भारत के शहरों में अत्यधिक गर्मी का असर 1983 से 2016 के बीच 23 अरब से बढ़कर 59 अरब व्यक्ति-दिन हुआ।
गर्मी के बढ़ते खतरे में 64 प्रतिशत योगदान आबादी बढ़ने का, जबकि 36 प्रतिशत योगदान शहरी तापमान बढ़ने का रहा।
दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और अहमदाबाद में तेज आबादी वृद्धि के कारण गर्मी का जोखिम तेजी से बढ़ा है।
केरल के तटीय शहरों में अधिक नमी और जलवायु परिवर्तन गर्मी के बढ़ते खतरे के प्रमुख कारण बने हैं।
शहरों को गर्मी से बचाने के लिए हरित क्षेत्र, ठंडी छतें, चेतावनी प्रणाली और मजबूत स्वास्थ्य सेवाएं जरूरी हैं।
भारत में गर्मी अब केवल मौसम की परेशानी नहीं रह गई है। शहरों में बढ़ती गर्मी लोगों की सेहत, काम करने की क्षमता और जीवन के लिए बड़ा खतरा बनती जा रही है। भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम), पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के नए अध्ययन में सामने आया है कि देश के शहरों में अत्यधिक गर्मी के संपर्क में आने वाली आबादी 1983 से 2016 के बीच दोगुने से भी ज्यादा बढ़ गई।
अर्बन क्लाइमेट नामक पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, 1983 में भारत के शहरी क्षेत्रों में अत्यधिक गर्मी का कुल असर करीब 23 अरब व्यक्ति-दिन था। 2016 तक यह बढ़कर 59 अरब व्यक्ति-दिन हो गया। यानी 34 वर्षों में गर्मी के संपर्क में आने वाली शहरी आबादी में बहुत बड़ी वृद्धि हुई।
तीन हजार से अधिक शहरों का अध्ययन
शोधकर्ताओं ने देश के 3 हजार से अधिक शहरी क्षेत्रों का अध्ययन किया। इसमें केवल तापमान को आधार नहीं बनाया गया, बल्कि गर्मी के वास्तविक असर को समझने के लिए वेट बल्ब ग्लोब टेम्परेचर यानी डब्ल्यूबीजीटी का इस्तेमाल किया गया।
डब्ल्यूबीजीटी में तापमान के साथ हवा में नमी, धूप और हवा की गति को भी शामिल किया जाता है। इसका महत्व इसलिए ज्यादा है क्योंकि अधिक नमी होने पर शरीर पसीने के जरिए आसानी से गर्मी बाहर नहीं निकाल पाता। ऐसे में सामान्य तापमान भी शरीर के लिए खतरनाक हो सकता है।
आबादी बढ़ना सबसे बड़ा कारण
अध्ययन में यह भी पता लगाया गया कि शहरों में गर्मी का खतरा बढ़ने के पीछे मुख्य कारण क्या हैं। राष्ट्रीय स्तर पर गर्मी के बढ़ते संपर्क में करीब 64 प्रतिशत हिस्सेदारी आबादी बढ़ने की रही। वहीं 36 प्रतिशत योगदान शहरी गर्मी बढ़ने का था।
तेजी से बढ़ते शहरों में बड़ी संख्या में लोग नए इलाकों में बस रहे हैं। शहरों का फैलाव, ज्यादा निर्माण और घनी आबादी गर्मी के असर को बढ़ा रहे हैं। दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और अहमदाबाद जैसे बड़े शहरों में आबादी और शहरी विस्तार गर्मी के बढ़ते खतरे का प्रमुख कारण पाए गए हैं।
इन शहरों में घनी बस्तियां और कमजोर वर्गों की बड़ी आबादी समस्या को और गंभीर बनाती है। जिन लोगों के पास पर्याप्त ठंडक, पेड़-पौधे या बेहतर घरों की सुविधा नहीं है, उनके लिए अत्यधिक गर्मी ज्यादा खतरनाक साबित हो सकती है।
केरल के तटीय शहरों में अलग तस्वीर
देश के सभी शहरों में गर्मी बढ़ने का कारण एक जैसा नहीं है। केरल के तटीय इलाकों में स्थिति कुछ अलग दिखाई देती है। तिरुवनंतपुरम, कोल्लम और कोझिकोड जैसे शहरों में गर्मी के बढ़ते असर में जलवायु परिवर्तन और शहरी गर्मी की भूमिका ज्यादा महत्वपूर्ण पाई गई।
इन इलाकों में हवा में नमी अधिक रहती है। अधिक नमी के कारण शरीर पसीने के जरिए गर्मी कम नहीं कर पाता। इसलिए तापमान बहुत ज्यादा न होने पर भी लोगों को खतरनाक गर्मी महसूस हो सकती है।
कोलकाता और हैदराबाद जैसे शहरों में आबादी बढ़ने और गर्मी बढ़ने, दोनों का असर लगभग संतुलित दिखाई देता है। इसका मतलब है कि इन शहरों को एक साथ जलवायु और बढ़ती आबादी, दोनों चुनौतियों से निपटना होगा।
अब शहरों के लिए अलग रणनीति जरूरी
शोध का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि हर शहर के लिए गर्मी से बचाव की एक जैसी योजना काम नहीं करेगी। जहां आबादी तेजी से बढ़ रही है, वहां शहरों की योजना बनाते समय गर्मी के खतरे को ध्यान में रखना जरूरी होगा।
शहरों में अधिक पेड़ लगाना, पार्क और जल क्षेत्र बढ़ाना, ठंडी छतों को बढ़ावा देना और भवन निर्माण के नियमों में बदलाव करना उपयोगी कदम हो सकते हैं। गरीब और घनी आबादी वाले इलाकों पर विशेष ध्यान देने की भी जरूरत है। वहीं जिन शहरों में गर्मी और नमी का असर ज्यादा है, वहां स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना, समय पर गर्मी की चेतावनी जारी करना और खुले में काम करने वाले मजदूरों की सुरक्षा करना जरूरी होगा।
अध्ययन की कुछ सीमाएं भी
इस शोध में 1983 से 2016 तक के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया है। इसलिए इसमें 2016 के बाद भारत में बढ़ी अत्यधिक गर्मी की घटनाओं को शामिल नहीं किया गया है। इसके अलावा, पूरे शहर के औसत आंकड़े किसी इलाके की वास्तविक स्थिति को पूरी तरह नहीं दिखा सकते। एक ही शहर के अलग-अलग हिस्सों में पेड़, इमारतों की बनावट और जमीन के इस्तेमाल के कारण गर्मी का असर अलग हो सकता है।
फिर भी यह अध्ययन शहरों में बढ़ते गर्मी के खतरे को समझने के लिए महत्वपूर्ण आधार देता है। यह बताता है कि भारत को गर्मी की समस्या से निपटने के लिए केवल तापमान पर ध्यान नहीं देना चाहिए, बल्कि आबादी, नमी और शहरों की बनावट को भी साथ में देखना होगा। आने वाले वर्षों में सुरक्षित और जलवायु-सक्षम शहर बनाने के लिए ऐसी स्थानीय जानकारी बेहद जरूरी होगी।