जलवायु

धरती का बढ़ता बुखार: 2026 में सामने आया इतिहास का दूसरा सबसे गर्म मई, अल नीनों ने बढ़ाई चिंताएं

धरती का बढ़ता बुखार अब हर महाद्वीप में महसूस किया जा सकता है, और मई 2026 की रिकॉर्ड गर्मी इस बात का सबूत है कि जलवायु संकट हमारे भविष्य नहीं, बल्कि वर्तमान को बदल रहा है।

Lalit Maurya

  • मई 2026 ने एक बार फिर दुनिया को जलवायु संकट की भयावह सच्चाई से रूबरू कराया है। यूरोपीय जलवायु एजेंसी कॉपरनिकस की रिपोर्ट के अनुसार, यह इतिहास का दूसरा सबसे गर्म मई रहा, जब वैश्विक औसत तापमान औद्योगिक-काल से पहले की तुलना में 1.42 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया।

  • यह पृथ्वी को उस खतरनाक 1.5 डिग्री सेल्सियस सीमा के बेहद करीब ले आया है, जिसके पार जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और विनाशकारी हो सकते हैं।

  • रिपोर्ट के मुताबिक, धरती के साथ-साथ समुद्र भी असामान्य रूप से गर्म रहे और प्रशांत महासागर में बढ़ता तापमान अल नीनो की वापसी के संकेत दे रहा है। इससे आने वाले महीनों में सूखा, बाढ़, लू और अन्य चरम मौसमी घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है।

  • यूरोप में मई के अंत में अचानक आई भीषण गर्मी ने कई देशों के तापमान रिकॉर्ड तोड़ दिए, जबकि दुनिया के कई हिस्सों में कहीं अत्यधिक बारिश तो कहीं गंभीर सूखे जैसी स्थितियां देखने को मिलीं। दूसरी ओर, आर्कटिक और अंटार्कटिका में समुद्री बर्फ का तेजी से घटता विस्तार भी चिंता बढ़ा रहा है।

  • यह रिपोर्ट स्पष्ट संकेत देती है कि ग्लोबल वार्मिंग अब भविष्य की नहीं, बल्कि वर्तमान की सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है।

इंसानी गलतियों ने पृथ्वी को आज एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां मौसम का मिजाज अब पहले जैसा नहीं रहा। हालात यह हैं कि बढ़ती गर्मी थमने का नाम ही नहीं ले रही। यूरोपीय क्लाइमेट एजेंसी 'कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस' (सी3एस) की ताजा रिपोर्ट ने एक बार फिर दुनिया को झकझोर दिया है।

रुझानों के मुताबिक, मई 2026 इतिहास का दूसरा सबसे गर्म मई दर्ज किया गया। इस दौरान पृथ्वी की सतह का औसत तापमान 15.81 डिग्री सेल्सियस रिकॉर्ड किया गया, जो 1991-2020 के औसत की तुलना में देखें तो 0.55 डिग्री सेल्सियस अधिक है।

वहीं अगर औद्योगिक क्रांति से पहले (1850-1900) के स्तर से तुलना करें, तो मई 2026 का तापमान सामान्य से 1.42 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा। यह डेढ़ डिग्री सेल्सियस की उस खतरनाक सीमा के बेहद करीब है, जिसे पार करने पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और गंभीर हो सकते हैं। बता दें कि अब तक का सबसे गर्म मई 2024 में दर्ज किया गया था।

गहरा रही है अल नीनो की आहट

इस दौरान न केवल धरती बल्कि समुद्र दोनों का तापमान सामान्य से काफी अधिक दर्ज किया गया, जिससे यह संकेत और मजबूत हो गया है कि पृथ्वी लगातार गर्म होती जा रही है। वैज्ञानिकों के अनुसार, भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में तापमान तेजी से बढ़ रहा है और क्षेत्र धीरे-धीरे अल नीनो की स्थिति की ओर बढ़ रहा है। इसकी वजह से दुनिया भर में सूखा, बाढ़, लू और अन्य चरम मौसम घटनाएं और बढ़ सकती हैं।

मई 2026 में समुद्र की सतही तापमान औसतन 20.9 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जो इस महीने के लिए अब तक का दूसरा सबसे ऊंचा स्तर है।

सच कहें तो यह महज थर्मामीटर का बढ़ता पारा नहीं है, यह समस्या है उस बेबस किसान की जिसकी फसलें हफ्ते भर में ही झुलस गईं। यह समस्या है उस आम इंसान की जो सुबह उठकर मौसम का बदला भयानक रूप देखता है।

