प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक 
जलवायु

ग्लोबल वार्मिंग से बिखर रही मौसम की अदृश्य कड़ियां, एशियाई मानसून का भूमध्यसागर पर कमजोर हो रहा प्रभाव

वैज्ञानिकों के मुताबिक, दक्षिण एशियाई मानसून और भूमध्यसागर के मौसम के बीच बना प्राकृतिक संबंध सदी के दूसरे हिस्से तक करीब-करीब खत्म हो सकता है।

Lalit Maurya

  • जलवायु परिवर्तन सिर्फ धरती को गर्म नहीं कर रहा, बल्कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों को जोड़ने वाली मौसम की अदृश्य कड़ियों को भी कमजोर कर रहा है।

  • एक नए वैज्ञानिक अध्ययन के मुताबिक, दक्षिण एशियाई मानसून और भूमध्यसागर के मौसम के बीच बना हजारों किलोमीटर लंबा जलवायु संबंध इस सदी के दूसरे हिस्से तक करीब-करीब खत्म हो सकता है।

  • वैज्ञानिकों के अनुसार, गर्मियों में दक्षिण एशिया में सक्रिय मानसून से पैदा होने वाली गर्मी भूमध्यसागर के ऊपर हवा को नीचे उतारती है। इससे बादल कम बनते हैं और गर्मियों में बारिश घटती है। लेकिन गर्म होती धरती में यह प्रक्रिया कमजोर पड़ने का अनुमान है।

  • जलवायु मॉडल के 97.5 फीसदी सिमुलेशन में मानसून का भूमध्यसागर के वायुमंडलीय परिसंचरण पर प्रभाव घटता दिखाई दिया।

  • अध्ययन के मुताबिक, भूमध्यसागर में साल-दर-साल बारिश में होने वाले बदलाव को समझाने में मानसून की भूमिका 14.2 फीसदी से घटकर महज 5.1 फीसदी रह सकती है। इसका मतलब बारिश में उतार-चढ़ाव कम होना नहीं, बल्कि उसे प्रभावित करने में मानसून की भूमिका का घट जाना है।

  • यह अध्ययन चेताता है कि ग्लोबल वार्मिंग मौसम के पुराने पैटर्न ही नहीं, बल्कि उन्हें जोड़ने वाले रिश्तों को भी बदल रही है। ऐसे में भविष्य के मौसम का अनुमान लगाना और चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

दक्षिण एशिया में हर साल सक्रिय होने वाला मानसून सिर्फ भारत और आसपास के देशों में बारिश को तय नहीं करता। इसका असर हजारों किलोमीटर दूर भूमध्यसागर के मौसम पर भी पड़ता है। यह प्रकृति की उन अदृश्य कड़ियों में से एक है, जो दुनिया के दो दूर-दराज के हिस्सों को आपस में जोड़ती हैं।

लेकिन चिंता की बात यह है कि जलवायु परिवर्तन के कारण सदियों से बना यह जलवायु संबंध अब कमजोर पड़ता जा रहा है। वैज्ञानिकों ने आशंका जताई है कि, गर्म होती धरती के साथ दक्षिण एशियाई मानसून का भूमध्यसागर के मौसम पर असर आने वाले दशकों में तेजी से घट सकता है।

इस बारे में जारी एक नए वैज्ञानिक अध्ययन में खुलासा हुआ है कि, धरती के गर्म होने के साथ दक्षिण एशियाई मानसून का भूमध्यसागर के मौसम पर पड़ने वाला असर लगातार कमजोर होगा। हैरानी की बात है कि सदी के दूसरे हिस्से तक दोनों के बीच बना यह जलवायु संबंध लगभग खत्म हो सकता है।

हजारों किलोमीटर दूर मानसून से कैसे बदलता है भूमध्यसागर का मौसम?

देखा जाए तो यह बदलाव सिर्फ मौसम विज्ञान की किताबों तक सीमित नहीं है। इसका असर इस बात पर भी पड़ सकता है कि भविष्य में भूमध्यसागर क्षेत्र की गर्मियों में बारिश कब, क्यों और कितनी होती है।

यह अध्ययन चीन के इंस्टीट्यूट ऑफ एटमॉस्फेरिक फिजिक्स से जुड़े प्रोफेसर तियानजुन झोउ के नेतृत्व में किया गया है। इसके नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल नेचर जियोसाइंस में प्रकाशित हुए हैं।

दक्षिण एशियाई मानसून और भूमध्यसागर के बीच मौजूद इस संबंध को वैज्ञानिक ‘मानसून-डेजर्ट मैकेनिज्म’ कहते हैं। गर्मियों में दक्षिण एशिया के ऊपर जब मानसूनी गतिविधियां तेज होती हैं, तो गर्म और नम हवा तेजी से ऊपर उठती है। इससे वातावरण में बड़ी मात्रा में गर्मी पहुंचती है, जो दूर-दूर तक हवा के बहाव और मौसम को प्रभावित करती है। इसका एक महत्वपूर्ण असर भूमध्यसागर के ऊपर भी दिखाई देता है।

