नसों की चोट के बाद बीआरएएफ प्रोटीन दर्द के संकेतों को बढ़ाकर लंबे समय तक दर्द बनाए रखने में भूमिका निभा सकता है।
वैज्ञानिकों ने पाया कि बीआरएएफ रीढ़ की हड्डी में एनएमडीए रिसेप्टर की गतिविधि बढ़ाकर दर्द के संकेतों को मजबूत करता है।
कैंसर की दवा वेमुराफेनिब ने पशु मॉडलों में छूने, दबाव और गर्मी से होने वाली दर्द संवेदनशीलता घटाई।
बीआरएएफ जीन हटाने से लगातार दर्द कम हुआ, जबकि बीआरएएफ सक्रिय करने पर बिना नसों की चोट भी दर्द बढ़ा।
शोध अभी शुरुआती चरण में है; इंसानों में सुरक्षा, सही खुराक और प्रभाव जानने के लिए क्लिनिकल परीक्षण जरूरी होंगे।
नसों में चोट लगने के बाद होने वाला दर्द कई बार जल्दी ठीक नहीं होता। यह दर्द महीनों या वर्षों तक बना रह सकता है। इसे न्यूरोपैथिक दर्द यानी नसों से जुड़ा पुराना दर्द कहा जाता है। आम दर्द की दवाएं ऐसे दर्द में कई बार पूरी तरह राहत नहीं दे पाती हैं। अब अमेरिका के द यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास एमडी एंडरसन कैंसर सेंटर के वैज्ञानिकों ने इस दर्द के पीछे एक ऐसे प्रोटीन की भूमिका खोजी है, जो अब तक मुख्य रूप से कैंसर से जुड़ा माना जाता था।
वैज्ञानिकों के अनुसार, बीआरएएफ नाम का यह प्रोटीन नसों को नुकसान पहुंचने के बाद दर्द के संकेतों को बढ़ाने और लंबे समय तक बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। शुरुआती प्रयोगों में बीआरएएफ को रोकने वाली कैंसर की दवाओं से दर्द के प्रति संवेदनशीलता कम हुई है।
बीआरएएफ कैसे बढ़ाता है दर्द?
शोधकर्ताओं ने साइंस सिग्नलिंग पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन में यह समझने की कोशिश की कि नसों को चोट लगने के बाद शरीर में दर्द के संकेत इतने मजबूत क्यों हो जाते हैं। इसके लिए उन्होंने एनएमडीए रिसेप्टर नाम के प्रोटीन चैनलों पर ध्यान दिया। ये रिसेप्टर मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी में तंत्रिका कोशिकाओं के बीच संदेश पहुंचाने में मदद करते हैं।
नसों में चोट लगने के बाद एनएमडीए रिसेप्टर जरूरत से ज्यादा सक्रिय हो सकते हैं। इससे दर्द के संकेत और मजबूत हो जाते हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि इस प्रक्रिया में बीआरएएफ प्रोटीन की अहम भूमिका होती है।
प्रयोगों में पाया गया कि नसों को नुकसान पहुंचने के बाद बीआरएएफ कुछ बाहरी संवेदनशील नसों से रीढ़ की हड्डी तक पहुंच सकता है। वहां यह ऐसी आणविक प्रक्रिया को सक्रिय करता है, जिससे एनएमडीए रिसेप्टर की गतिविधि बढ़ जाती है। इसका परिणाम दर्द के संकेतों के बढ़ने के रूप में सामने आता है।
कैंसर की दवाओं से कम हुई दर्द की संवेदनशीलता
इस खोज को परखने के लिए वैज्ञानिकों ने बीआरएएफ को रोकने वाली दवा वेमुराफेनिब और एमईके को रोकने वाली दवा सेलुमेटिनिब का इस्तेमाल किया। ये दोनों दवाएं कैंसर के इलाज में इस्तेमाल की जाती हैं।
जानवरों पर किए गए प्रयोगों में इन दवाओं ने नसों की चोट के बाद पैदा हुई दर्द की संवेदनशीलता को कम किया। छूने, दबाव और गर्मी जैसी चीजों के प्रति जानवरों की संवेदनशीलता कम देखी गई।
खास बात यह रही कि जिन मॉडलों में नसों को नुकसान नहीं हुआ था, उनमें इन दवाओं ने सामान्य संवेदनाओं को प्रभावित नहीं किया। इससे संकेत मिलता है कि बीआरएएफ को रोकने से असामान्य या अत्यधिक दर्द के संकेतों को कम किया जा सकता है, जबकि सामान्य संवेदना बनी रह सकती है।
जीन पर प्रयोग से भी मिली पुष्टि
शोधकर्ताओं ने जीन से जुड़े प्रयोग भी किए। जब बीआरएएफ जीन को हटाया गया तो लंबे समय तक रहने वाली दर्द की संवेदनशीलता कम हो गई। इसके विपरीत, जब बीआरएएफ को सीधे सक्रिय किया गया तो बिना नसों की चोट के भी दर्द जैसी संवेदनशीलता दिखाई दी।
इन परिणामों से वैज्ञानिकों को यह विश्वास और मजबूत हुआ कि बीआरएएफ केवल दर्द बढ़ाने में ही नहीं, बल्कि नसों की चोट के बाद दर्द को शुरू करने और लंबे समय तक बनाए रखने में भी भूमिका निभा सकता है।
शोध में मानव रीढ़ की हड्डी के ऊतक के नमूनों का भी अध्ययन किया गया। इनमें बीआरएएफ से जुड़े प्रोटीन और एनएमडीए रिसेप्टर के बीच संबंध के संकेत मिले। हालांकि, यह अभी इस बात का प्रमाण नहीं है कि बीआरएएफ को रोकने वाली दवाएं इंसानों में दर्द का प्रभावी इलाज हैं।
इलाज की नई संभावना, लेकिन अभी लंबा रास्ता
इस खोज की सबसे बड़ी खासियत यह है कि बीआरएएफ और एमईके को निशाना बनाने वाली कुछ दवाएं पहले से ही कैंसर के इलाज के लिए उपलब्ध हैं। इसलिए भविष्य में इन्हें नए उपयोग के लिए जांचने की संभावना पैदा होती है। नई दवा पूरी तरह विकसित करने की तुलना में पहले से मौजूद दवाओं का नए रोग में परीक्षण करना कई बार तेज हो सकता है।
लेकिन वैज्ञानिकों ने साफ किया है कि अभी इन दवाओं को पुराने नसों के दर्द के इलाज के लिए इस्तेमाल करने की सलाह नहीं दी जा सकती। अब तक के परिणाम प्रयोगशाला और पशु मॉडल तक सीमित हैं।
इंसानों पर परीक्षण से पहले दवा की सही मात्रा, शरीर में पहुंचाने का तरीका और संभावित दुष्प्रभावों को समझना जरूरी होगा। वैज्ञानिक यह भी जानना चाहते हैं कि नसों को चोट लगने के बाद बीआरएएफ रीढ़ की हड्डी तक क्यों और कैसे पहुंचता है।
फिलहाल यह अध्ययन पुराने और मुश्किल से नियंत्रित होने वाले नसों के दर्द के इलाज की दिशा में एक नई उम्मीद जरूर पैदा करता है। अगर आगे के मानव परीक्षणों में भी यही परिणाम मिले, तो कैंसर के लिए विकसित की गई बीआरएएफ को निशाना बनाने वाली दवाएं भविष्य में लंबे समय से दर्द झेल रहे मरीजों के लिए एक नए उपचार का रास्ता खोल सकती हैं।