बढ़ती इंसानी महत्वाकांक्षा के चलते दुनिया भर में तेजी से किया जा रहा है जंगलों का विनाश; फोटो: आईस्टॉक 
स्वास्थ्य

उजड़ते जंगल, बढ़ती बीमारियां: इंसानी दखल से बदला बीमारियों का भूगोल, बढ़ रहा महामारी का खतरा

एक अध्ययन में 58,318 प्रकोपों के वैश्विक विश्लेषण से पता चला है कि इंसानी हस्तक्षेप बीमारियों के फैलने के खतरे को बढ़ा रहा है, लेकिन हर बीमारी के पीछे पर्यावरणीय कारण अलग-अलग हैं

Lalit Maurya

  • नेचर में प्रकाशित एक नए अध्ययन में दुनिया के 169 देशों में 32 संक्रामक बीमारियों के 58,318 प्रकोपों का विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि इंसानी गतिविधियों ने बीमारियों के फैलने के भौगोलिक पैटर्न पर स्पष्ट छाप छोड़ी है।

  • जंगलों के छोटे-छोटे हिस्सों में बंटने से इंसानों और वन्यजीवों के बीच संपर्क बढ़ सकता है, जबकि पारिस्थितिकी तंत्र में बदलाव और बारिश के लंबे समय तक बदलते पैटर्न डेंगू और जीका जैसी बीमारियों के जोखिम को प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि, हर बीमारी के पीछे पर्यावरणीय कारण एक जैसे नहीं हैं।

  • अध्ययन का एक और चिंताजनक निष्कर्ष है कि निकटतम स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचने में हर अतिरिक्त घंटे के साथ बीमारी के प्रकोप की रिपोर्ट दर्ज होने की संभावना औसतन 32 फीसदी घट जाती है।

  • ऐसे में वैज्ञानिकों ने इंसानों, जानवरों और पर्यावरण की सेहत को एक साथ ध्यान में रखने वाले ‘वन हेल्थ’ दृष्टिकोण, बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं और मजबूत निगरानी व्यवस्था पर जोर दिया है। समय रहते खतरे की पहचान और प्रकृति की रक्षा ही भविष्य में बड़े स्वास्थ्य संकटों को रोकने में अहम भूमिका निभा सकती है।

इंसानों ने अपनी तरक्की की होड़ में कुदरत की सीमाओं को लांघना शुरू कर दिया है, लेकिन इसकी भारी कीमत हमें खुद ही चुकानी पड़ रही है।

रिसर्च से पता चला है कि कटते जंगल, प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र का बिखरना और जलवायु परिवर्तन के कारण बारिश के बदलते पैटर्न केवल पर्यावरण को ही नुकसान नहीं पहुंचा रहे, बल्कि इंसानों को नई संक्रामक बीमारियों के खतरे के भी करीब ला रहे हैं।

जंगलों और बस्तियों के बीच सिमटती दूरी, खेतों का होता विस्तार और इंसानों तथा वन्यजीवों के बीच बढ़ता संपर्क जानवरों से इंसानों में बीमारियां के फैलने की आशंका को बढ़ा रहा है। चिंता की बात है कि मच्छरों और किलनी जैसे जीवों से फैलने वाली बीमारियों का प्रकोप भी तेजी से बढ़ रहा है। यह जानकारी यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (यूसीएल) सहित दुनिया के कई प्रतिष्ठित संस्थानों से जुड़े वैज्ञानिकों द्वारा किए नए अध्ययन में सामने आई है।

नेचर जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने दुनिया भर के 169 देशों में 32 संक्रामक बीमारियों के 58,318 प्रकोपों का विश्लेषण किया है। यह उभरती संक्रामक बीमारियों के पर्यावरणीय कारणों पर आंकड़ों की मदद से किए अब तक के सबसे बड़े आकलनों में से एक है।

