कम समय में तेज बारिश से असम में बाढ़ का पानी तेजी से बढ़ेगा और जल निकासी के लिए समय कम मिलेगा।
ब्रह्मपुत्र बेसिन में 100 मिमी से ज्यादा रोजाना बारिश की घटनाएं बढ़ने से चरम बाढ़ का खतरा लगातार बढ़ सकता है।
2080 तक दस साल में आने वाली बड़ी बाढ़ की घटना हर दो साल में होने की आशंका है, बढ़ेगा खतरा।
ग्लेशियर पिघलने, बढ़ते जल प्रवाह और गाद से ब्रह्मपुत्र में नदी कटाव तेज होगा, जिससे बाढ़ का संकट बढ़ेगा।
जलवायु परिवर्तन के साथ वनों की कटाई, शहरीकरण और अनियोजित भूमि उपयोग असम की बाढ़ समस्या को और गंभीर बना रहे हैं।
असम में बाढ़ अब सिर्फ मानसून के दौरान होने वाली सामान्य समस्या नहीं रह गई है। जलवायु परिवर्तन, बदलती बारिश, नदियों के बदलते व्यवहार और तेजी से बढ़ते मानवीय दबाव ने राज्य में बाढ़ के खतरे को और गंभीर बना दिया है। जलवायु थिंक टैंक क्लाइमेट ट्रेंड्स की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि आने वाले वर्षों में असम में बारिश का मौसम छोटा हो सकता है, लेकिन कम समय में बहुत ज्यादा बारिश होने की घटनाएं बढ़ सकती हैं। इससे बाढ़ का पानी तेजी से बढ़ेगा और उसे निकलने के लिए कम समय मिलेगा।
वर्तमान में असम के कई जिले बाढ़ की चपेट में हैं और जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। नौ अगस्त, 2026 को जारी असम के डिजास्टर रिपोर्टिंग एंड इंफॉर्मेशन मैनेजमेंट सिस्टम के बुलेटिन के अनुसार, बाढ़ से 1.55 लाख से अधिक लोग प्रभावित हुए हैं। बुलेटिन में 60 पुरुषों, 23 महिलाओं और 18 बच्चों की मौत की खबर दी गई है। मृत बच्चों में 12 लड़के और छह लड़कियां शामिल हैं। कुल मिलाकर मौत के आंकड़े 100 के पार पहुंच गए हैं।
'ब्रह्मपुत्र नदी बेसिन में बाढ़ के कारण और उसे कम करने के उपाय: एक व्यवस्थित समीक्षा ' नामक रिपोर्ट के अनुसार, ब्रह्मपुत्र नदी बेसिन में बारिश के तरीके में बड़ा बदलाव दिखाई दे रहा है। मानसून की सबसे ज्यादा बारिश अब धीरे-धीरे जुलाई से अगस्त की ओर खिसक रही है। वहीं मानसून के बाद होने वाली बारिश बढ़ रही है, जबकि मानसून से पहले की बारिश में कमी देखी जा रही है।
कम समय में ज्यादा बारिश से बढ़ेगा बाढ़ का पानी
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर बारिश कम दिनों में और बहुत तेज होती है तो नदियों का जलस्तर तेजी से बढ़ता है। जमीन के पास पानी को सोखने का समय कम हो जाता है और नालों तथा छोटी नदियों पर भी दबाव बढ़ता है।
अध्ययन के अनुसार, भविष्य में ब्रह्मपुत्र के निचले इलाकों में एक दिन में 100 मिलीमीटर से ज्यादा बारिश होने की घटनाएं अधिक हो सकती हैं। इसका सीधा असर बाढ़ की स्थिति पर पड़ेगा। जल प्रवाह से जुड़े मॉडल यह भी बताते हैं कि इस सदी के मध्य तक ब्रह्मपुत्र बेसिन में औसत जल प्रवाह करीब 13 से 15 प्रतिशत तक बढ़ सकता है।
सबसे बड़ी चिंता चरम बाढ़ की बढ़ती घटनाओं को लेकर है। उच्च उत्सर्जन वाले परिदृश्य में साल 2080 तक ऐसी बाढ़, जो अभी औसतन 10 साल में एक बार आती है, हर दो साल में आने जैसी स्थिति बन सकती है।
