हिमालयी बर्फबारी का नया अध्ययन, वैज्ञानिकों ने खोजी सटीक माप तकनीक, जल संसाधनों की भविष्यवाणी मंल मिलेगी बड़ी मदद
नई तकनीक से हिमालय में बर्फ की सही मात्रा का पता चलेगा, करोड़ों लोगों के जल भविष्य को मिलेगा सहारा
पुराने अनुमान हुए गलत साबित, हिमालयी बर्फबारी के नए आंकड़ों से पानी प्रबंधन और खेती की योजनाएं होंगी बेहतर
ग्लेशियरों और बर्फ से मिलने वाले पानी पर नया शोध, भारत समेत कई देशों के लिए महत्वपूर्ण साबित होगा
हिमालय की बर्फ बताएगी जल संकट का भविष्य, वैज्ञानिकों की खोज से नदियों और जल स्रोतों की बेहतर समझ विकसित होगी
हिमालय की बर्फ और ग्लेशियरों से मिलने वाला पानी करोड़ों लोगों के जीवन का आधार है। भारत, पाकिस्तान, नेपाल, चीन और अफगानिस्तान के लाखों किसान, शहर और उद्योग इसी पानी पर निर्भर हैं। अब वैज्ञानिकों ने हिमालय में होने वाली बर्फबारी को मापने का एक नया और बेहतर तरीका खोजा है, जिससे भविष्य में पानी की उपलब्धता का सही अनुमान लगाने में मदद मिलेगी।
हिमालय से निकलने वाली गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियां कई देशों के लिए जीवनदायिनी हैं। सर्दियों में जमा होने वाली बर्फ गर्मियों में धीरे-धीरे पिघलती है और नदियों में पानी बनाए रखती है। यही पानी खेती, पीने और बिजली उत्पादन के लिए उपयोग किया जाता है। लेकिन लंबे समय से वैज्ञानिकों के पास हिमालय में गिरने वाली बर्फ की सही जानकारी उपलब्ध नहीं थी। यह शोध मंथली वेदर रिव्यु नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।
पुराने तरीकों से नहीं मिल पाता था सही आंकड़ा
हिमालय जैसे ऊंचे और कठिन क्षेत्रों में बर्फबारी को मापना हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है। पहले बारिश मापने वाले छोटे उपकरणों का इस्तेमाल बर्फ मापने के लिए किया जाता था। ये उपकरण तेज हवाओं और भारी बर्फबारी के दौरान सही आंकड़े नहीं दे पाते थे।
वैज्ञानिकों के अनुसार, पुराने तरीकों के कारण हिमालय के जल स्रोतों में उपलब्ध पानी को कई बार बहुत कम आंका गया। कई क्षेत्रों में बर्फ से मिलने वाले पानी का अनुमान वास्तविक मात्रा से 50 प्रतिशत से 100 प्रतिशत तक कम रहा।
झीलों में लगाए गए नए सेंसर
वैज्ञानिकों की एक टीम ने अब बर्फबारी मापने के लिए नई तकनीक तैयार की है। इसमें झीलों के अंदर पानी के दबाव को मापने वाले सेंसर लगाए गए हैं। ये सेंसर हिमाचल प्रदेश की घेपन और हम्पटा झीलों तथा नेपाल की मुगु झील में लगाए गए।
इस तकनीक की खास बात यह है कि यह केवल किसी छोटे स्थान की बर्फ को नहीं मापती, बल्कि पूरी झील पर जमा बर्फ की मात्रा का अनुमान लगाती है। जब झील पर बर्फ जमा होती है तो पानी का दबाव बदलता है। इसी बदलाव से वैज्ञानिक पता लगाते हैं कि कितनी बर्फ गिरी है।
हम्पटा क्षेत्र में पहले से 37 प्रतिशत ज्यादा मिली बर्फ
नई तकनीक से किए गए अध्ययन में पता चला कि हिमाचल प्रदेश के हम्पटा क्षेत्र में एक सर्दी के मौसम में पहले लगाए गए अनुमान से 37 प्रतिशत ज्यादा बर्फ गिरी थी। नई जानकारी को मौसम मॉडल में शामिल करने के बाद बर्फबारी का अनुमान काफी सटीक हो गया है।
वैज्ञानिकों ने बताया कि यह मॉडल अब यह बेहतर तरीके से बता सकता है कि किस जगह और किस समय कितनी बर्फ गिर सकती है। इससे भारी बर्फबारी जैसी घटनाओं को समझने में भी मदद मिलेगी।
पानी की योजना बनाने में मिलेगी मदद
नई जानकारी से सरकारों और स्थानीय समुदायों को पानी की बेहतर योजना बनाने में सहायता मिलेगी। इससे बांधों में पानी का प्रबंधन, खेती की तैयारी और जल संकट से निपटने की योजनाएं बेहतर बनाई जा सकेंगी।
कुछ हिमालयी क्षेत्रों में बर्फ को जमा करके बाद में उपयोग करने की योजनाएं भी बनाई जा रही हैं। कृत्रिम ग्लेशियर और आइस स्तूप जैसी तकनीकों से गर्मियों में खेती के समय पानी उपलब्ध कराया जा सकता है।
जलवायु परिवर्तन के बीच बढ़ी चुनौती
जलवायु परिवर्तन के कारण दुनिया के कई हिस्सों में पानी की समस्या बढ़ रही है। हिमालय भी इससे प्रभावित हो रहा है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि आने वाले वर्षों में पहाड़ों से कितना पानी मिलेगा और उसमें कितना बदलाव हो सकता है।
हिमालय क्षेत्र में बहुत कम ऐसे मौसम केंद्र हैं जहां लंबे समय तक बर्फबारी का रिकॉर्ड उपलब्ध है। इसलिए नई तकनीक से मिलने वाली जानकारी भविष्य की जल योजनाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
वैज्ञानिक का हिमालय से भावनात्मक जुड़ाव
इस शोध से जुड़े वैज्ञानिक का हिमालय से पुराना रिश्ता है। उन्होंने बताया कि बचपन में हिमालय के पास रहने और वहां की प्राकृतिक सुंदरता देखने से उनके मन में पहाड़ों और नदियों के प्रति गहरा लगाव पैदा हुआ।
वैज्ञानिकों का मानना है कि सही बर्फबारी आंकड़ों से हिमालयी जल संसाधनों को बेहतर तरीके से समझा जा सकेगा। इससे लोगों को भविष्य में पानी की कमी जैसी चुनौतियों से निपटने में मदद मिलेगी।
हिमालय की बर्फ केवल पहाड़ों की सुंदरता नहीं है, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन का आधार है। इसकी सही जानकारी आने वाले समय में पानी की सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी साबित होगी।