शोधकर्ताओं ने पाया है कि इंसानी गतिविधियों ने दुनिया में इन बीमारियों के फैलने के भौगोलिक पैटर्न पर स्पष्ट छाप छोड़ी है। हालांकि, हर बीमारी के फैलने के पीछे एक जैसे कारण नहीं हैं। इसका मतलब है कि सभी संक्रामक बीमारियों को रोकने के लिए एक ही तरह का उपाय कारगर नहीं हो सकते।

बिखरते जंगलों से बढ़ रहा इंसानों के लिए खतरा

अध्ययन के मुताबिक, उन क्षेत्रों में बीमारियों के प्रकोप का खतरा आम तौर पर अधिक पाया गया, जहां इंसान और मवेशी ऐसे वन क्षेत्रों के करीब रहते हैं जो सड़कों, खेतों, बस्तियों और दूसरी मानवीय गतिविधियों के कारण छोटे-छोटे हिस्सों में बंट गए हैं।

इन बदले हुए प्राकृतिक आवासों में कुछ वन्यजीव बेहतर ढंग से पनप सकते हैं। ऐसे में इन जानवरों के साथ इंसानों का संपर्क बढ़ने से रोगाणुओं के जानवरों से इंसानों तक पहुंचने की आशंका भी बढ़ सकती है।

गौरतलब है कि इंसानों और जानवरों के बीच इस तरह फैलने वाली बीमारियों को जूनोटिक डिजीज कहा जाता है।

कोरोना वायरस से होने वाली बीमारियां, इबोला और एमपॉक्स इसके कुछ ज्वलंत उदाहरण हैं। हालांकि, अध्ययन में यह भी सामने आया है कि जंगलों का कटना, बढ़ता तापमान और खेती का गहन विस्तार जैसी गतिविधियां सभी जूनोटिक बीमारियों के प्रकोप का एक जैसा अनुमान नहीं लगा सकतीं। अलग-अलग बीमारियों पर इनका अलग-अलग असर हो सकता है।

इसलिए केवल जंगलों के हो रहे विनाश या किसी एक पर्यावरणीय बदलाव के आधार पर यह तय कर पाना संभव नहीं है कि किसी क्षेत्र में जानवरों से इंसानों में फैलने वाली बीमारी का प्रकोप कब और कहां होगा।

बारिश के बदलते मिजाज से बढ़ रहा डेंगू, जीका जैसी बीमारियों का खतरा

रिसर्च में मच्छर, किलनी और पिस्सू जैसे जीवों के जरिए फैलने वाली बीमारियों के मामले में इंसानी गतिविधियों और पर्यावरणीय बदलावों का संबंध अधिक स्पष्ट दिखाई दिया।

वैज्ञानिकों को ऐसे क्षेत्रों में डेंगू और जीका जैसी बीमारियों के प्रकोप का जोखिम अधिक मिला, जहां प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र बुरी तरह खंडित हो चुके हैं और जलवायु परिवर्तन के कारण लंबे समय से बारिश में गिरावट देखी जा रही है। इससे पता चलता है कि पर्यावरण में होने वाले बदलाव बीमारियों के फैलने के तरीकों को प्रभावित कर सकते हैं।

हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि बारिश में कमी आने से हर जगह इन बीमारियों का खतरा बढ़ेगा। इसका असर स्थानीय पर्यावरण, बीमारी फैलाने वाले जीवों और दूसरी परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि उभरती संक्रामक बीमारियों के खतरे को समझने के लिए क्षेत्र और बीमारी के हिसाब से आंकड़े जुटाना जरूरी है। इससे यह पहचानने में मदद मिल सकती है कि किस इलाके में किस बीमारी के फैलने की आशंका अधिक है और उसे रोकने के लिए किन उपायों की जरूरत होगी।

अस्पतालों से दूरी भी छिपा सकती है बीमारी की असली तस्वीर

अध्ययन का एक अहम निष्कर्ष यह भी है कि किसी बीमारी का प्रकोप दर्ज होना केवल संक्रमण फैलने पर निर्भर नहीं करता, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करता है कि लोगों की स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच कितनी आसान है।

