक पहुंच सकती है। इसका मतलब है कि आने वाले समय में यह बीमारी और भी बड़ी स्वास्थ्य समस्या बन सकती है।
बीमारी बढ़ने के मुख्य कारण
इस बीमारी के बढ़ने के पीछे कई कारण हैं, लेकिन सबसे बड़ा कारण बदलती जीवनशैली है। आजकल लोग ज्यादा कैलोरी वाला खाना खाते हैं, फास्ट फूड का सेवन बढ़ गया है और शारीरिक गतिविधि कम हो गई है। इसके कारण मोटापा तेजी से बढ़ रहा है।
इसके अलावा, ब्लड शुगर यानी डायबिटीज के मामलों में भी बढ़ोतरी हो रही है। स्टडी में पाया गया है कि हाई ब्लड शुगर एमएएसएलडी का सबसे बड़ा कारण है। इसके बाद ज्यादा शरीर का वजन (बीएमआई) और धूम्रपान भी इस बीमारी को बढ़ाने में भूमिका निभाते हैं।
कौन लोग ज्यादा प्रभावित हैं?
यह बीमारी पुरुषों में महिलाओं की तुलना में ज्यादा पाई जाती है। उम्र के हिसाब से देखा जाए तो बुजुर्गों में इसका खतरा ज्यादा होता है, खासकर 80 से 84 साल की उम्र के लोगों में।
लेकिन दिलचस्प बात यह है कि सबसे ज्यादा संख्या उन लोगों की है जो उम्र में युवा या मध्यम आयु के हैं। पुरुषों में यह 35 से 39 साल के बीच ज्यादा दिखती है, जबकि महिलाओं में 55 से 59 साल की उम्र में ज्यादा मामले सामने आते हैं। इसका मतलब है कि यह बीमारी अब केवल बुजुर्गों की नहीं रही, बल्कि कामकाजी उम्र के लोग भी इसकी चपेट में आ रहे हैं।
अलग-अलग देशों में स्थिति
यह समस्या दुनिया के हर हिस्से में बढ़ रही है, लेकिन कुछ क्षेत्रों में यह ज्यादा गंभीर है। उत्तरी अफ्रीका और मध्य पूर्व के देशों में इसकी दर अन्य क्षेत्रों की तुलना में अधिक पाई गई है।
वहीं, पश्चिमी देशों में भी यह तेजी से बढ़ रही है। उदाहरण के लिए, यूनाइटेड किंगडम में 1990 से 2023 के बीच इसके मामलों में लगभग 33 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। ऑस्ट्रेलिया में यह 30 प्रतिशत और अमेरिका में 22 प्रतिशत बढ़ी है।
स्वास्थ्य पर असर और भविष्य की चिंता
हालांकि मामलों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन रिपोर्ट में यह भी पाया गया है कि बीमारी से होने वाला कुल नुकसान स्थिर रहा है। इसका मतलब है कि इलाज और पहचान में कुछ सुधार हुआ है, जिससे लोग ज्यादा समय तक बेहतर जीवन जी पा रहे हैं।
फिर भी, यह चिंता का विषय है क्योंकि शुरुआती चरण में बीमारी बढ़ती जा रही है। अगर इसे समय पर नहीं रोका गया, तो आगे चलकर यह गंभीर रूप ले सकती है, जैसे लिवर सिरोसिस या लिवर कैंसर।
लक्षण और बचाव
एमएएसएलडी की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसके शुरुआती चरण में कोई खास लक्षण नहीं दिखते। बहुत से लोगों को पता ही नहीं चलता कि उन्हें यह बीमारी है। कुछ लोगों को थकान, कमजोरी या पेट के दाहिने हिस्से में हल्का दर्द महसूस हो सकता है।
इस बीमारी से बचने के लिए सबसे जरूरी है स्वस्थ जीवनशैली अपनाना। संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और वजन को नियंत्रित रखना बहुत मददगार होता है। डायबिटीज और मोटापे को नियंत्रित करना इस बीमारी के खतरे को काफी हद तक कम कर सकता है।
एमएएसएलडी आज के समय की एक तेजी से बढ़ती वैश्विक बीमारी बन चुकी है। यह मुख्य रूप से खराब जीवनशैली और बढ़ते मोटापे का परिणाम है। अगर समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले दशकों में यह दुनिया भर में करोड़ों लोगों के लिए गंभीर स्वास्थ्य समस्या बन सकती है। इसलिए जागरूकता, सही खानपान और नियमित व्यायाम इस बीमारी से बचाव के सबसे महत्वपूर्ण उपाय हैं।