गर्म होती धरती के साथ तितलियों की दुनिया भी तेजी से बदल रही है। जर्नल नेचर इकोलॉजी एंड इवोल्यूशन में प्रकाशित में प्रकाशित नए अध्ययन में 105 देशों की 1,758 तितली प्रजातियों से जुड़े 6,182 रिकॉर्ड का विश्लेषण किया गया।
इसमें सामने आया कि करीब हर 10 में से एक प्रजाति के आवासीय क्षेत्र में बदलाव दर्ज हुआ है और इनमें करीब 80 फीसदी बदलाव नए इलाकों की ओर विस्तार से जुड़े हैं।
करीब 27 फीसदी प्रजातियों का दायरा सिमटा, जबकि 22 फीसदी ने ऊंचाई के साथ अपना आवास बदला।
अध्ययन के अनुसार, जलवायु परिवर्तन और चरम मौसमी घटनाएं करीब 79 फीसदी आवासीय बदलावों से जुड़ी हैं।
लेकिन तितलियों के लिए नए ठिकाने तक पहुंचना आसान नहीं है। जंगलों और प्राकृतिक आवासों का बिखराव, कृषि विस्तार और शहरीकरण उनके रास्ते रोक रहे हैं।
खास चिंता उन उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों को लेकर है, जहां आंकड़ों की कमी सबसे ज्यादा है और तितलियां पहले ही गर्मी की ऊपरी सीमा के करीब रह रही हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक तितलियों का बदलता ठिकाना केवल उनकी कहानी नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र में आ रहे बड़े बदलावों की शुरुआती चेतावनी है।
कभी जिन रंग-बिरंगे पंखों को देखकर बचपन मुस्कुराता था, आज वही तितलियां अपनी जान बचाने के लिए दर-बदर भटकने को मजबूर हैं। देखा जाए तो तितलियां महज फूलों पर मंडराने वाली खूबसूरत जीव नहीं। वे प्रकृति के बदलते मिजाज की जीवंत चेतावनी भी हैं। इनपर किए एक नए अध्ययन में सामने आया है कि अब दुनिया भर में इन नाजुक पंखों वाली तितलियों का ठिकाना तेजी से बदल रहा है।
कहीं वे नए इलाकों की ओर बढ़ रही हैं, कहीं अपने पुराने आवास से गायब हो रही हैं और कहीं गर्मी से बचने के लिए पहाड़ों की ऊंचाइयों की ओर जाने को मजबूर हैं।
प्रतिष्ठित जर्नल नेचर इकोलॉजी एंड इवोल्यूशन में प्रकाशित इस अध्ययन के मुताबिक, दुनिया में ज्ञात तितली की करीब हर 10 में से एक प्रजाति के प्राकृतिक आवासीय क्षेत्र में बदलाव दर्ज किया गया है। मतलब कि ये अपनी पुरानी जगहों को छोड़कर नए इलाकों में पलायन कर रही हैं।
वैज्ञानिकों ने इसे समझने के लिए 105 देशों में तितलियों की 1,758 प्रजातियों के आवासों में बदलाव से जुड़े 6,182 रिकॉर्ड का विश्लेषण किया है। अध्ययन में अंग्रेजी के साथ अन्य भाषाओं में प्रकाशित रिसर्च और 68 विशेषज्ञों के आकलन को भी शामिल किया गया है।
अध्ययन का नेतृत्व मोनाश यूनिवर्सिटी की ग्लोबल चेंज इकोलॉजी लैब के प्रमुख डॉक्टर शवन चौधरी ने किया है। उनके मुताबिक तितलियों के आवास में यह बदलाव इस बात का संकेत है कि पूरी प्राकृतिक दुनिया तेजी से बदल रही है।
गर्मी बढ़ी तो तितलियों ने बदली दिशा