शोधकर्ताओं के अनुसार, निकटतम स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचने में लगने वाले यात्रा समय में हर एक घंटे की बढ़ोतरी के साथ किसी उभरती संक्रामक बीमारी के प्रकोप की रिपोर्ट दर्ज होने की संभावना औसतन 32 फीसदी कम हो गई। इसका मतलब है कि जिन इलाकों में अस्पताल, स्वास्थ्य केंद्र और बीमारी की निगरानी करने वाली व्यवस्थाएं बेहतर हैं, वहां प्रकोपों की पहचान और रिपोर्टिंग अधिक हो सकती है।

इसके उलट, दूरदराज के इलाकों में संक्रमण फैलने के बावजूद उसकी समय पर पहचान नहीं हो पाती।

इसलिए किसी क्षेत्र में बीमारी के कम मामले दर्ज होने का मतलब यह जरूरी नहीं कि वहां संक्रमण का खतरा भी कम है। संभव है कि वहां जांच, स्वास्थ्य सेवाओं और निगरानी की कमी के कारण बीमारी के वास्तविक फैलाव का पता ही न चल पा रहा हो। यह निष्कर्ष उन इलाकों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है जहां स्वास्थ्य सेवाएं सीमित हैं और लोगों को इलाज के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।

इंसान, जानवर और पर्यावरण की सेहत एक-दूसरे से जुड़ी

शोधकर्ताओं ने संक्रामक बीमारियों और भविष्य में संभावित महामारियों से निपटने के लिए अधिक सक्रिय और व्यापक रणनीति अपनाने पर जोर दिया है। इसमें स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना, बीमारियों की निगरानी के लिए देशों के बीच समन्वय बढ़ाना और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा करने वाले उपाय शामिल हैं।

फ्लोरिडा विश्वविद्यालय की प्रोफेसर और अध्ययन से जुड़ी शोधकर्ता सैडी रयान के मुताबिक, जानवरों से इंसानों में फैलने वाली बीमारियों के प्रकोप के पीछे कई परस्पर जुड़े कारण होते हैं। इन्हें इंसान, जानवर और पर्यावरण के संबंधों से अलग करके नहीं समझा जा सकता।

इसीलिए ‘वन हेल्थ’ यानी एकीकृत स्वास्थ्य दृष्टिकोण की जरूरत है, जिसमें इंसानों, जानवरों और पर्यावरण के स्वास्थ्य को एक-दूसरे से जुड़ा हुआ माना जाता है। इसके तहत बीमारी की निगरानी और रोकथाम के उपाय भी मिलकर तैयार किए जाते हैं।

यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन और अध्ययन से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता रॉरी गिब के मुताबिक, कोई एक पर्यावरणीय पैटर्न यह नहीं बता सकता कि उभरती संक्रामक बीमारियों का प्रकोप कहां होगा। अलग-अलग बीमारियों के पीछे इंसानी गतिविधियों की भूमिका भी अलग होती है।

उनका कहना है कि लोगों की स्वास्थ्य सेवाओं तक बेहतर पहुंच बनाना और बीमारी की निगरानी मजबूत करना बेहद जरूरी है, ताकि किसी भी बीमारी के प्रकोप का समय रहते पता लगाया जा सके और उसे महामारी या वैश्विक महामारी बनने से पहले रोकने की कोशिश की जा सके।

कुल मिलाकर, इस अध्ययन का संदेश बेहद स्पष्ट है, बीमारियों से बचाव केवल अस्पतालों और दवाओं तक सीमित नहीं हो सकता।

इसके लिए प्रकृति के साथ इंसानों के बिगड़ते रिश्तों को समझना, वन्यजीवों के आवासों की रक्षा करना और उन समुदायों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाना भी जरूरी है, जो अक्सर बीमारी की निगरानी और इलाज की व्यवस्था से दूर रह जाते हैं। समय रहते खतरे को पहचानना ही किसी स्थानीय प्रकोप को बड़े स्वास्थ्य संकट में बदलने से रोकने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।