अध्ययन के अनुसार, 81 प्रतिशत प्रभावित देशों में गर्मी से होने वाली घमौरियों और त्वचा के चकत्तों में वृद्धि हुई। फोटो साभार: आईस्टॉक
जलवायु

जलवायु की मार: 42% से ज्यादा देशों में त्वचा रोग का खतरा बढ़ा, गरीब देशों पर सबसे ज्यादा असर

दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन के कारण त्वचा संबंधी समस्याएं बढ़ी, 42.6 फीसदी देशों में बढ़ी त्वचा रोगों की चिंता, गरीब देशों पर सबसे ज्यादा असर

Dayanidhi

  • जलवायु परिवर्तन से दुनिया के 42.6 प्रतिशत देशों में त्वचा रोगों की गंभीरता या प्रसार में बदलाव दर्ज किया गया।

  • कम आय वाले 55.6 प्रतिशत देशों ने जलवायु परिवर्तन से त्वचा संबंधी बीमारियों में बढ़ोतरी की जानकारी दी।

  • अध्ययन के अनुसार, 81 प्रतिशत प्रभावित देशों में गर्मी से होने वाली घमौरियों और त्वचा के चकत्तों में वृद्धि हुई।

  • पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में 64.7 प्रतिशत देशों ने त्वचा रोगों पर जलवायु परिवर्तन का असर सबसे अधिक बताया।

  • विशेषज्ञों ने त्वचा रोगों की निगरानी मजबूत करने, जागरूकता बढ़ाने और जलवायु अनुकूल स्वास्थ्य योजनाएं तैयार करने पर जोर दिया।

जलवायु परिवर्तन का असर अब केवल बढ़ती गर्मी, बाढ़, सूखे और सांस संबंधी बीमारियों तक सीमित नहीं रह गया है। इसका प्रभाव इंसान की त्वचा पर भी दिखाई देने लगा है। दुनिया के 136 देशों में किए गए एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में सामने आया है कि 42.6 प्रतिशत देशों ने जलवायु परिवर्तन के कारण त्वचा रोगों के मामलों या उनकी गंभीरता में बदलाव की सूचना दी है। चिंताजनक बात यह है कि इसका सबसे ज्यादा असर कम आय वाले देशों पर पड़ रहा है।

यूरोपियन एकेडमी ऑफ डर्मेटोलॉजी एंड वेनेरियोलॉजी (ईएडीवी) कांग्रेस 2026 में प्रस्तुत इस अध्ययन में बताया गया कि बढ़ता तापमान, अत्यधिक गर्मी, बदलता मौसम, बारिश के बदलते पैटर्न और पर्यावरण में हो रहे बदलाव त्वचा की सेहत के लिए नई चुनौतियां पैदा कर रहे हैं।

गरीब देशों में ज्यादा खतरा

ग्लोबल एक्सेस टू स्किन हेल्थ ऑब्जर्वेटरी (स्किनऑब्जर्वेटरी) के इस अध्ययन में विश्व स्वास्थ्य संगठन के 194 सदस्य देशों को शामिल होने का निमंत्रण दिया गया था। इनमें से 136 देशों से आंकड़े जुटाए गए।

अध्ययन के मुताबिक, कम आय वाले 55.6 प्रतिशत देशों ने त्वचा रोगों पर जलवायु परिवर्तन का असर बताया। वहीं, निम्न-मध्यम आय वाले देशों में यह आंकड़ा 52.5 प्रतिशत रहा। उच्च-मध्यम आय वाले देशों में 43.8 प्रतिशत और उच्च आय वाले देशों में 28.3 प्रतिशत देशों ने ऐसे बदलावों की जानकारी दी। ये आंकड़े बताते हैं कि जिन देशों के पास जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए कम संसाधन हैं, वहां त्वचा संबंधी समस्याओं का खतरा अधिक गंभीर हो सकता है।

