ग्लोबल वार्मिंग के सबूत मजबूत: नई अध्ययन के मुताबिक, तीन दशकों के शोध ने इंसानी गतिविधियों को जलवायु परिवर्तन का प्रमुख कारण बताया।
धरती पर दिख रहे इंसानी निशान: क्लाइमेट फिंगरप्रिंटिंग तकनीक से वायुमंडल से महासागरों तक मानवीय प्रभावों की पहचान हुई है।
जलवायु कानून पर बहस: 2009 के ईपीए एंडेंजेरमेंट फाइंडिंग पर सवालों के बीच वैज्ञानिकों ने नए प्रमाण पेश किए।
गर्मी के रिकॉर्ड बढ़ा रहे चिंता: 2009 के बाद के दौर में दर्ज दस सबसे गर्म साल शामिल रहे, जिससे मानवजनित वार्मिंग के संकेत मजबूत हुए।
चरम मौसम से बढ़ते खतरे: जलवायु परिवर्तन गर्मी, बाढ़, जंगलों की आग और फसलों के नुकसान जैसे जोखिमों को प्रभावित कर रहा है।
धरती का बढ़ता तापमान, पिघलते ग्लेशियर, गर्म होते समुद्र और बढ़ती गर्मी अब सिर्फ मौसम के बदलते मिजाज की कहानी नहीं हैं। इनके पीछे इंसानी गतिविधियों की भूमिका के वैज्ञानिक सबूत लगातार मजबूत होते जा रहे हैं। एक नई समीक्षा में वैज्ञानिकों ने कहा है कि पिछले तीन दशकों से अधिक समय में हुए शोध से यह साफ हुआ है कि कोयला, तेल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों को जलाने से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसें धरती की जलवायु को बदल रही हैं।
‘अर्थ्स फ्यूचर’ नामक पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन का नेतृत्व ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट एंग्लिया के शोधकर्ता ने किया है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, इंसानों के कारण होने वाली ग्लोबल वार्मिंग के सबूत 2009 के मुकाबले आज कहीं ज्यादा मजबूत हैं।
जलवायु में छिपे इंसानी निशानों की पहचान
वैज्ञानिकों ने इस अध्ययन में ‘क्लाइमेट फिंगरप्रिंटिंग’ यानी जलवायु के निशानों की पहचान करने वाली तकनीक पर जोर दिया है। आसान भाषा में समझें तो जैसे किसी अपराध की जांच में घटनास्थल पर मिले निशान सच्चाई तक पहुंचने में मदद करते हैं, वैसे ही जलवायु में होने वाले बदलावों के खास पैटर्न वैज्ञानिकों को बताते हैं कि उनके पीछे इंसानी गतिविधियां हैं या प्राकृतिक कारण।
मिसाल के तौर पर, धरती की सतह का गर्म होना, समुद्रों में बढ़ती गर्मी और वायुमंडल की अलग-अलग परतों में तापमान का बदलना वैज्ञानिकों को जलवायु परिवर्तन की वजह समझने में मदद करता है। जब इन अलग-अलग बदलावों के निशान एक-दूसरे से मेल खाते हैं, तो इंसानी गतिविधियों की भूमिका को पहचानने का भरोसा बढ़ता है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि आज इन तरीकों की मदद से धरती की जलवायु के कई हिस्सों में इंसानी प्रभाव पहचाना जा सकता है। इसमें वायुमंडल के ऊपरी हिस्से से लेकर दुनिया के महासागरों की गहराइयों तक के बदलाव शामिल हैं।
2009 के फैसले पर फिर क्यों छिड़ी बहस?
इस शोध की अहमियत अमेरिका में चल रही पर्यावरण संबंधी बहस के बीच और बढ़ गई है। अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (ईपीए) ने 2009 में एक ऐतिहासिक फैसला लिया था, जिसे ‘एंडेंजेरमेंट फाइंडिंग’ कहा जाता है। इस फैसले में माना गया था कि ग्रीनहाउस गैसों का प्रदूषण लोगों के स्वास्थ्य और कल्याण के लिए खतरा पैदा करता है। इसी निष्कर्ष ने अमेरिका में ग्रीनहाउस गैसों पर नियंत्रण से जुड़े कई नियमों को कानूनी आधार दिया।
जुलाई 2025 में अमेरिकी ऊर्जा विभाग (डीओई) की एक रिपोर्ट ने जलवायु विज्ञान के कुछ निष्कर्षों और फिंगरप्रिंटिंग तकनीकों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए थे। नई समीक्षा के लेखकों का कहना है कि उस रिपोर्ट में उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाणों और हाल के वर्षों में हुई प्रगति को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।
इस तरह जलवायु परिवर्तन पर वैज्ञानिक बहस के साथ-साथ यह मुद्दा पर्यावरण कानूनों और सरकारी नीतियों से भी जुड़ गया है।
गर्म होते साल दे रहे हैं चेतावनी
समीक्षा के मुताबिक, 2009 के बाद का दौर तापमान के रिकॉर्ड के लिहाज से बेहद अहम रहा है। इस अवधि में दर्ज किए गए दस सबसे गर्म साल शामिल रहे हैं। बढ़ता तापमान मानव गतिविधियों से पैदा हुए गर्म होने के संकेत को प्राकृतिक उतार-चढ़ाव के मुकाबले ज्यादा स्पष्ट बनाता है।
इसका असर केवल गर्म दिनों तक सीमित नहीं है। अत्यधिक गर्मी से लोगों की सेहत पर खतरा बढ़ता है, बाढ़ से घर और खेती प्रभावित होते हैं, जंगलों में आग लगने का जोखिम बढ़ सकता है और फसलों को नुकसान पहुंच सकता है। वैज्ञानिक अब यह भी समझने के लिए अध्ययन कर रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन किसी खास चरम मौसमी घटना की तीव्रता या उसके होने की संभावना को किस हद तक बदलता है।
विज्ञान से नीति तक पहुंचती चेतावनी
मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी), कोलोराडो स्टेट यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबरा के शोधकर्ताओं ने भी इस समीक्षा में योगदान दिया है। एमआईटी के शोधकर्ता के मुताबिक, जलवायु के कई स्वतंत्र रूप से मापे गए पहलुओं में एक-दूसरे से मेल खाते बदलाव देखे गए हैं, जो ग्लोबल वार्मिंग की वैज्ञानिक समझ को मजबूत करते हैं।
कुल मिलाकर, नए अध्ययन से साफ है कि धरती की जलवायु में हो रहे बदलावों को समझने के लिए वैज्ञानिक प्रमाण लगातार बढ़ रहे हैं। अब चुनौती केवल इन संकेतों को पहचानने की नहीं, बल्कि उनके आधार पर ऐसे फैसले लेने की भी है, जो इंसानों, पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों को बढ़ते जलवायु जोखिमों से बचाने में मदद करें।