गर्मी अब केवल तापमान बढ़ने की कहानी नहीं रह गई है, बल्कि गर्मी का मौसम ही अपना कैलेंडर बदल रहा है।
45 वर्षों के वैश्विक जलवायु आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला है कि दुनिया के करीब आधे भू-भाग में चरम गर्मी का मौसम पहले की तुलना में लंबा हुआ है। 1980 के दशक के मुकाबले 2015–2024 के दौरान करीब 50 फीसदी भू-भाग में सूखी चरम गर्मी और 48 फीसदी भू-भाग में नमी वाली चरम गर्मी का मौसम बढ़ा है।
खास चिंता उत्तर-पश्चिमी भारत को लेकर है, जहां चरम गर्मी का विस्तार मुख्य रूप से गर्मी के मौसम से पहले, यानी बसंत और अप्रैल-मई की ओर हुआ है।
यह बदलाव महज मौसम के कैलेंडर में फेरबदल नहीं है। सामान्य गर्मी शुरू होने से पहले पड़ने वाली असामान्य गर्मी के दौरान शरीर को तापमान के अनुरूप ढलने का पर्याप्त समय नहीं मिलता, जिससे हीट स्ट्रेस और स्वास्थ्य जोखिम बढ़ सकते हैं।
बुजुर्गों, बच्चों, बाहर काम करने वाले श्रमिकों और पहले से स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए इसका असर अधिक गंभीर हो सकता है। नमी बढ़ने पर खतरा और बढ़ जाता है, क्योंकि शरीर पसीने के जरिए खुद को ठंडा नहीं कर पाता।
अध्ययन यह भी दिखाता है कि करीब 80 फीसदी वैश्विक भू-भाग में बसंत और शरद ऋतु के बीच चरम गर्मी के समय में आया बदलाव केवल औसत तापमान बढ़ने से नहीं समझाया जा सकता। बारिश के बदलते पैटर्न, भूमि उपयोग और क्षेत्रीय मौसम प्रणालियां भी इसमें भूमिका निभा सकती हैं।
भारत के लिए इसका सीधा मतलब है कि हीट अलर्ट, पेयजल, राहत केंद्र और स्वास्थ्य तैयारियों का कैलेंडर भी बदलती गर्मी के साथ बदलना होगा। क्योंकि अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि गर्मी कितनी बढ़ रही है, बल्कि यह भी है कि वह कितनी जल्दी दस्तक दे रही है और कितने समय तक बनी रह रही है।
गर्मी अब केवल गर्मियों की समस्या नहीं रह गई। दुनिया के कई हिस्सों में बेहद गर्म दिनों का सिलसिला अब पारंपरिक गर्मी के मौसम से भी बाहर निकल रहा है। इसका असर भारत में भी दिखाई दे रहा है। एक नए वैश्विक अध्ययन के मुताबिक, उत्तर-पश्चिमी भारत में गर्मी के चरम दिनों का विस्तार मुख्य रूप से गर्मियों से पहले यानी बसंत की ओर हुआ है।
यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अप्रैल या मई में पड़ने वाली असामान्य गर्मी शरीर के लिए अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकती है। आमतौर पर इंसान को लगातार गर्म मौसम के साथ तालमेल बैठाने में समय लगता है। ऐसे में मौसम के सामान्य गर्म होने से पहले ही अत्यधिक गर्मी पड़ने लगे तो स्वास्थ्य जोखिम बढ़ सकता है।
वहीं, दूसरी ओर यदि गर्मी के मौसम के बाद भी लंबे समय तक ऐसी परिस्थितियां बनी रहें तो शरीर पर पड़ने वाला दबाव और बढ़ सकता है।
यह अध्ययन अमेरिका के नासा गोडार्ड इंस्टीट्यूट फॉर स्पेस स्टडीज (जीआईएसस), उसके सहयोगियों और न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा किया गया है। इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पिछले 45 वर्षों के जलवायु से जुड़े वैश्विक आंकड़ों का विश्लेषण किया है, जिसके नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल एजीयू एडवांसेज में प्रकाशित हुए हैं।
