रातों में बढ़ती यह गर्मी हिमालय के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं। रातें ठंडी न होने के कारण ग्लेशियरों को खुद को संभालने और बर्फ को दोबारा जमने का समय ही नहीं मिल पा रहा; फोटो: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) 
जलवायु

पश्चिमी हिमालय में सदी के अंत तक 7.18 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है सर्दियों का तापमान

भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा किए नए अध्ययन में खुलासा हुआ है कि सदी के अंत तक पश्चिमी हिमालय में सर्दियां 7.18 डिग्री सेल्सियस तक गर्म हो सकती हैं और बसंत की बर्फ में 95.9 किलोग्राम प्रति वर्ग मीटर तक कमी का अंदेशा है।

Lalit Maurya

  • पश्चिमी हिमालय में जलवायु संकट अब भविष्य की चेतावनी नहीं, बल्कि तेजी से बदलती हकीकत बन चुका है।

  • भारतीय वैज्ञानिकों के नए अध्ययन के अनुसार, अगर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन इसी तरह बढ़ता रहा तो सदी के अंत तक पश्चिमी हिमालय में सर्दियों का तापमान 7.18 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है, जबकि बसंत में बर्फ का भंडार 95.9 किलोग्राम प्रति वर्ग मीटर तक घटने का खतरा है।

  • वहीं मध्य हिमालय में इसमें 6.71 डिग्री और पूर्वी हिमालय में 5.82 डिग्री सेल्सियस तक की वृद्धि का अंदेशा है।

  • इसी तरह बसंत में भी पश्चिमी हिमालय सबसे ज्यादा गर्म होगा। यहां तापमान में हो रही वृद्धि के 6.91 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने का अनुमान है, जबकि मध्य और पूर्वी हिमालय में यह क्रमशः 6.41 और 5.16 डिग्री तक रह सकती है।

  • रिसर्च रिपोर्ट से पता चला है कि हिमालय में होता बदलाव अब भविष्य की बात नहीं। बदलाव पहले ही शुरू हो चुका है। 1901 से 1930 के औसत तापमान की तुलना में 1995 से 2014 के दौरान सर्दियों में पश्चिमी हिमालय का तापमान 1.06 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका था। वहीं मध्य हिमालय में यह वृद्धि 0.96 डिग्री और पूर्वी हिमालय में 1.09 डिग्री सेल्सियस रही।

  • इसी तरह बसंत में पश्चिमी हिमालय का तापमान करीब 1.08 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है। वहीं मध्य और पूर्वी हिमालय में यह वृद्धि 0.83 डिग्री सेल्सियस दर्ज की गई।

  • सबसे बड़ी चिंता गर्म होती रातें हैं, जो बर्फ के दोबारा जमने की प्राकृतिक प्रक्रिया को कमजोर कर रही हैं और पिघलने के पूरे चक्र को बदल सकती हैं। इसका सीधा असर नदियों में पानी के पहुंचने के समय और मात्रा पर पड़ेगा।

  • पश्चिमी हिमालय से निकलने वाली नदी प्रणालियों पर करोड़ों लोगों की जल, खेती और आजीविका संबंधी जरूरतें टिकी हैं।

  • अध्ययन का संदेश स्पष्ट है—उत्सर्जन कम किया गया तो नुकसान को काफी हद तक सीमित किया जा सकता है, लेकिन देरी हुई तो हिमालय की बर्फ के साथ जल सुरक्षा का संकट भी तेजी से गहरा सकता है।

हिमालय की बर्फ केवल पहाड़ों की खूबसूरती नहीं। यही बर्फ धीरे-धीरे पिघलकर उन नदियों को पानी देती है, जिन पर खेत, गांव, शहर और करोड़ों लोगों का जीवन टिका है। लेकिन अब इस बर्फीले संसार पर गर्मी का असर तेजी से दिखाई देने लगा है।

भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा किए एक नए अध्ययन ने चेतावनी दी है कि आने वाले दशकों में पश्चिमी हिमालय इस बदलाव का सबसे बड़ा केंद्र बन सकता है।

रिसर्च में सामने आया है कि लद्दाख, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में पसरा पश्चिमी हिमालय, मध्य और पूर्वी हिमालय की तुलना में कहीं तेजी से गर्म हो रहा है। ऐसे में अगर दुनिया ग्रीनहाउस गैसों के बढ़ते उत्सर्जन को कम करने में सफल नहीं होती, तो सदी के अंत तक यहां सर्दियों का तापमान 7.18 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है।

