देश के दो अलग-अलग राज्यों से जुड़े मामलों में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने पर्यावरण संरक्षण को लेकर सख्त रुख अपनाया है।
उत्तराखंड में जंगलों में आग की घटनाओं और वन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए ट्रिब्यूनल ने विभाग से उसकी वास्तविक क्षमता, उपलब्ध मानव संसाधन और वनाग्नि से निपटने की तैयारियों का विस्तृत ब्यौरा मांगा है।
यह मामला एक ऐसी शिकायत से जुड़ा है, जिसमें वन क्षेत्र में सूखी पत्तियां जलाए जाने के बावजूद अधिकारियों द्वारा कार्रवाई न करने का आरोप लगाया गया था।
वहीं, ओडिशा के मयूरभंज जिले में पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील वन भूमि पर प्रस्तावित होटल और रिसॉर्ट परियोजना पर एनजीटी ने तत्काल रोक लगा दी है। ट्रिब्यूनल ने जिला प्रशासन और पुलिस को भी निर्देश दिए हैं कि विवादित भूमि पर किसी प्रकार का नया निर्माण न होने दिया जाए।
याचिका में आरोप है कि वन भूमि को निजी परियोजना के लिए हस्तांतरित करने का प्रयास किया जा रहा है।
दोनों आदेश इस बात का संकेत हैं कि पर्यावरणीय नियमों के पालन, वन संरक्षण और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर न्यायपालिका अब अधिक सतर्क और सक्रिय भूमिका निभा रही है। साथ ही ये मामले विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन की चुनौती को भी उजागर करते हैं।
उत्तराखंड के जंगलों में आग की घटनाओं और वन विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने गंभीर रुख अपनाया है। इस मामले में 26 मई, 2026 को दिए अपने आदेश में एनजीटी ने देहरादून स्थित प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख को अतिरिक्त जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
एनजीटी ने वन विभाग से उसके कार्यबल की वास्तविक स्थिति पर विस्तृत जानकारी मांगी है। इसके तहत विभाग में कार्यरत कुल अधिकारियों और कर्मचारियों की संख्या, जनगणना कार्य में लगाए गए कर्मियों का ब्यौरा, वन संरक्षण जैसे जरूरी कार्यों के लिए उपलब्ध कर्मचारियों की जानकारी देने को कहा गया है।
इसके अलावा, वनाग्नि जैसी आपात स्थितियों से निपटने के लिए तैयार कंटीजेंसी प्लान और उसके तहत अधिकारियों व कर्मचारियों की तैनाती की रूपरेखा भी प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं।
एक शिकायत जिसने खड़े किए बड़े सवाल
यह मामला 2023 में आवेदक दीपिका खारी द्वारा भेजी गई एक पत्र याचिका से जुड़ा है। याचिका में ऋषिकेश-देहरादून रोड पर बड़कोट वन क्षेत्र में सूखी पत्तियों को जलाए जाने की शिकायत की गई थी। उन्होंने याचिका में बताया कि चंद्रभागा नदी के पास यात्रा के दौरान उन्होंने वन क्षेत्र के कई स्थानों पर सूखी पत्तियों को जलते हुए देखा।
इस संबंध में उन्होंने वन विभाग और पुलिस अधिकारियों को शिकायत भी की, लेकिन न तो कोई रिपोर्ट दर्ज की गई और न ही कोई कार्रवाई की गई।
ऐसे में एनजीटी अब यह जानना चाहता है कि वन विभाग के पास जंगलों में आग जैसी आपदाओं से निपटने के लिए पर्याप्त मानव संसाधन और प्रभावी व्यवस्था मौजूद है या नहीं।
पर्यावरण बनाम विकास: मयूरभंज में संवेदनशील वन क्षेत्र में होटल परियोजना पर एनजीटी ने लगाया ब्रेक
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने ओडिशा के मयूरभंज में शामखुंटा तहसील स्थित लक्ष्मीपोसी गांव में प्रस्तावित होटल और रिसॉर्ट परियोजना के निर्माण कार्य पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। 26 मई 2026 को जारी आदेश में ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट किया कि अगले आदेश तक प्रोजेक्ट साइट पर कोई भी नया निर्माण नहीं होना चाहिए।
एनजीटी ने मामले की गंभीरता को देखते हुए मयूरभंज के जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षक को भी निर्देश दिया है कि वे यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाएं कि विवादित भूमि पर किसी प्रकार का निर्माण कार्य आगे न बढ़ सके।
क्या है पूरा विवाद
यह पूरा विवाद लक्ष्मीपोसी गांव की पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील वन भूमि से जुड़ा है। एनजीटी में दायर याचिका में आवेदक ने आरोप लगाया है कि इस संवेदनशील वन भूमि को एक निजी होटल और रिसॉर्ट परियोजना के लिए ओडिशा इंडस्ट्रियल इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (आईडीसीओ) के पक्ष में हस्तांतरित करने की कोशिश की जा रही है।
गौरतलब है कि इससे पहले 6 फरवरी 2026 को एनजीटी ने मामले से जुड़े पक्षों को नोटिस जारी करने के निर्देश दिए थे।
इनमें ओडिशा इंडस्ट्रियल इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (आईडीसीओ) के प्रबंध निदेशक, ओडिशा सरकार के मुख्य सचिव, प्रभागीय वन अधिकारी (डीएफओ), इंडस्ट्रियल प्रमोशन एंड इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन ऑफ ओडिशा लिमिटेड (आईपीआईसीओएल) के प्रबंध निदेशक तथा होटल सोनार बांग्ला के प्रबंध निदेशक शामिल हैं।
यह मामला एक बार फिर विकास परियोजनाओं और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन को लेकर उठ रहे सवालों को उजागर करता है। अब सभी की नजरें एनजीटी की अगली सुनवाई और जांच के निष्कर्षों पर टिकी है।