दुनिया के करीब आधे हिस्से में बढ़ा चरम गर्मी का मौसम
अध्ययन में शोधकर्ताओं ने 1980 से 1989 के आंकड़ों को आधार मानते हुए उनकी तुलना 2015 से 2024 के आंकड़ों से की है। उन्होंने किसी स्थान पर रोजाना दर्ज तापमान के सबसे गर्म पांच फीसदी दिनों को चरम गर्मी के दिन माना।
विश्लेषण से पता चला कि सूखी गर्मी का मौसम दुनिया के करीब 50 फीसदी हिस्सों में और नमी वाली गर्मी का मौसम करीब 48 फीसदी भू-भाग में पहले की तुलना में लंबा हुआ है। हालांकि लेकिन यह बदलाव हर जगह एक जैसा नहीं था। कुछ क्षेत्रों में चरम गर्मी, गर्मियों के बाद शरद ऋतु यानी सितंबर से अक्टूबर की ओर बढ़ी, जबकि कुछ क्षेत्रों में यह गर्मियों से पहले अप्रैल-मई की ओर खिसकी है।
रिसर्च के मुताबिक उत्तर-पश्चिमी भारत भी उन क्षेत्रों में शामिल है जहां गर्मी का विस्तार मुख्य रूप से गर्मियों से पहले हुआ है। अध्ययन में पश्चिमी यूरोप और दक्षिणी अफ्रीका के साथ उत्तर-पश्चिमी भारत में भी वसंत की ओर चरम गर्मी के बढ़ने का पैटर्न दर्ज किया गया।
सिर्फ औसत तापमान बढ़ने से नहीं समझाया जा सकता बदलाव
अध्ययन की एक अहम बात यह है कि चरम गर्मी के मौसम में यह बदलाव केवल औसत तापमान बढ़ने से पूरी तरह नहीं समझाया जा सकता।
शोधकर्ताओं ने यह भी जांचा कि अगर केवल 1980 के दशक के मौसम में आज जितनी औसत गर्मी जोड़ दी जाए तो चरम गर्मी के दिनों का समय किस तरह बदलना चाहिए। इससे गर्मी के मौसम के बीच में होने वाले बदलावों को तो काफी हद तक समझाया जा सका, लेकिन गर्मी के मौसम के किनारों, यानी शुरुआत और अंत में हो रहे बदलावों को नहीं।
करीब 80 फीसदी वैश्विक भू-भाग में बसंत और शरद ऋतु के बीच चरम गर्मी के बदलाव का पैटर्न केवल औसत तापमान बढ़ने की गणना से मेल नहीं खाता था।
शोधकर्ताओं का मानना है कि क्षेत्रीय स्तर पर बारिश में बदलाव, भूमि उपयोग में हो रहे बदलाव और बड़े पैमाने पर बदलते मौसम के पैटर्न भी इसमें भूमिका निभा सकते हैं। हालांकि, इन कारकों का योगदान कितना है, इसे समझने के लिए आगे और शोध की जरूरत है।
भारत के लिए क्यों अहम है यह बदलाव?
भारत की बात करें तो देश में गर्मी का मौसम पहले ही लंबा और अधिक चुनौतीपूर्ण हो चुका है। ऐसे में अगर अत्यधिक गर्म दिनों का दायरा पारंपरिक गर्मी के महीनों से बाहर बढ़ता है तो इसका सीधा असर लोगों की तैयारी और स्वास्थ्य सुरक्षा पर पड़ सकता है।
आम तौर पर हीट अलर्ट, पेयजल व्यवस्था, गर्मी से बचने के लिए बनाए राहत केंद्र और बचाव की योजनाएं गर्मियों के तय पारम्परिक कैलेंडर के हिसाब से तैयार की जाती हैं। लेकिन अगर भीषण गर्मी अप्रैल से पहले शुरू हो या गर्मी के मौसम के बाद भी बनी रहे तो इन व्यवस्थाओं को भी उसी हिसाब से लंबे समय तक सक्रिय रखना पड़ सकता है।