अध्ययन में सामने आया है कि जिन प्रजातियों में बदलाव दर्ज किया गया, उनमें से करीब 80 फीसदी ने नए इलाकों में कदम रखा है। यानी तापमान बढ़ने के साथ वे उन इलाकों की ओर बढ़ीं, जहां उनके लिए परिस्थितियां अपेक्षाकृत अनुकूल हो रही हैं।
हालांकि वैज्ञानिकों के मुताबिक यह कोई अच्छी खबर नहीं है, किसी प्रजाति का नए इलाके में पहुंचना इस बात की गारंटी नहीं है कि वह सुरक्षित है। वह पलायन के साथ एक जगह फैल सकती है, लेकिन दूसरी जगह तेजी से घट भी सकती है।
वहीं चिंता की बात है कि इनमें से 27 फीसदी का दायरा सिमट गया है, जबकि 22 फीसदी प्रजातियों ने ऊंचाई के साथ अपने आवास में बदलाव किया है। इनमें कुछ ने पहाड़ों पर ऊपर ऊंचाई की ओर रुख किया, तो कुछ नीचे की ओर भी पलायन कर रही हैं।
रिसर्च में इस बात की भी पुष्टि हुई है कि जलवायु परिवर्तन और चरम मौसमी घटनाएं करीब 79 फीसदी दर्ज आवासीय बदलावों से जुड़ी थीं। वहीं कृषि विस्तार और मानवीय गतिविधियों का असर खास तौर पर उन क्षेत्रों में देखा गया, जहां तितलियों का आवास सिकुड़ा है।
तितलियां जहां जा रही हैं, वहां रास्ता भी चाहिए
तितलियों के लिए सिर्फ तापमान में आता बदलाव ही चुनौती नहीं है। जलवायु उन्हें नए इलाकों की ओर जाने के लिए मजबूर कर सकती है, लेकिन टुकड़ों में बंट चुके जंगल, खेत और बढ़ता शहरीकरण उनके रास्ते की रूकावट बन रहे हैं।
किसी नए इलाके में अपना विस्तार करने के लिए तितलियों को पर्याप्त भोजन और अंडे देने के लिए उपयुक्त पोषक पौधों, अनुकूल सूक्ष्म जलवायु और एक-दूसरे से जुड़े प्राकृतिक आवासों की आवश्यकता होती है। यदि इन आवासीय संपर्क मार्गों में बाधा आ जाए या वे नष्ट हो जाएं, तो अनुकूल मौसम के बावजूद तितलियां नए क्षेत्र में सफलतापूर्वक अपनी आबादी स्थापित नहीं कर पातीं।
सबसे बड़ा खतरा उन इलाकों में, जहां सबसे कम हैं आंकड़े
अध्ययन में सामने आया एक चिंताजनक पहलू यह भी है कि दुनिया के कई महत्वपूर्ण जैव-विविधता वाले क्षेत्रों में तितलियों से जुड़े आंकड़े बेहद कम हैं।
मध्य अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया, न्यू गिनी और अमेजन बेसिन ऐसे प्रमुख क्षेत्र हैं, जहां अध्ययन और निगरानी का अभाव है। विडंबना यह है कि जहां जैव-विविधता सबसे समृद्ध है, वहां बदलाव को दर्ज करने वाली जानकारी कई बार सबसे कम है।
उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में तितलियां विशेष रूप से चिंता का विषय हैं। ये पहले ही अपने तापमान सहने की ऊपरी सीमा के करीब रहती हैं। ऐसे में तापमान में मामूली बढ़ोतरी भी उनके लिए गंभीर संकट पैदा कर सकती है। शोधकर्ताओं के अनुसार, उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में ऊंचाई के साथ तितलियों के खिसकने के रिकॉर्ड भी बेहद कम हैं। इससे यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि वे बढ़ती गर्मी से बचने के लिए कहां जा रही हैं।
अन्य भाषाओं में किए अध्ययन ने बदली पूरी तस्वीर
