यह खबर केवल एशिया के मौसम का वार्षिक लेखा-जोखा नहीं, बल्कि उस तेजी से गहराते जलवायु संकट की चेतावनी है जो अब करोड़ों लोगों के जीवन, आजीविका और भविष्य को सीधे प्रभावित कर रहा है।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) की रिपोर्ट के मुताबिक, एशिया वैश्विक औसत की तुलना में कहीं अधिक तेजी से गर्म हो रहा है और पिछले तीन दशकों में यहां तापमान बढ़ने की रफ्तार लगभग दोगुनी हो चुकी है। नतीजतन, 2025 एशिया के इतिहास का दूसरा सबसे गर्म वर्ष साबित हुआ।
रिकॉर्ड लू, विनाशकारी बाढ़, लंबे सूखे, जंगलों में भीषण आग, तेजी से पिघलते हिमालयी और तिब्बती ग्लेशियर, गर्म और अम्लीय होते महासागर तथा तेजी से बढ़ता समुद्र स्तर इस संकट की गंभीरता को उजागर करते हैं।
रिपोर्ट चेतावनी देती है कि यदि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में तेजी से कटौती नहीं की गई और समय रहते प्रभावी पूर्वानुमान, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली तथा जलवायु अनुकूलन उपायों को मजबूत नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में मानवीय, आर्थिक और पर्यावरणीय नुकसान कहीं अधिक भयावह हो सकता है।
साफ है कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य का खतरा नहीं, बल्कि एशिया की वर्तमान और सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है।
कहीं जीवन देने वाली नदियां बाढ़ बनकर घरों और सपनों को बहा रही हैं, तो कहीं सदियों पुराने ग्लेशियर हमारी आंखों के सामने तेजी से पिघल रहे हैं। खेत सूखे की मार से बंजर हो रहे हैं, जबकि शहर रिकॉर्ड तोड़ गर्मी में झुलस रहे हैं।
यह कोई कोरी कल्पना नहीं, बल्कि उस कड़वी हकीकत की तस्वीर है जिसका सामना 2025 में भारत, चीन, जापान, पाकिस्तान समेत एशिया के करोड़ों लोगों ने किया। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) की नई रिपोर्ट बताती है कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य का खतरा नहीं, बल्कि मौजूदा समय का संकट बन चुका है।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) की नई रिपोर्ट "स्टेट ऑफ द क्लाइमेट इन एशिया 2025" के मुताबिक, एशिया आज दुनिया के उन क्षेत्रों में शामिल है जहां जलवायु परिवर्तन का असर सबसे तेजी से दिखाई दे रहा है।
रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि पिछले कुछ दशकों में एशिया का तापमान वैश्विक औसत की तुलना में कहीं अधिक तेजी से बढ़ा है। यही वजह है कि 2025 एशिया के लिए जलवायु इतिहास का दूसरा सबसे गर्म साल रहा। चिंता की बात है कि 1991 से 2025 के बीच एशिया में तापमान में हो रही वृद्धि की दर 1961-1990 की तुलना में करीब दोगुनी रही।
भीषण गर्मी ने तोड़े रिकॉर्ड
रिपोर्ट से पता चला है कि 2025 में भीषण गर्मी एशिया की सबसे बड़ी जलवायु चुनौती बनकर उभरी। इस दौरान जापान, चीन और दक्षिण कोरिया ने अपने इतिहास की सबसे गर्म गर्मियों का सामना किया। मध्य, पश्चिम एशिया और अरब प्रायद्वीप के कई हिस्सों में लंबे समय तक लू का कहर देखा गया।
हालात यह रहे कि कजाकिस्तान में कई महीनों (मार्च, अप्रैल, जून और जुलाई) के दौरान तापमान सामान्य से 14 डिग्री सेल्सियस तक अधिक दर्ज किया गया। वहीं बहरीन में लगातार दस दिनों तक तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर बना रहा। गर्म और शुष्क मौसम ने दक्षिण कोरिया में अब तक की सबसे बड़ी जंगल की आग को भी जन्म दिया।
बता दें कि विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) ने हाल ही में जारी अपनी एक अन्य रिपोर्ट में खुलासा किया है कि 2026 से 2030 के बीच वैश्विक तापमान औद्योगिक काल से पहले की तुलना में 1.9 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है।
कहीं बाढ़, कहीं सूखा
रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण एशिया के अधिकांश हिस्सों में पिछले साल सामान्य से कहीं अधिक बारिश हुई। मानसून के दौरान हुई भारी बारिश ने कई देशों में तबाही मचा दी। पाकिस्तान में तो मानसून के दौरान आई बाढ़ के कारण 1,000 से अधिक लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा, जबकि 30 लाख से अधिक लोगों को दूसरे की सहायता लेने पर मजबूर होना पड़ा।