ग्लेशियर और बर्फ पिघलने का भी असर
ब्रह्मपुत्र नदी के पानी में ग्लेशियरों और बर्फ के पिघलने का भी अहम योगदान है। फिलहाल नदी के ऊपरी हिस्से में कुल पानी के करीब 27 प्रतिशत हिस्से में ग्लेशियर और बर्फ पिघलने का योगदान माना जाता है।
तापमान बढ़ने से आने वाले समय में ग्लेशियर और बर्फ तेजी से पिघल सकते हैं। इससे शुरुआती मौसम में नदी में पानी बढ़ सकता है। लेकिन लंबे समय में ग्लेशियरों के लगातार पीछे हटने से पिघलने वाले पानी की मात्रा कम भी हो सकती है। इससे नदी के प्रवाह का समय बदल सकता है और बारिश तथा बर्फ के पानी के बीच संतुलन बिगड़ सकता है।
बढ़ेगा कटाव और नदी का दबाव
जलवायु परिवर्तन के कारण केवल पानी की मात्रा ही नहीं, बल्कि नदियों में आने वाली गाद भी बढ़ सकती है। अनुमानों के मुताबिक सदी के अंत तक ब्रह्मपुत्र में तलछट यानी गाद की मात्रा करीब 40 प्रतिशत तक बढ़ सकती है। इससे नदी के किनारों का कटाव तेज हो सकता है।
असम पहले से ही नदी कटाव की समस्या से जूझ रहा है। ऐसे में बढ़ता जल प्रवाह और अधिक गाद गांवों, खेतों और नदी किनारे बसे इलाकों के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।
इंसानी गतिविधियां भी बढ़ा रही हैं परेशानी
बाढ़ का खतरा केवल जलवायु परिवर्तन से नहीं बढ़ रहा है। जंगलों की कटाई, तेजी से हो रहा शहरीकरण और बिना योजना के जमीन का इस्तेमाल भी समस्या को गंभीर बना रहे हैं। पेड़ों और प्राकृतिक जमीन की कमी से बारिश का पानी जमीन में कम जाता है और सतह पर ज्यादा तेजी से बहता है।
असम के जलवायु कार्ययोजना दस्तावेज के अनुसार, भविष्य में चरम बारिश की घटनाओं में 5 से 38 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हो सकती है। वहीं बाढ़ की घटनाओं में 25 प्रतिशत से ज्यादा वृद्धि का अनुमान है।
बारिश की मात्रा से ज्यादा उसके तरीके को समझना होगा
शोध पत्र में शोधकर्ता के हवाले से कहा गया है कि पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में बारिश के तरीके में तेज बदलाव देखा जा रहा है। कई बार बहुत कम समय में बेहद तेज बारिश होती है, जबकि दूसरी ओर मानसून में लंबे ब्रेक भी देखने को मिलते हैं।
इस साल भी असम समेत पूर्वोत्तर भारत के कई हिस्सों में सामान्य से कम मानसूनी बारिश के बावजूद गंभीर बाढ़ की स्थिति बनी है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे साफ है कि अब केवल कुल बारिश को देखकर बाढ़ का अनुमान लगाना पर्याप्त नहीं होगा। बारिश कब, कितनी तेज और कितने कम समय में हो रही है, इस पर भी ध्यान देना होगा।
असम के लिए आने वाले वर्षों की चुनौती इसलिए और बड़ी है क्योंकि जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ आबादी, शहर और बस्तियां भी बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में बढ़ रही हैं। ऐसे में बाढ़ से बचाव के लिए बेहतर पूर्व चेतावनी व्यवस्था, मजबूत जल निकासी, नदी किनारे सुरक्षित भूमि उपयोग और प्राकृतिक क्षेत्रों की रक्षा पर ज्यादा ध्यान देना जरूरी होगा।