लू के दौरान ओजोन प्रदूषण भारत में सुरक्षित सीमा से अधिक बढ़कर दिल और फेफड़ों की बीमारियों का खतरा बढ़ाता है।
नए अध्ययन में पाया गया कि गर्मी के दिनों में ओजोन स्तर 110 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुंच सकता है।
ओजोन प्रदूषण से पूरे मौसम में लगभग 26,500 मौतें जुड़ी, जिनमें हृदय रोग और सीओपीडी प्रमुख कारण बताए गए हैं।
लू के कारण बढ़े प्रदूषण से करीब 830 अतिरिक्त मौतें दर्ज, जबकि प्रभाव लू समाप्त होने के बाद तीन-चार दिन रहता है।
अध्ययन बताता है कि भारत में 188 लू की घटनाएं दर्ज हुई, जिनमें गर्मी और प्रदूषण का स्वास्थ्य पर मिला-जुला असर पड़ा।
भारत में गर्मियों के प्री-मानसून के महीनों में लू या हीटवेव पहले से ही स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बनती है। लेकिन अब एनपीजे क्लीन एयर पत्रिका में प्रकाशित एक नए अध्ययन ने चेतावनी दी है कि यह स्थिति और भी खतरनाक हो जाती है, क्योंकि लू के दौरान सतही ओजोन प्रदूषण तेजी से बढ़ जाता है।
यह ओजोन गैस सीधे बाहर नहीं निकलती, बल्कि सूरज की तेज रोशनी में हवा में मौजूद अन्य प्रदूषकों की रासायनिक प्रतिक्रिया से बनती है। यह गैस दिल और फेफड़ों के लिए हानिकारक मानी जाती है।
डब्ल्यूएचओ की सुरक्षित सीमा से ऊपर ओजोन स्तर
अध्ययन के अनुसार, उत्तर भारत में लू के दौरान सतही ओजोन का स्तर 85 से 110 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुंच जाता है। जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, इसकी सुरक्षित सीमा 70 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर मानी जाती है।
चिंताजनक बात यह है कि यह प्रदूषण स्तर सिर्फ उत्तर भारत तक सीमित नहीं है। अध्ययन बताता है कि देश के लगभग हर हिस्से में यह सीमा पार हो जाती है। हालांकि लू खत्म होने के तीन से चार दिनों के भीतर ओजोन का स्तर फिर से कम हो जाता है।
लू बढ़ाती है प्रदूषण की रासायनिक प्रक्रिया
वैज्ञानिकों के अनुसार ओजोन हवा में सीधे नहीं छोड़ी जाती, बल्कि यह तब बनती है जब नाइट्रोजन ऑक्साइड और फॉर्मल्डिहाइड जैसे गैसें तेज धूप में प्रतिक्रिया करती हैं। लू के दौरान तापमान बहुत अधिक होने से यह प्रक्रिया और तेज हो जाती है। यही कारण है कि गर्म दिनों में ओजोन का स्तर अचानक बढ़ जाता है।
अध्ययन में बताया गया है कि नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और अन्य गैसें पहले से ही सांस संबंधी बीमारियों को नुकसान पहुंचाती हैं, और जब ये ओजोन बनाती हैं, तो असर और भी गंभीर हो जाता है।
हजारों मौतों से जुड़ा अनुमान
इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने भारत में 2004 से 2024 के बीच हुए आंकड़ों का विश्लेषण किया। उन्होंने पाया कि केवल लू के दिनों में ही ओजोन प्रदूषण से करीब 26,500 मौतें इस्केमिक हार्ट डिजीज और क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) से जुड़ी हो सकती हैं।
लेकिन यह संख्या पूरे मौसम का कुल प्रभाव दिखाती है, न कि सिर्फ लू का। जब केवल लू के कारण बढ़े हुए प्रदूषण के प्रभाव को अलग करके देखा गया, तो अनुमान लगाया गया कि लगभग 490 अतिरिक्त मौतें दिल की बीमारियों से और 342 मौतें सीओपीडी से जुड़ी हो सकती हैं। यानी कुल मिलाकर लगभग 830 अतिरिक्त मौतें। शोध पत्र में शोधकर्ताओं के हवाले से कहा गया है कि ये आंकड़े सीधे गिने नहीं गए हैं, बल्कि वैज्ञानिक मॉडल के आधार पर अनुमानित हैं।
कैसे तैयार किए गए ये आंकड़े
अध्ययन में वैज्ञानिकों ने भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के दो दशकों के तापमान रिकॉर्ड, उपग्रह के आंकड़ों और वैश्विक मौसम मॉडल का उपयोग किया। इसके आधार पर उन्होंने 188 लू की घटनाओं की पहचान की गई।
शोधकर्ताओं के अनुसार, कई शहरों में लगातार ओजोन माप उपलब्ध नहीं था, इसलिए उन्हें अनुमानित मॉडल पर निर्भर रहना पड़ा। इसका मतलब है कि यह अध्ययन वास्तविक आंकड़ों के बजाय वैज्ञानिक संबंधों पर आधारित अनुमान प्रस्तुत करता है।
जलवायु परिवर्तन और बढ़ता खतरा
अध्ययन में यह भी बताया गया है कि हाल के वर्षों में लू की घटनाएं बढ़ी हैं, खासकर 2010, 2016, 2019 और 2024 जैसे सालों में, जो एल नीनो प्रभाव से जुड़े रहे हैं। पश्चिमी हिमालय क्षेत्र में ओजोन प्रदूषण में सबसे तेज वृद्धि देखी गई है, जो कई बार सुरक्षित सीमा से 100 फीसदी से भी अधिक रहा।
वैज्ञानिकों का कहना है कि “गर्मी और ओजोन का संयुक्त प्रभाव” तेजी से बढ़ रहा है, और इसे नियंत्रित करने के लिए जलवायु नीति और वायु गुणवत्ता नीति को साथ मिलाकर काम करना होगा।
नीति और भविष्य की चुनौती
यह अध्ययन ऐसे समय में आया है जब भारत में लू को लेकर नीतिगत चर्चा तेज है। हाल ही में 16वीं वित्त आयोग ने सुझाव दिया है कि लू और बिजली गिरने जैसी घटनाओं को आधिकारिक आपदा घोषित किया जाए, ताकि राज्यों को राहत और तैयारी के लिए अधिक संसाधन मिल सकें।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर प्रदूषण और गर्मी को अलग-अलग देखने के बजाय एक साथ देखा जाए, तो इससे बेहतर स्वास्थ्य नीतियां बनाई जा सकती हैं और हजारों जानें बचाई जा सकती हैं।