बता दें कि क्लाइमेट सेंट्रल ने भी आंकड़ों और विशेषज्ञों के हवाले से अपनी रिपोर्ट में जानकारी दी है कि जलवायु में आते बदलावों के चलते भारतीय ऋतुओं में बदलाव आ रहा है। यह प्रभाव सर्दी के मौसम पर विशेष रूप से दिख रहा है। देश में कहीं सर्दी के दौरान तापमान बढ़ रहा है, तो कहीं कम हो रहा है।
क्लाइमेट ट्रेंड्स के भी मुताबिक जैसे-जैसे जलवायु में आते बदलावों के कारण तापमान में वृद्धि हो रही है, देश भर में स्थानीय मौसम के पैटर्न में महत्वपूर्ण बदलाव हो रहे हैं।
यह भी सामने आया है कि भारत के पश्चिमी हिस्सों में सर्दियों के दौरान फरवरी और जनवरी के बीच गर्मी के रुझान में काफी अंतर होता है। गर्म मौसम की स्थिति में तेजी से बदलाव की प्रवृत्ति देखी गई है, जिससे बसंत का मौसम सिकुड़ रहा है।
अध्ययन की प्रमुख शोधकर्ता और नासा गोडार्ड इंस्टीट्यूट फॉर स्पेस स्टडीज की जलवायु वैज्ञानिक कैथरीन इवानोविच के मुताबिक, गर्मी के मौसम से पहले या बाद में पड़ने वाली चरम गर्मी इसलिए अधिक खतरनाक हो सकती है क्योंकि उस समय शरीर ने अभी गर्मी के अनुकूल खुद को पूरी तरह ढाला नहीं होता या गर्मियों के लंबे तनाव से उबर रहा होता है।
सिर्फ तापमान देखना काफी नहीं
अध्ययन में शोधकर्ताओं ने सूखी गर्मी के साथ-साथ नमी वाले गर्म दिनों का भी अध्ययन किया है। इसमें तापमान के साथ आर्द्रता और सूरज की गर्मी को शामिल किया जाता है, ताकि यह समझा जा सके कि गर्मी इंसानी शरीर पर वास्तव में कितना दबाव डालती है।
नमी अधिक होने पर शरीर पसीने के जरिए खुद को ठंडा नहीं कर पाता। इसलिए समान तापमान पर भी अधिक नमी वाली गर्मी स्वास्थ्य के लिए अधिक खतरनाक हो सकती है।
यही वजह है कि केवल मौसम के ऐप पर दिख रहा तापमान किसी दिन के वास्तविक स्वास्थ्य जोखिम की पूरी तस्वीर नहीं देता। तापमान के साथ आर्द्रता और शरीर पर पड़ने वाले गर्मी के दबाव को भी देखना जरूरी है।
गर्मी का मौसम बढ़ा तो दूसरी आपदाओं से भी बढ़ेगा टकराव
रिपोर्ट के मुताबिक चरम गर्मी के मौसम में बदलाव का असर केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। लंबे समय तक सूखी गर्मी रहने से फसलों और पारिस्थितिकी तंत्र पर दबाव बढ़ सकता है, जबकि अत्यधिक नमी वाली गर्मी इंसानी स्वास्थ्य के लिए विशेष रूप से खतरनाक हो सकती है।
इसके अलावा, अगर चरम गर्मी का मौसम आगे खिसकता है तो वह दूसरी मौसमी आपदाओं के साथ भी टकरा सकता है। ऐसी परिस्थितियों में एक के बाद एक या एक साथ कई तरह के जोखिम सामने आ सकते हैं, जिससे लोगों और सरकार पर दबाव और बढ़ सकता है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि इस अध्ययन को अभी शुरुआती लेकिन महत्वपूर्ण प्रमाण के तौर पर देखा जाना चाहिए। चरम गर्मी की घटनाएं स्वभाव से ही दुर्लभ होती हैं और सामान्य गर्मी के मौसम से बाहर होने वाली घटनाएं उससे भी दुर्लभ हैं। इसलिए इनके बदलते पैटर्न को समझने के लिए और अधिक जलवायु मॉडलिंग की जरूरत होगी।
फिर भी 45 साल के आंकड़े एक अहम संकेत देते हैं, दुनिया में गर्मी सिर्फ बढ़ नहीं रही, उसका समय भी बदल रहा है। भारत जैसे गर्म देशों के लिए इसका मतलब है कि गर्मी से बचाव की तैयारी को केवल ‘गर्मी के मौसम’ तक सीमित रखने के बजाय बदलते मौसम के हिसाब से तैयार करना होगा।