प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक 
जंगल

दिल्ली में कटे हर पेड़ का सच आएगा सामने, एनजीटी ने पांच साल का रिकॉर्ड सार्वजनिक करने का दिया आदेश

पहली बार है जब एनजीटी ने दिल्ली में अवैध रूप से काटे गए पेड़ों से जुड़ी शिकायतों और कार्रवाई का पूरा रिकॉर्ड जनता के सामने रखने का आदेश दिया है।

Susan Chacko, Lalit Maurya

  • नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने दिल्ली में पेड़ों की अवैध कटाई पर सख्त रुख अपनाते हुए एक ऐतिहासिक आदेश जारी किया है।

  • पहली बार अदालत ने पिछले पांच वर्षों में पेड़ों की अवैध कटाई से जुड़ी सभी शिकायतों, उन पर हुई कार्रवाई और उनके बड़े में कितने पेड़ लगाए गए, उस सबका पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक करने का निर्देश दिया है।

  • यह जानकारी तीन महीने के भीतर वन विभाग या दिल्ली सरकार की वेबसाइट पर डालनी होगी, ताकि जनता देख सके कि उनकी शिकायतों पर वास्तव में क्या एक्शन लिया गया।

  • अदालत ने साफ कहा कि पेड़ों की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार अधिकारी न तो अवैध कटाई रोक पाए और न ही शिकायतों पर समय पर कार्रवाई कर सके। साथ ही, कटे पेड़ों के बदले नए पौधे लगाने के आदेशों का पालन भी लंबे समय तक नहीं हुआ।

  • मामला मंगोलपुरी-सुल्तानपुरी नाले के आसपास ग्रीन बेल्ट में 2023 से 2025 के बीच हुई अवैध कटाई से जुड़ा है। जांच में 2023 में पेड़ कटने के प्रमाण मिले और मई 2025 के निरीक्षण में 40 पेड़ बिना अनुमति काटे जाने की पुष्टि हुई। इसके बदले 400 देशी पेड़ लगाने का आदेश दिया गया, लेकिन अब तक यह स्पष्ट नहीं है कि पौधारोपण हुआ या नहीं।

  • एनजीटी ने माना कि शिकायतें वर्षों तक फाइलों में दबी रहीं। इस आदेश के बाद अब दिल्ली प्रशासन को हर कटे पेड़ और उसकी भरपाई का हिसाब जनता के सामने रखना होगा। यह फैसला दिल्ली के पर्यावरण के लिए एक बड़ी जीत है। यह पहली बार है जब सिस्टम को 'कागजों' से बाहर निकलकर जमीन पर जवाब देना होगा।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने दिल्ली में अवैध रूप से काटे जा रहे पेड़ों पर सख्त रुख अपनाते हुए एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि राजधानी में पेड़ों की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार अधिकारी न केवल अवैध कटाई रोकने में विफल रहे, बल्कि शिकायतों पर समय रहते कार्रवाई भी नहीं कर सके।

12 मई 2026 को दिए अपने इस ऐतिहासिक आदेश में न्यायमूर्ति अरुण कुमार त्यागी की पीठ ने दिल्ली के प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख को निर्देश दिया कि पिछले पांच सालों में पेड़ों को अवैध रूप से काटे जाने की जितनी भी शिकायतें आई हैं, उन सभी का ट्री ऑफिसर्स से ब्यौरा जुटाया जाए।

5 साल का 'कच्चा चिट्ठा' होगा सार्वजनिक

इसमें शिकायतों पर क्या कार्रवाई हुई, क्या आदेश दिए गए और उन आदेशों के तहत क्षतिपूर्ति के रूप में कितने पेड़ (कम्पेन्सेटरी प्लांटेशन) लगाए गए, यह सारी जानकारी शामिल होनी चाहिए। एनजीटी ने यह भी कहा कि यह पूरी जानकारी तीन महीने के भीतर वन एवं वन्यजीव विभाग या दिल्ली सरकार की वेबसाइट पर सार्वजनिक की जाए, ताकि लोगों को पता चल सके कि उनकी शिकायतों पर वास्तव में क्या कार्रवाई हुई।

साथ ही अदालत ने दिल्ली के प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख को निर्देश दिया कि वे तीन महीने के भीतर सभी ट्री ऑफिसर्स को स्पष्ट आदेश जारी करें।

इसमें कहा जाए कि पेड़ों की अवैध कटाई से जुड़ी शिकायतों पर दिल्ली वृक्ष संरक्षण अधिनियम, 1994 के तहत तुरंत कार्रवाई की जाए और तय समय सीमा के भीतर उन शिकायतों का निपटारा किया जाए। मतलब कि अब अधिकारी शिकायतों से जुड़ी फाइलों को दबाकर नहीं बैठ सकेंगे।

न्यायमूर्ति अरुण कुमार त्यागी ने अपने आदेश में यह भी कहा कि दिल्ली वृक्ष संरक्षण अधिनियम के तहत दिए गए आदेशों के मुताबिक जहां पेड़ काटे गए हैं, वहां बदले में नए पेड़ लगाए जाना जरूरी है। यह काम आने वाले मानसून में या आदेश के एक साल के भीतर पूरा होना चाहिए।