चिंता की बात यह है कि इस बढ़ती गर्मी के साथ पहाड़ों पर जमा बर्फ भी तेजी से घट सकती है। अध्ययन के मुताबिक तेजी से बढ़ते उत्सर्जन के साथ सदी के अंत तक पश्चिमी हिमालय में वसंत की बर्फ 95.9 किलोग्राम प्रति वर्ग मीटर तक कम हो सकती है। कुछ इलाकों में तो मौसमी बर्फ के करीब-करीब खत्म होने का खतरा भी पैदा हो सकता है।

120 वर्षों के आंकड़ों में सामने आई गंभीर तस्वीर

प्रतिष्ठित जर्नल ऑफ अर्थ सिस्टम साइंस में प्रकाशित इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने 1901 से 2020 के बीच 120 वर्षों के तापमान सम्बन्धी रिकॉर्ड का विश्लेषण किया है। साथ ही भविष्य के पूर्वानुमानों के लिए आठ वैश्विक जलवायु मॉडलों की मदद ली है।

वैज्ञानिकों ने इन मॉडलों को पिछले तापमान बदलावों के आधार पर परखा और फिर इसकी मदद से सदी के अंत तक के संभावित बदलावों का अनुमान लगाया है।

अध्ययन का नेतृत्व बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (बीआईटी), मेसरा के रिमोट सेंसिंग एंड जियोइन्फॉर्मेटिक्स विभाग से जुड़े शोधकर्ताओं ने किया है। इसमें इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मेटियोरोलॉजी (आईआईटीएम), पुणे और अशोका विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक भी शामिल थे।

अध्ययन में शोधकर्ताओं ने हिमालय को तीन हिस्सों में बांटकर देखा है, इसमें पश्चिमी हिमालय में लद्दाख, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश; मध्य हिमालय में मुख्य रूप से उत्तराखंड और पूर्वी हिमालय में सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश तथा पूर्वोत्तर के इलाके शामिल थे।

हिमालय के इन हिस्सों में 15,000 से अधिक ग्लेशियर हैं और यहीं से सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी बड़ी नदियां निकलती हैं। करीब 150 करोड़ लोगों की पानी और आजीविका की जरूरतें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इन नदी प्रणालियों से जुड़ी हैं।

अभी से करीब एक डिग्री गर्म हो चुका है हिमालय

रिसर्च रिपोर्ट से पता चला है कि हिमालय में होता बदलाव अब भविष्य की बात नहीं। बदलाव पहले ही शुरू हो चुका है।

1901 से 1930 के औसत तापमान की तुलना में 1995 से 2014 के दौरान सर्दियों में पश्चिमी हिमालय का तापमान 1.06 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका था। वहीं मध्य हिमालय में यह वृद्धि 0.96 डिग्री और पूर्वी हिमालय में 1.09 डिग्री सेल्सियस रही।

इसी तरह बसंत में पश्चिमी हिमालय का तापमान करीब 1.08 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है। वहीं मध्य और पूर्वी हिमालय में यह वृद्धि 0.83 डिग्री सेल्सियस दर्ज की गई। शोधकर्ताओं ने इस बात पर भी प्रकाश डाला है कि पिछले दो-तीन दशकों में सामान्य से ज्यादा गर्म साल लगातार बढ़े हैं। यानी हिमालय में गर्मी का असर अब कोई दूर का खतरा नहीं, बल्कि तेजी से बदलती मौजूदा हकीकत है।

इससे पहले भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, खड़गपुर से जुड़े वैज्ञानिकों के नेतृत्व में किए अध्ययन में भी सामने आया था कि गुलमर्ग, पहलगाम और भद्रवाह जैसे खूबसूरत पर्वतीय इलाके, जम्मू जैसे कम ऊंचाई वाले शहरों की तुलना में कहीं अधिक तेजी से गर्म हो रहे हैं। इस अध्ययन के मुताबिक जम्मू-कश्मीर का हिमालयी क्षेत्र पिछले दो दशकों में करीब एक डिग्री सेल्सियस गर्म हो चुका है।

पश्चिमी हिमालय में स्थिति क्यों है सबसे ज्यादा चिंताजनक?