वहां हवा नीचे की ओर उतरने लगती है। इससे बादल कम बनते हैं और बारिश की संभावना घट जाती है। यही प्रक्रिया भूमध्यसागर में गर्म और शुष्क गर्मियों के लिए जिम्मेदार प्रमुख कारणों में से एक है। यानी दक्षिण एशिया में होने वाली मानसूनी हलचल का असर हजारों किलोमीटर दूर भूमध्यसागर की गर्मी और सूखे तक पहुंचता है।

यह प्रकृति की उन अदृश्य कड़ियों में से एक है जो दुनिया के अलग-अलग हिस्सों को एक-दूसरे से जोड़ती हैं। लेकिन अब सवाल यह है कि क्या ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ने के बाद भी यह संबंध उसी तरह कायम रहेगा?

97.5 फीसदी मॉडल में दिखा मानसून का कमजोर होता असर

इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए शोधकर्ताओं ने मौसम संबंधी आंकड़ों के साथ दर्जनों जलवायु मॉडल सिमुलेशन और आदर्श परिस्थितियों पर आधारित प्रयोग किए। शोधकर्ताओं ने विशेष रूप से भविष्य में अधिक उत्सर्जन और बढ़ते तापमान वाले परिदृश्य में यह जांचा कि दक्षिण एशियाई मानसून और भूमध्यसागर के बीच संबंध किस तरह बदल सकता है।

इसके नतीजे काफी चौंकाने वाले थे। सीईएसएम1 जलवायु मॉडल द्वारा किए 97.5 फीसदी सिमुलेशन में भविष्य में दक्षिण एशियाई मानसून का भूमध्यसागर के मौसम पर असर कमजोर पड़ता दिखाई दिया।

वैज्ञानिकों के अनुसार अभी मानसून गर्मी और भूमध्यसागर के ऊपर नीचे उतरती हवा के बीच स्पष्ट संबंध है। लेकिन सदी के दूसरे हिस्से तक यह संबंध लगभग खत्म हो जाएगा। यानी, आज जो मानसून भूमध्यसागर के गर्मियों के मौसम को प्रभावित करता है, गर्म होती धरती में उसकी यह भूमिका बेहद कमजोर हो सकती है।

आखिर क्यों बिखर रहा है यह जलवायु संबंध?

शोधकर्ताओं ने इसके पीछे दो प्रमुख प्रक्रियाओं की पहचान की है। इनमें से एक बदलाव दक्षिण एशिया में हो रहा है, जबकि दूसरा भूमध्यसागर के ऊपर स्थानीय स्तर पर दिखाई देता है।

रिसर्च से पता चला है कि इससे जुड़ा पहला बड़ा बदलाव दक्षिण एशिया के ऊपर दिखाई दे रहा है। धरती के गर्म होने के साथ मानसून के दौरान गर्म और नम हवा पहले की तुलना में ज्यादा ऊंचाई तक उठ रही है। यानी मानसून से जुड़े बादल और हवा का ऊपर उठने का स्तर लगातार ऊंचा हो रहा है।

सीईएसएम1 मॉडल के मुताबिक, मानसून के संवहन का सामान्य स्तर करीब 452 हेक्टोपास्कल से बढ़कर 417 हेक्टोपास्कल तक ऊपर जा सकता है। सीएमआइपी6 के दूसरे जलवायु मॉडल भी इसी तरह के बदलाव का संकेत देते हैं। इस बदलाव के कारण मानसून से पैदा होने वाली गर्मी का असर अधिक पश्चिम तक फैलता है।

इससे भूमध्यसागर के ऊपर पूर्व और पश्चिम के बीच तापमान का अंतर कम हो जाता है। और जब तापमान का यह अंतर घटता है, तो वातावरण में नीचे उतरने वाली हवा भी कमजोर पड़ने लगती है।

वहीं दूसरा बदलाव भूमध्यसागर के ऊपर हो रहा है। मानसून के कारण भूमध्यसागर के ऊपर नीचे उतरने वाली हवा खासकर वायुमंडल की ऊपरी और बीच की परतों में कमजोर पड़ने लगती है। इसके साथ ही निचले हिस्से में उत्तर दिशा से आने वाली हवाओं की ताकत भी घट जाती है। वायुमंडल में होने वाले इस बदलाव को वैज्ञानिक ‘स्वेरड्रप बैलेंस’ से जोड़ते हैं।

