गर्मी और लू के थपेड़ों के बीच यात्रा करते लोग; फोटो: आईस्टॉक 
जलवायु

जलवायु संकट का ‘जेनेटिक असर’: कई पीढ़ियों तक बना रह सकता है गर्मी और लू का असर

अध्ययन में खुलासा हुआ है कि गर्मी और लू का असर सिर्फ एक मौसम तक सीमित नहीं, बल्कि जीन के जरिए कई पीढ़ियों तक बना रह सकता है।

Lalit Maurya

  • नई स्टडी में सामने आया है कि गर्मी और लू का असर महज एक मौसम तक सीमित नहीं रहता, बल्कि जीन के जरिए कई पीढ़ियों तक बना रह सकता है।

  • अध्ययन में पाया गया कि भीषण गर्मी और लू जैसे जलवायु झटके जीवों के जीन के काम करने के तरीके को बदल देते हैं, जिसका असर उनकी संतानों के विकास और व्यवहार में भी दिखता है।

  • यह संकेत है कि जलवायु संकट अब जीवों के विकास की दिशा और गति दोनों को प्रभावित कर रहा है।

हम अक्सर सोचते हैं कि गर्मी और लू महज कुछ दिनों या महीनों की समस्या है, मौसम बदला, गर्मी गई और समस्या खत्म। लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि यह पूरी तरह सही नहीं है। इस बारे में किए एक नए वैज्ञानिक अध्ययन से पता चला है कि गर्मी और लू का असर महज कुछ दिन या मौसम तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह पीढ़ियों तक जारी रह सकता है।

अध्ययन ने खुलासा किया है कि भीषण गर्मी जीवों के अंदर ऐसी “जैविक याद” छोड़ सकती है, जो कई पीढ़ियों तक बनी रह सकती है।

यह अध्ययन स्पेनिश नेशनल रिसर्च कॉउन्सिल से जुड़े वैज्ञानिक इवान हार्नी और जोसेफ गोंजालेज के नेतृत्व में किया गया है, जिसके नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल मॉलिक्यूलर बायोलॉजी एंड इवोल्यूशन में प्रकाशित हुए हैं।

जीन में दर्ज होता गर्मी का असर

वैज्ञानिकों ने पाया है कि जब जीव तेज गर्मी का सामना करते हैं, तो उनके जीन काम करने के तौर-तरीके में बदलाव करने लगते हैं। सबसे अहम बात यह है कि यह बदलाव उनकी अगली पीढ़ियों के शरीर और व्यवहार में भी बना रह सकता है, भले ही वे पीढ़ियां खुद उस गर्मी के दौर से कभी न गुजरी हों। मतलब कि कहीं न कहीं धरती पर बढ़ती गर्मी अब सिर्फ मौसम में ही बदलाव नहीं कर रही, यह जीवन के ढांचे को ही बदलने लगी है।

वैज्ञानिकों ने पुष्टि की है कि मानव गतिविधियों के चलते पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ रहा है। इसके साथ ही गर्मी और लू जैसी चरम मौसमी आपदाओं का कहर भी बढ़ रहा है। ये हालात जीव-जंतुओं के लिए सिर्फ चुनौती ही नहीं बन रहे, बल्कि एक ऐसे दबाव में बदल रहे हैं जो उन्हें तेजी से ढलने-बदलने पर मजबूर कर रहा है।

यही दबाव धीरे-धीरे विकास को दिशा देने लगता है। यही प्रक्रिया तेजी से बदलाव और अनुकूलन को जन्म देती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि पर्यावरण के साथ तालमेल बिठाने की यह प्रक्रिया सीधे जीन और उसके काम करने के तौर-तरीके से जुड़ी है।

एक प्रयोग जिसने बदल दी वैज्ञानिकों की सोच

इसे समझने के लिए वैज्ञानिकों ने स्पेन के गर्म और शुष्क क्षेत्र और फिनलैंड के ठन्डे इलाके से लाई गई मादा फ्रूट फ्लाई पर प्रयोग किए, ताकि अलग-अलग जलवायु में उनकी प्रतिक्रिया को समझा जा सके।