जलवायु मॉडल भविष्य में भी यही तस्वीर दिखाते हैं। रुझानों से पता चला है कि उच्च उत्सर्जन परिदृश्य में सदी के अंत तक सर्दियों में पश्चिमी हिमालय का तापमान 7.18 डिग्री तक बढ़ सकता है। वहीं मध्य हिमालय में इसमें 6.71 डिग्री और पूर्वी हिमालय में 5.82 डिग्री सेल्सियस तक की वृद्धि का अंदेशा है।

इसी तरह बसंत में भी पश्चिमी हिमालय सबसे ज्यादा गर्म होगा। यहां तापमान में हो रही वृद्धि के 6.91 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने का अनुमान है, जबकि मध्य और पूर्वी हिमालय में यह क्रमशः 6.41 और 5.16 डिग्री तक रह सकती है।

अध्ययन से जुड़ी प्रमुख शोधकर्ता प्रोत्यूषा मुखोपाध्याय का इस बारे में कहना है हिमालय को एक इकाई मानकर देखने के बजाय क्षेत्रीय अंतर को समझना जरूरी है। उनके मुताबिक पश्चिमी हिमालय हर परिदृश्य में सबसे संवेदनशील क्षेत्र के रूप में उभरता है, यह सबसे ज्यादा गर्म होने के साथ-साथ सबसे ज्यादा बर्फ भी खो रहा है।

अशोका विश्वविद्यालय और अध्ययन से जुड़े शोधकर्ता पार्थसारथी मुखोपाध्याय के मुताबिक, पश्चिमी और मध्य हिमालय में सर्दियां बसंत की तुलना में तेजी से गर्म हो रही हैं। इससे जमीन पर जमा बर्फ कम होगी और कम बर्फ का मतलब सूर्य की गर्मी का ज्यादा अवशोषण होगा। इससे बची हुई बर्फ भी तेजी से पिघलेगी।

सबसे बड़ी चिंता यह है कि सर्दी वह मौसम है जब हिमालय में बर्फ का भंडार तैयार होना चाहिए। सर्दियां गर्म होंगी तो गर्मियों और बसंत में नदियों को मिलने वाला पानी भी प्रभावित हो सकता है।

गर्म होती रातें भी बढ़ा रही हैं चिंता

इस अध्ययन का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि पश्चिमी और मध्य हिमालय में रातें दिन की तुलना में तेजी से गर्म हो रही हैं। आंकड़े दर्शाते हैं कि पश्चिमी हिमालय में सर्दियों के दौरान रात के न्यूनतम तापमान में 1.23 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई, जबकि दिन के अधिकतम तापमान में 0.87 डिग्री की बढ़ोतरी दर्ज की गई।

वहीं बसंत में रात का तापमान 1.25 डिग्री और दिन का 0.91 डिग्री बढ़ा है।

इसी तरह मध्य हिमालय में सर्दियों के दौरान रात का तापमान 1.2 डिग्री सेल्सियस बढ़ा, जबकि दिन के तापमान में 0.72 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज की गई है। स्पष्ट है कि राते तेजी से गर्म हो रही हैं।

रातों का गर्म होना केवल तापमान का बदलाव नहीं है। विशेषज्ञों के मुताबिक गर्म होती रातों का असर बर्फ पर खास तौर पर पड़ता है। ठंडी रातों में बर्फ और हिम का कुछ हिस्सा फिर जम जाता है, जिससे बर्फ का भंडार बना रहता है। लेकिन जब रातें गर्म होने लगती हैं तो यह प्राकृतिक ‘रिफ्रीजिंग’ प्रक्रिया कमजोर पड़ती है और बर्फ तेजी से पिघल सकती है।

अध्ययन से जुड़ी शोधकर्ता डॉक्टर स्वागता पायरा के मुताबिक गर्म होती रातें इस बदलाव का वह हिस्सा हैं जिस पर अक्सर कम ध्यान जाता है, जबकि इसका असर केवल बर्फबारी की मात्रा पर ही नहीं, बल्कि बर्फ पिघलने के पूरे चक्र पर पड़ता है। इसका सीधा असर इस बात पर पड़ता है कि नीचे के इलाकों तक पानी कब और कितनी मात्रा में पहुंचेगा।

बसंत में बर्फ का नुकसान सबसे ज्यादा

अध्ययन में यह भी सामने आया है कि तीनों हिमालयी क्षेत्रों में बसंत के दौरान बर्फ का नुकसान सर्दियों से ज्यादा होगा। इसमें भी पश्चिमी हिमालय सबसे आगे है।

कम उत्सर्जन परिदृश्य में भी पश्चिमी हिमालय में बसंत की बर्फ में 2040 तक 24.2 किलोग्राम प्रति वर्ग मीटर, 2060 तक 27.4 किलोग्राम और सदी के अंत तक करीब 32 किलोग्राम प्रति वर्ग मीटर की कमी हो सकती है। लेकिन उच्च उत्सर्जन परिदृश्य की स्थिति में यह नुकसान बढ़कर 95.9 किलोग्राम प्रति वर्ग मीटर तक पहुंच सकता है।