कॉपरनिकस की रणनीतिक प्रमुख सामंथा बर्गिस ने दुनिया को आगाह करते हुए कहा, "यूरोप में अचानक आई यह भीषण लू यह साफ बताती है कि मौसम का यह जानलेवा रूप अब कोई अपवाद नहीं, बल्कि हमारी रोजमर्रा की नई वास्तविकता बनता जा रहा है।"

मौसम का जानलेवा 'यू-टर्न': जब संभलने का मौका भी नहीं मिला

मई के पहले हिस्से में यूरोप अपेक्षाकृत ठंडा था, लेकिन 20 मई के आसपास मौसम ने अचानक करवट ली। इसके बाद पश्चिमी यूरोप में साल की शुरुआत में आने वाली गर्मी की सबसे तीव्र लहरों में से एक दर्ज की गई।

इसके साथ ही फ्रांस, ब्रिटेन, आयरलैंड और पुर्तगाल में मई महीने के तापमान के कई रिकॉर्ड टूट गए। हवा में उमस के कारण कई क्षेत्रों में महसूस होने वाला तापमान (फील्स-लाइक तापमान) 35 से 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया।

विशेषज्ञों का कहना है कि अचानक से आए इस बदलाव ने न केवल इंसानों को बीमार किया, बल्कि खेतों में लहलहाती फसलों और पूरे इकोसिस्टम को झकझोर कर रख दिया। पेड़-पौधों और फसलों को इस भीषण गर्मी के अनुकूल ढलने का समय ही नहीं मिला, जिससे कृषि को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचा है।

मई 2026 में यूरोप के मौसम में बड़ा विरोधाभास देखने को मिला। जहां इटली, स्पेन और पश्चिमी तथा मध्य यूरोप के कई हिस्सों में सामान्य से कम बारिश हुई और सूखे जैसी परिस्थितियां बनी रहीं। दूसरी ओर तुर्की, बुल्गारिया, मोल्दोवा, फिनलैंड और काला सागर क्षेत्र में सामान्य से अधिक बारिश दर्ज की गई, जिसके कारण कई इलाकों में बाढ़ की स्थिति पैदा हो गई।

बारिश में कमी के कारण मध्य, पूर्वी और उत्तर-पूर्वी यूरोप की कई नदियों में जल प्रवाह सामान्य से कम रहा। वहीं तुर्की और इबेरियन प्रायद्वीप (स्पेन-पुर्तगाल) में भारी बारिश के कारण नदियों का जलस्तर सामान्य से अधिक दर्ज किया गया।

दुनिया के अन्य हिस्सों में भी दर्ज हुई चरम मौसमी घटनाएं

यूरोप के बाहर उत्तरी अमेरिका, ब्राजील, भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर में स्थित एशिया के कई हिस्सों, पश्चिमी चीन, दक्षिणी अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया के कई क्षेत्रों में सामान्य से अधिक बारिश दर्ज की गई।

वहीं मध्य अमेरिका, मध्य एशिया, मेडागास्कर, दक्षिण अमेरिका और दक्षिण-पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया के बड़े हिस्से सामान्य से अधिक शुष्क रहे। यह दर्शाता है कि जलवायु परिवर्तन का असर अब लगभग हर महाद्वीप में अलग-अलग रूपों में दिखाई दे रहा है।

पिघलती बर्फ: डूबते कल की आहट

इस आपदा का असर सिर्फ इंसानी बस्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया के छोरों पर शांत बर्फ भी अब दम तोड़ रही है। रिपोर्ट से पता चला है कि

आर्कटिक क्षेत्र में मई 2026 के दौरान समुद्री बर्फ का विस्तार औसत से करीब 4 फीसदी कम रहा, जो मई महीने के लिए चौथा सबसे निचला स्तर है। दूसरी ओर, अंटार्कटिका में समुद्री बर्फ का विस्तार सामान्य से 9 फीसदी कम दर्ज किया गया। बेलिंग्सहॉसेन सागर का एक बहुत बड़ा हिस्सा इस बार पूरी तरह से बर्फ-मुक्त यानी पानी में तब्दील हो चुका है, जो वैज्ञानिकों के लिए चिंता का विषय है।

मई 2026 के लिए जारी यह रिपोर्ट महज एक वैज्ञानिक दस्तावेज नहीं है, यह एक अलार्म है जो चीख-चीख कर कह रहा है कि ग्लोबल वार्मिंग अब कल की बात नहीं, बल्कि आज की त्रासदी है जो हमारे घरों की दहलीज तक पहुंच चुकी है।