गर्मी से बढ़ रहे चकत्ते और सूजन

अध्ययन में जलवायु परिवर्तन से प्रभावित त्वचा रोगों की जानकारी देने वाले 58 देशों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इनमें से 81 प्रतिशत देशों ने गर्मी के कारण होने वाले त्वचा के चकत्तों और घमौरियों में बढ़ोतरी की बात कही। वहीं, 75.9 प्रतिशत देशों ने सूजन से जुड़ी त्वचा संबंधी बीमारियों में बदलाव दर्ज किया।

इसके अलावा, 62.1 प्रतिशत देशों ने संक्रामक त्वचा रोगों में बदलाव की सूचना दी, जबकि 50 प्रतिशत देशों ने मच्छरों और किलनी जैसे जीवों से फैलने वाली बीमारियों में बदलाव बताया।

विशेषज्ञों के अनुसार, तेज गर्मी और उमस के कारण पसीना बढ़ता है। इससे त्वचा में जलन, खुजली और घमौरियों की समस्या हो सकती है। गर्मी, वायु प्रदूषण और दूसरे पर्यावरणीय कारक पहले से मौजूद सूजन संबंधी बीमारियों को भी बढ़ा सकते हैं।

बदलते मौसम से फैल सकते हैं संक्रमण

जलवायु परिवर्तन का असर केवल गर्मी तक सीमित नहीं है। तापमान और बारिश में बदलाव से मच्छरों, किलनी और दूसरे रोग फैलाने वाले जीवों के रहने की जगह बदल सकती है। ऐसे जीव उन इलाकों में भी पहुंच सकते हैं, जहां पहले उनकी मौजूदगी कम थी।

बाढ़, अत्यधिक बारिश और पर्यावरण में बदलाव भी लोगों के संक्रमण और त्वचा में जलन पैदा करने वाले तत्वों के संपर्क में आने की परिस्थितियां बदल सकते हैं। हालांकि, अध्ययन में सामने आए ये आंकड़े देशों की ओर से दी गई जानकारी पर आधारित हैं और हर मामले में जलवायु परिवर्तन को बीमारी का सीधा कारण साबित नहीं करते।

एशिया-प्रशांत क्षेत्र में ज्यादा असर

क्षेत्रीय स्तर पर पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र के 64.7 प्रतिशत देशों ने त्वचा रोगों में जलवायु से जुड़े बदलावों की जानकारी दी। पूर्वी भूमध्यसागरीय और दक्षिण-पूर्व एशियाई क्षेत्रों में यह आंकड़ा 60 प्रतिशत रहा। इसके मुकाबले यूरोपीय क्षेत्र में केवल 16.1 प्रतिशत देशों ने ऐसे बदलावों की सूचना दी।

अफ्रीकी क्षेत्र में 42.9 प्रतिशत प्रतिभागियों ने जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को लेकर अनिश्चितता जताई। यह स्थिति बताती है कि कई देशों में बीमारी की निगरानी और आंकड़े जुटाने की व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत है।

त्वचा की सेहत को भी मिले प्राथमिकता

अध्ययन में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों में अक्सर लू, हृदय और सांस संबंधी बीमारियों पर ध्यान दिया जाता है, जबकि त्वचा भी पर्यावरणीय बदलावों के सीधे संपर्क में रहती है।

विशेषज्ञों ने त्वचा रोगों की बेहतर निगरानी, स्वास्थ्यकर्मियों और आम लोगों में जागरूकता बढ़ाने तथा स्थानीय जरूरतों के अनुसार बचाव की योजनाएं तैयार करने पर जोर दिया है।

उनका मानना है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने की स्वास्थ्य योजनाओं में त्वचा की सेहत को भी शामिल करना जरूरी है। समय रहते बीमारी के संकेत पहचानना, उचित इलाज उपलब्ध कराना और लोगों को गर्मी व पर्यावरणीय जोखिमों से बचाव के उपाय बताना आने वाले वर्षों में बेहद अहम साबित हो सकता है।