वहीं मध्य हिमालय में सदी के अंत तक बर्फ की कमी उत्सर्जन के आधार पर 17 से 34.9 किलोग्राम प्रति वर्ग मीटर और पूर्वी हिमालय में 5.5 से 11.1 किलोग्राम प्रति वर्ग मीटर रहने का अनुमान है।

सर्दियों में भी पश्चिमी हिमालय में बर्फ का नुकसान कम उत्सर्जन की स्थिति में 9.5 और ज्यादा उत्सर्जन की स्थिति में 53.2 किलोग्राम प्रति वर्ग मीटर तक पहुंच सकता है।

उत्सर्जन जितना ज्यादा, संकट उतना गहरा

अध्ययन का एक अहम संदेश यह है कि भविष्य पूरी तरह तय नहीं है। अगर उत्सर्जन तेजी से घटता है तो सदी के अंत तक पश्चिमी हिमालय की सर्दियों में तापमान वृद्धि करीब 2.55 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रह सकती है।

लेकिन ज्यादा उत्सर्जन जारी रहा तो यही वृद्धि 7.18 डिग्री तक पहुंच सकती है। यानी दोनों संभावित रास्तों के बीच करीब 4.6 डिग्री सेल्सियस का अंतर है।

इसी तरह बसंत की बर्फ के मामले में उच्च उत्सर्जन परिदृश्य कम उत्सर्जन की तुलना में करीब तीन गुणा ज्यादा नुकसान कर सकता है, जबकि सर्दियों की बर्फ का नुकसान पांच गुणे से भी अधिक हो सकता है। पार्थसारथी मुखोपाध्याय के मुताबिक अगले दो-तीन दशकों के बदलाव को लेकर मॉडल काफी हद तक एकमत हैं। इसके बाद की तस्वीर इस बात पर निर्भर करेगी कि दुनिया उत्सर्जन को कितना कम कर पाती है।

पूर्वी हिमालय में गर्मी कम, लेकिन खतरा अलग

रिसर्च के मुताबिक पूर्वी हिमालय तीनों क्षेत्रों में अपेक्षाकृत कम गर्म होने और कम बर्फ खोने वाला क्षेत्र है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वहां जोखिम कम है।

शोधकर्ताओं के अनुसार पूर्वी हिमालय पहले ही ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड के लिहाज से संवेदनशील हो चुका है। ग्लेशियरों के पीछे बनी झीलों के बांध टूटने पर अचानक आने वाली ये बाढ़ नीचे बसे इलाकों में भारी तबाही मचा सकती है।

ग्लेशियरों के पीछे हटने के साथ नई झीलें बन रही हैं और यह जोखिम भविष्य में पश्चिमी हिमालय की ओर भी बढ़ सकता है।

अब सिर्फ तापमान मापना काफी नहीं

ऐसे में वैज्ञानिकों ने हिमालय के लिए क्षेत्र-विशेष को ध्यान में रखते हुए जलवायु नीतियां और अनुकूलन योजनाएं बनाने की जरूरत बताई है। इसके लिए जमीन पर तापमान और बर्फ की निगरानी, उपग्रह आंकड़ों और उच्च-रिजॉल्यूशन जलवायु मॉडलों को एक साथ इस्तेमाल करने की सिफारिश की गई है।

इसके साथ ही ग्लेशियर और बर्फ की निगरानी, बेहतर अर्ली वार्निंग सिस्टम, जल प्रबंधन और स्थानीय समुदायों की जलवायु-अनुकूल क्षमता बढ़ाने की जरूरत बताई गई है।

हमें समझना होगा कि हिमालय पर बढ़ते तापमान और बर्फ का पिघलना सिर्फ पहाड़ों की कहानी नहीं है। यह उन करोड़ों लोगों के भविष्य की कहानी है, जिनके खेत, शहर, पेयजल और आजीविका इन पहाड़ों से निकलने वाली नदियों पर टिकी है। बर्फ कम होगी तो पानी के आने का समय और मात्रा बदल सकती है।

ऐसे में सन्देश बेहद साफ है, हिमालय को बचाने की लड़ाई सिर्फ पहाड़ों, ग्लेशियरों के लिए नहीं, बल्कि नीचे बसे समाजों के पानी और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के लिए भी है।