अध्ययन में एक और महत्वपूर्ण बात यह सामने आई कि यदि महज अंग्रेजी में प्रकाशित शोधों को देखा जाता, तो दुनिया में तितलियों के आवासीय बदलाव की तस्वीर अधूरी रहती। शोधकर्ताओं ने 15 भाषाओं में उपलब्ध अध्ययनों और 68 विशेषज्ञों के आकलन को शामिल किया तो वैश्विक तस्वीर काफी बदल गई।
इससे खासकर उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में तितलियों के बदलाव के कई ऐसे संकेत सामने आए हैं, जिन्हें पहले नजरअंदाज कर दिया गया था।
वैज्ञानिकों का कहना है कि केवल ज्यादा से ज्यादा आंकड़े जुटाना ही काफी नहीं है। तितलियों में हो रहे बदलावों को समझने के लिए स्थानीय वैज्ञानिकों, संग्रहालयों, आम नागरिकों और संरक्षण पर काम कर रहे संगठनों को लम्बे समय तक निगरानी के लिए पर्याप्त संसाधन और सहयोग उपलब्ध कराना भी उतना ही जरूरी है।
एक ही प्रजाति कहीं बढ़ी, कहीं घटी
तितली की कई प्रजातियों की कहानी और भी जटिल है। कुछ प्रजातियां अपने आवास क्षेत्र के एक हिस्से में बढ़ रही हैं, लेकिन दूसरे हिस्से में घट रही हैं।
उदाहरण के लिए, भारत, बांग्लादेश और श्रीलंका की मूल निवासी टॉनी कोस्टर 2012 में ऑस्ट्रेलिया पहुंची और वहां करीब 135 किलोमीटर प्रति वर्ष की गति से अपने क्षेत्र में इजाफा करती गई। हैरानी की बात है कि 2027 में यह रफ्तार 359 किलोमीटर प्रतिवर्ष तक पहुंच गई थी।
हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि तेजी से फैलना हमेशा सफलता का संकेत नहीं है। हो सकता है कि तितली ऐसे नए क्षेत्रों में पहुंच रही हो जहां परिस्थितियां अभी अनुकूल हैं, लेकिन लंबे समय में उसका अस्तित्व वहां भी खतरे में पड़ जाए। ऐसे में शोधकर्ताओं के मुताबिक, अब संरक्षण की रणनीति केवल यह तय करने तक सीमित नहीं रह सकती कि किसी प्रजाति को कहां बचाना है। यह भी समझना होगा कि वह कहां जा रही है, कहां से गायब हो रही है और क्या उसके पास सुरक्षित तरीके से आगे बढ़ने का रास्ता है।
इसके लिए प्राकृतिक आवासों के बीच ग्रीन कॉरिडोर बनाना, स्थानीय पौधों को बचाना, ठंडे और सुरक्षित आश्रय क्षेत्र तैयार करना तथा बिखरे हुए आवासों को फिर से जोड़ना जरूरी होगा।
डॉक्टर चौधरी के मुताबिक तितलियां शुरुआती चेतावनी देने वाली प्रजातियां हैं। अगर उनके रहने के इलाके इतनी तेजी से बदल रहे हैं, तो यह पूरे पारिस्थितिकी तंत्र में हो रहे गहरे बदलाव का संकेत है।
हमें समझना होगा कि तितलियां सिर्फ सुंदरता का प्रतीक नहीं। वे हमारे पर्यावरण की सबसे संवेदनशील 'अग्रिम चेतावनी प्रणाली' हैं। वे फसलों और पौधों में परागण करती हैं और खुद कई पक्षियों व अन्य जीवों के भोजन का हिस्सा हैं। इस तरह वे पूरे पारिस्थिकी तंत्र का संतुलन बनाए रखती हैं।
ऐसे में यदि तितलियां अपना ठिकाना बदल रही हैं, तो यह केवल उनके लिए खतरे का संकेत नहीं है। कहीं न कहीं इसका सीधा मतलब है कि वातावरण में हो रहे बदलावों से हमारे पारिस्थितिकी तंत्र की नींव हिल रही है।