उन्हें अचानक से गर्म वातावरण में रखा गया ताकि यह समझा जा सके कि उनके जीन इन बदलावों के प्रति कैसे प्रतिक्रिया करते हैं? साथ ही यह भी परखा गया कि अगली पीढ़ी कितनी स्वस्थ रहती है और उनका कितनी तेजी से विकास होता है

इस प्रयोग के नतीजे बेहद चौंकाने वाले थे। शोधकर्ताओं के मुताबिक जब मक्खियों को 37 डिग्री सेल्सियस तापमान में रखा गया, तो उनके हजारों जीन सक्रिय या निष्क्रिय हो गए। ये जीन शरीर को तनाव से बचाने में मदद करते हैं।

दोनों क्षेत्रों की मक्खियों पर गर्मी का असर साफ देखा गया। साथ ही उनकी संतानों की जीवित रहने की क्षमता और विकास पर नकारात्मक असर दर्ज किया गया। गर्मी के तुरंत बाद पैदा हुई संतानों में विकास धीमा हुआ और उनकी जीवित रहने की क्षमता घट गई। खासकर ठंडे इलाकों की मक्खियों में यह असर कहीं ज्यादा स्पष्ट था।

तीन पीढ़ियों तक बना रहा असर

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। स्पेन जैसी गर्म जगहों की मक्खियों में एक दिलचस्प बदलाव देखा गया। उनकी कुछ समय बाद पैदा हुई संतानों ने तेजी से विकास करना शुरू कर दिया, जैसे उनका शरीर इस तनाव के साथ तालमेल बैठाने का प्रयास कर रहा हो। यह संकेत था कि शरीर ने गर्मी के हिसाब से खुद को ढालना शुरू कर दिया।

सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि गर्मी का असर तीन पीढ़ियों बाद भी जीन के व्यवहार में देखा गया। इसके साथ ही नई पीढ़ियां भी पहले की तरह तेजी से विकसित होती रहीं। यानी, जो बदलाव एक बार शुरू हुआ, वह आगे की पीढ़ियों तक पहुंच गया। इसका मतलब है कि शरीर ‘गर्मी के उस तनाव को याद’ रखता है।

यह अध्ययन दर्शाता है कि जलवायु परिवर्तन केवल जीवों को नुकसान नहीं पहुंचा रहा, बल्कि उनके विकास की दिशा और गति को भी बदल रहा है। कुछ जीव बदलती जलवायु के साथ उम्मीद से ज्यादा तेजी से ढल सकते हैं।

अनुकूलन बनाम अस्तित्व की जंग

अध्ययन के प्रमुख लेखक इवान हार्नी के मुताबिक, “तनाव केवल बेहतर अनुकूल जीवों को ही नहीं चुनता, बल्कि विकास की प्रक्रिया को भी तेज कर सकता है।“

यह सुनने में सुखद लग सकता है। लेकिन साथ ही अध्ययन में इस बात को लेकर चेताया है कि अगर जलवायु में इसी तरह बदलाव होता रहा तो कुछ जीव तेजी से ढल जाएंगे, लेकिन कई प्रजातियां इस रफ्तार का साथ नहीं दे पाएंगी और उनपर विलुप्ति होने का खतरा मंडराने लगेगा।

ऐसे में जैसे-जैसे धरती गर्म हो रही है, यह समझना और भी जरूरी हो जाता है कि कौन-सी प्रजातियां इस बदलाव को झेल पाएंगी और कौन नहीं।

यह अध्ययन साफ सन्देश है कि जलवायु संकट अब सिर्फ पर्यावरण से जुड़ा मुद्दा नहीं रहा, यह जीवन की जड़ों में उतर चुका है। यह वह बदलाव है जो आज को ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की बनावट, उनकी क्षमता और उनके भविष्य की दिशा को भी तय कर रहा है। संकेत अब साफ दिखने लगे हैं, ऐसे में अगर समय रहते कदम न उठाए गए, तो इसके असर और गहरे, कहीं ज्यादा स्थाई होते जाएंगे।