समुद्र के बढ़ते तापमान को केल्प जंगलों के विनाश का प्रमुख कारण माना गया, जो दशकों से लगातार बढ़ रहा है। प्रतीकात्मक छवि, साभार: आईस्टॉक
जलवायु

जलवायु परिवर्तन के कारण 60 से 99 फीसदी तक उजड़ गए समुद्र के तैरते जंगल

समुद्री केल्प जंगल 1970 के दशक से ही तेजी से घट रहे हैं, जलवायु परिवर्तन का असर दशकों पहले से शुरू हो चुका था

Dayanidhi

  • यूनिवर्सिटी ऑफ विक्टोरिया के शोध में खुलासा हुआ कि केल्प जंगल 1970 के दशक से ही तेजी से घटने लगे थे।

  • पुराने रिकॉर्ड और सर्वे से पता चला कि पहले विशाल केल्प क्षेत्र अब लगभग पूरी तरह समाप्त हो चुके हैं।

  • समुद्र के बढ़ते तापमान को केल्प जंगलों के विनाश का प्रमुख कारण माना गया, जो दशकों से लगातार बढ़ रहा है।

  • ठंडे पानी की केल्प प्रजातियां 60 से 99 फीसदी तक घट गईं, जिससे समुद्री पारिस्थितिकी पर गंभीर प्रभाव पड़ा है।

  • केल्प जंगलों के नुकसान से मछलियों जैसे सैल्मन और हेरिंग के आवास और भोजन स्रोत भी गंभीर रूप से प्रभावित हुए हैं।

कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया तट के पास समुद्र के अंदर पाए जाने वाले केल्प (समुद्री घास जैसे बड़े शैवाल) के जंगलों को लेकर एक नया शोध सामने आया है। इस शोध में पाया गया है कि ये केल्प जंगल हाल के वर्षों में नहीं, बल्कि कई दशक पहले से ही तेजी से कम होने लगे थे। यह अध्ययन बताता है कि जलवायु परिवर्तन का असर समुद्री पारिस्थितिकी पर बहुत पहले से पड़ रहा है, जितना पहले वैज्ञानिक समझते थे।

यह शोध यूनिवर्सिटी ऑफ विक्टोरिया के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया है और इसे “इकोलॉजिकल एप्लिकेशंस” नामक वैज्ञानिक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।

शोध कैसे किया गया

शोधकर्ताओं ने साल 1972 से लेकर अब तक के पुराने रिकॉर्ड इकट्ठे किए। इनमें पुराने नक्शे, हवाई तस्वीरें और समुद्र में गोताखोरी के दौरान लिए गए अध्ययन शामिल थे।

उन्होंने कनाडा के वैंकूवर आइलैंड के पास स्थित कॉमॉक्स और डेनमैन आइलैंड जैसे इलाकों के समुद्री केल्प जंगलों का अध्ययन किया। फिर उन्होंने 2023 में फिर से उसी तरीके से सर्वे किया और दोनों आंकड़ों की तुलना की।

इसके अलावा वैज्ञानिकों ने लाइटहाउस से मिले पुराने समुद्री तापमान के रिकॉर्ड भी देखे ताकि यह समझा जा सके कि समय के साथ समुद्र का तापमान कैसे बदला।

क्या कहता है शोध?

शोध में पाया गया कि 1970 के दशक में इस इलाके में बहुत बड़े केल्प जंगल थे, जो समुद्र की सतह पर तैरते हुए लगभग 550 हेक्टेयर क्षेत्र को ढकते थे। लेकिन आज ये लगभग पूरी तरह खत्म हो चुके हैं।

वैज्ञानिकों के अनुसार, इन केल्प जंगलों का बड़ा हिस्सा 1972 से 1984 के बीच ही खत्म हो गया था। यह वह समय था जब अभी हाल के “हीटवेव” जैसे बड़े गर्म समुद्री घटनाक्रम नहीं हुए थे। इसका मतलब है कि केल्प की गिरावट बहुत पहले शुरू हो चुकी थी और धीरे-धीरे यह स्थिति खराब होती गई।

जलवायु परिवर्तन का असर

शोधकर्ताओं ने पाया कि समुद्र का तापमान लंबे समय से बढ़ रहा है। 1900 के शुरुआती वर्षों की तुलना में 1970 के दशक तक समुद्र काफी गर्म हो चुका था।

यही तापमान बढ़ोतरी केल्प जंगलों के लिए नुकसानदायक साबित हुई। ठंडे पानी में रहने वाली केल्प और अन्य समुद्री शैवाल प्रजातियां धीरे-धीरे कम होती गई। कुछ जगहों पर इनकी संख्या में 60 से 99 फीसदी तक की कमी देखी गई।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि जब ये प्रजातियां खत्म हुई, तो उनकी जगह नई गर्म पानी की प्रजातियां भी नहीं आ सकीं। इससे समुद्र के अंदर खालीपन जैसा माहौल बन गया।

समुद्री जीवन पर प्रभाव

केल्प जंगल समुद्री जीवन के लिए बहुत जरूरी होते हैं। ये कई मछलियों के लिए घर और भोजन का स्रोत होते हैं। इनमें हेरिंग, रॉकफिश और सैल्मन जैसी मछलियां शामिल हैं।

जब केल्प जंगल खत्म होते हैं, तो इन मछलियों के रहने और बढ़ने की जगह भी कम हो जाती है। इससे मछली पालन और समुद्री खाद्य श्रृंखला पर असर पड़ता है। इसके अलावा केल्प तटों को मजबूत रखते हैं और समुद्री तूफानों से सुरक्षा भी देते हैं। इसलिए इनका नुकसान सिर्फ समुद्री जीवन ही नहीं, बल्कि इंसानों के लिए भी चिंता का विषय है।

क्यों जरूरी हैं ये जंगल

शोधकर्ताओं का कहना है कि हमने समुद्र की स्थिति को लंबे समय तक सही तरीके से नहीं समझा। जो स्थिति हमें आज “सामान्य” लगती है, वह पहले से ही खराब हो चुकी स्थिति हो सकती है।

इसलिए जरूरी है कि हम पुराने रिकॉर्ड और सही आंकड़ों के आधार पर ही समुद्री पर्यावरण को समझें और उसकी सुरक्षा के लिए कदम उठाएं। यह शोध यह भी बताता है कि जलवायु परिवर्तन का असर अचानक नहीं होता, बल्कि यह धीरे-धीरे कई दशकों में पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को बदल देता है। अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो ऐसे और भी समुद्री जंगल और जीव खतरे में पड़ सकते हैं।