कमजोर उत्तरी हवाएं नीचे उतरती हवा को और कमजोर करती हैं। इस तरह एक तरह का स्थानीय फीडबैक बन जाता है, जो मानसून के प्रभाव को और कम कर देता है। यानी दक्षिण एशिया में शुरू हुआ बदलाव भूमध्यसागर तक पहुंचता है और वहां होने वाली स्थानीय वायुमंडलीय प्रक्रियाएं उस प्रभाव को और कमजोर कर देती हैं।

भूमध्यसागर में बारिश पर भी पड़ेगा असर

इस बदलाव का एक महत्वपूर्ण असर भूमध्यसागर में गर्मियों के दौरान होने वाली बारिश पर पड़ सकता है। आज दक्षिण एशियाई मानसून जितना मजबूत होता है, उससे भूमध्यसागर के ऊपर नीचे उतरने वाली हवा भी उतनी मजबूत होती है। इसके कारण वहां गर्मियों में बारिश कम होने की प्रवृत्ति रहती है। लेकिन भविष्य में यह संबंध काफी कमजोर होने का अनुमान है।

अध्ययन के अनुसार, भूमध्यसागर में साल-दर-साल होने वाले बारिश के बदलाव में दक्षिण एशियाई मानसून की भूमिका करीब 14.2 फीसदी से घटकर महज 5.1 फीसदी रह सकती है। यह गिरावट बताती है कि भविष्य में भूमध्यसागर क्षेत्र में बारिश में होने वाले उतार-चढ़ाव को समझने के लिए केवल एशियाई मानसून को देखना पर्याप्त नहीं होगा।

हालांकि इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि भूमध्यसागर में बारिश के उतार-चढ़ाव कम हो जाएंगे या मौसम अधिक स्थिर हो जाएगा।

इसका अर्थ केवल इतना है कि बारिश में हर साल होने वाले बदलाव को समझाने में दक्षिण एशियाई मानसून की भूमिका बहुत छोटी हो जाएगी। दूसरे जलवायु कारकों की भूमिका अपेक्षाकृत बढ़ सकती है।

गर्म होती दुनिया में बदल रहे जलवायु के अदृश्य रिश्ते

देखा जाए तो इस अध्ययन का महत्व सिर्फ दक्षिण एशिया और भूमध्यसागर तक सीमित नहीं है। यह जलवायु परिवर्तन की एक बड़ी तस्वीर सामने रखता है।

वैज्ञानिक लंबे समय से जानते हैं कि दुनिया के एक हिस्से में होने वाला बदलाव हजारों किलोमीटर दूर दूसरे क्षेत्र के मौसम को प्रभावित कर सकता है। इन जलवायु संबंधों को ‘टेली-कनेक्शन’ कहा जाता है। लेकिन नया अध्ययन बताता है कि जलवायु परिवर्तन केवल तापमान और बारिश को ही नहीं बदल रहा। बल्कि यह उन अदृश्य रिश्तों को भी बदल सकता है, जो दुनिया के अलग-अलग हिस्सों को आपस में जोड़ते हैं।

अध्ययन से जुड़े प्रोफेसर तियानजुन झोउ के मुताबिक, वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी केवल तापमान और बारिश की औसत स्थिति को नहीं बदलती, बल्कि जलवायु तंत्र के दूर-दराज हिस्सों के बीच मौजूद गतिशील संबंधों को भी नए तरीके से व्यवस्थित कर सकती है। उनका कहना है कि यूरेशिया में बदलता ‘मानसून-डेजर्ट’ संबंध यह समझने का नया नजरिया देता है कि गर्म होती दुनिया में जलवायु परिवर्तनशीलता और जलवायु संबंध किस तरह बदल सकते हैं।

इसका एक सीधा मतलब यह भी है कि भविष्य में भूमध्यसागर क्षेत्र में गर्मियों के दौरान होने वाली बारिश का अनुमान लगाने के लिए उन कारकों में होने वाले बदलावों को भी ध्यान में रखना होगा, जो साल-दर-साल बारिश को नियंत्रित करते हैं। वैज्ञानिकों ने यह भी चेताया है कि आज जो वायुमंडलीय संबंध मजबूत और स्थाई दिखाई देते हैं, जरूरी नहीं कि वे गर्म होती दुनिया में भी उसी तरह बने रहें।

इस अध्ययन का संदेश स्पष्ट है, जलवायु परिवर्तन सिर्फ धरती के तापमान को ही नहीं बढ़ा रहा, बल्कि मौसम को जोड़ने वाली उन अदृश्य कड़ियों को भी बदल रहा है, जिन पर आज की जलवायु निर्भर है।

ऐसे में जैसे-जैसे ये कड़ियां कमजोर होंगी, मौसम के पुराने पैटर्न बदलेंगे और भविष्य के मौसम को समझना और उसकी सटीक भविष्यवाणी करना वैज्ञानिकों के लिए और बड़ी चुनौती बन जाएगा।