एनजीटी ने दिल्ली के प्रधान मुख्य वन संरक्षक, उत्तर वन प्रभाग के उप वन संरक्षक, सुल्तानपुरी पुलिस स्टेशन के थाना प्रभारी और दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) को निर्देश दिया कि पेड़ों को अवैध रूप से काटें जाने के मामलों में तय समय के भीतर कार्रवाई होनी चाहिए।

क्या है पूरा मामला

गौरतलब है कि यह मामला मंगोलपुरी-सुल्तानपुरी नाले के आसपास ग्रीन बेल्ट और वन क्षेत्र में 2023 से 2025 के बीच पेड़ों को अवैध रूप से काटे जाने से जुड़ा है।

आरोप है कि यहां जेसीबी और कटर मशीनों से हरे पेड़ काटे गए, जो पर्यावरण नियमों का उल्लंघन है। इस मामले में जांच के लिए गठित संयुक्त समिति को 2023 में पेड़ के काटे जाने के सबूत मिले हैं। हालांकि, 2025 में इसी क्षेत्र में पेड़ों की अवैध कटाई के आरोपों को पुख्ता कर सके ऐसे कोई ठोस सबूत समिति को नहीं मिले।

अदालत को बताया गया कि 30 मई 2025 को बीट अधिकारी ने मौके का निरीक्षण किया। जांच में पाया गया कि बिना अनुमति के 40 पेड़ काटे गए थे, जो दिल्ली वृक्ष संरक्षण अधिनियम, 1994 का उल्लंघन था। इसके बाद सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण विभाग को नोटिस जारी किया गया।

तीन साल तक लटकी रही शिकायत

इस मामले में संयुक्त समिति ने कहा कि 2023 से लंबित कार्रवाई को अब और टाला नहीं जा सकता। समिति ने सिफारिश की कि दिल्ली के उत्तर वन प्रभाग को निर्देश दिए जाए कि वह इस मामले का जल्द से जल्द निपटारा करे।

इसके बाद 4 सितंबर 2025 को उत्तर वन प्रभाग के उप वन संरक्षक ने आदेश जारी किया। इसमें सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण विभाग को निर्देश दिया गया कि मंगोलपुरी-सुल्तानपुरी नाले के आसपास एक महीने के भीतर कम से कम सात फीट ऊंचे 400 देशी पेड़ लगाए जाएं। साथ ही, लगाए गए पेड़ों की स्थिति और देखभाल पर हर तीन महीने में रिपोर्ट साझा की जाए।

हालांकि, अब तक यह जानकारी सामने नहीं आई है कि विभाग ने घटना स्थल के पास 400 स्थानीय पेड़ों का वृक्षारोपण वास्तव में हुआ है या नहीं।

अदालत को यह भी जानकारी मिली है कि पेड़ों को अवैध रूप से काटे जाने की शिकायत 10 मार्च 2023 को उप वन संरक्षक को दी गई थी। लेकिन इस मामले में केवल एक सुनवाई हुई, जो 5 जुलाई 2023 को आयोजित की गई। यानी शिकायत के बावजूद कार्रवाई लगभग ठप रही।

फाइलों में दफन शिकायतों पर चला एनजीटी का चाबुक

अपने आदेश में अदालत ने टिप्पणी की कि यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। अदालत ने कहा कि जिन अधिकारियों पर पेड़ों को बचाने की जिम्मेदारी है, वे न तो अवैध कटाई को रोक पाए और न ही शिकायतों का समय पर निपटारा कर सके।

अदालत ने कहा कि उसके संज्ञान में आया है कि संबंधित अधिकारी शिकायतों पर समय पर कार्रवाई नहीं करते। इतना ही नहीं, पेड़ों के काटे जाने के बदले नए पेड़ लगाने के आदेशों का पालन भी लंबे समय तक नहीं किया जाता।

देना होगा हर पेड़ का हिसाब

ऐसे में एनजीटी ने दिल्ली वन विभाग, उत्तर वन प्रभाग, दिल्ली पुलिस और दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति को निर्देश दिया है कि पेड़ों को अवैध रूप से काटे जाने के मामलों में तय समय सीमा के भीतर कार्रवाई सुनिश्चित होनी चाहिए।

इस आदेश के बाद अब दिल्ली वन विभाग को हर उस पेड़ का हिसाब देना होगा जो गैरकानूनी तरीके से काटा गया है। यह आदेश इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह पहली बार है जब अदालत ने सिस्टम की जवाबदेही तय करते हुए पिछले पांच सालों का 'हिसाब' जनता के सामने रखने को कहा है। देखा जाए तो अक्सर विकास के नाम पर कुल्हाड़ियां तो चल जाती हैं, लेकिन उनके बदले नए पौधे लगाने का वादा फाइलों की धूल में कहीं खो जाता है।

उम्मीद है कि एनजीटी के इस कड़े रुख के बाद अब सच सामने आएगा कि क्या वाकई काटे गए पेड़ों की जगह नए पौधों ने ली है, या फिर दिल्ली की हरियाली सिर्फ कागजों पर ही फल-फूल रही थी? सच कहें तो यह फैसला उन बेजुबान पेड़ों के हक में एक बड़ी जीत है, जो शहर की कंक्रीट की भीड़ में दबे पांव काट दिए जाते हैं।