वहीं वियतनाम में लगातार आई बाढ़ ने कम से कम 200 लोगों की जिंदगियां निगल ली और करीब 190 करोड़ डॉलर का आर्थिक नुकसान पहुंचाया।
दक्षिण-पूर्व एशिया में चक्रवात सेन्यार के कारण थाईलैंड, मलेशिया और इंडोनेशिया के कई क्षेत्रों में भीषण बाढ़ आई। दूसरी ओर, ईरान सहित पश्चिम और मध्य एशिया के कई हिस्से लंबे सूखे और जल संकट से जूझते रहे। इसी तरह अप्रैल 2025 में पश्चिम एशिया में आए भीषण धूल और रेत के तूफानों ने परिवहन, स्वास्थ्य और आर्थिक गतिविधियों को भी गंभीर रूप से प्रभावित किया।
देखा जाए तो मौसम के इस रौद्र रूप ने पूरी दुनिया के सामने यह साबित कर दिया है कि एशिया अब जलवायु परिवर्तन के महाविनाश की फ्रंटलाइन पर खड़ा है।
तेजी से पिघल रहे हैं हिमालय और तिब्बत के ग्लेशियर
रिपोर्ट में सबसे चिंताजनक संकेत एशिया के ऊंचे पर्वतीय इलाकों से मिले हैं। तिब्बती पठार और आसपास के क्षेत्रों में मौजूद ग्लेशियर, जो ध्रुवीय क्षेत्रों के बाहर दुनिया का सबसे बड़ा हिम भंडार हैं, लगातार सिकुड़ रहे हैं।
चिंता की बात है कि अक्टूबर 2024 से सितंबर 2025 के बीच निगरानी किए गए सभी 23 ग्लेशियरों ने अपनी बर्फ खोई है। बर्फबारी में कमी और सामान्य से अधिक तापमान इसके लिए प्रमुख रूप से जिम्मेवार रहे।
विशेष रूप से तियानशान और पामीर पर्वत क्षेत्रों के ग्लेशियरों में जमा बर्फ में भारी गिरावट आई है। इससे न केवल भविष्य की जल सुरक्षा पर खतरा मंडरा रहा है, बल्कि ग्लेशियर झील फटने (जीएलओएफ) और हिमखंड टूटने जैसी आपदाओं का जोखिम भी लगातार बढ़ रहा है।
महासागर भी दे रहे खतरे की चेतावनी
रिपोर्ट के अनुसार, एशिया के आसपास के महासागरों में जमा होने वाली गर्मी 2025 में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई। जुलाई से सितंबर के बीच समुद्री लू ने एशिया के करीब-करीब पूरे समुद्री क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लिया। इसका प्रभाव एक करोड़ वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में देखा गया, जो चीन या अमेरिका के कुल क्षेत्रफल के बराबर है।
समुद्र के लगातार गर्म और अम्लीय बनने से समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र और तटीय समुदायों के सामने नए खतरे पैदा हो रहे हैं।
स्थिति यह है कि एशिया में समुद्र का स्तर भी 1999 में उपग्रह रिकॉर्ड शुरू होने के बाद सबसे उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। भारतीय तटों पर तो समुद्र के जलस्तर के बढ़ने की दर वैश्विक औसत से कहीं अधिक दर्ज की गई।
रुझान दर्शाते हैं कि 1999 से 2025 के बीच उत्तरी हिंद महासागर के अधिकांश तटीय इलाकों में समुद्र के स्तर में वृद्धि की दर वैश्विक औसत 3.6 मिलीमीटर प्रति वर्ष से अधिक रही। भारत के तटों पर यह बढ़ोतरी लगभग 4.9 मिलीमीटर प्रति वर्ष दर्ज की गई, जबकि जापान के पास स्थित कुरोशियो करंट क्षेत्र में यह दर 6 मिलीमीटर प्रति वर्ष से भी अधिक रिकॉर्ड की गई।
इस दौरान समुद्र की सतह का पीएच स्तर भी लगातार गिरता रहा, जो महासागरों के बढ़ते अम्लीकरण का संकेत है। अरब सागर, बंगाल की खाड़ी और उष्णकटिबंधीय हिंद महासागर के कई हिस्सों में पीएच स्तर रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है।
समय रहते चेतावनी ने बचाई जानें
रिपोर्ट में इस बात पर भी जोर दिया गया है मौसमी पूर्वानुमान और समय पर चेतावनी प्रणालियां आपदाओं के नुकसान को काफी हद तक कम कर सकती हैं। उदाहरण के लिए चीन के सिचुआन प्रांत में समय रहते जारी चेतावनी और लोगों की सुरक्षित निकासी ने भारी बारिश के दौरान कई जिंदगियां बचाईं।
रिपोर्ट यह भी बताती है कि जहां चेतावनी प्रणाली कमजोर रही, वहां मानवीय और आर्थिक नुकसान कहीं अधिक गंभीर रहा।
उष्णकटिबंधीय चक्रवात दित्वाह के कारण श्रीलंका में 24 घंटे के भीतर सालभर की सामान्य बारिश का करीब 10 फीसदी पानी बरस गया। इस आपदा में 640 से अधिक लोगों की मौत हुई, दो लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हुए और देश को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के करीब चार फीसदी के बराबर आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा।
यह घटना बताती है कि चरम मौसम से जुड़े जोखिम कितने बड़े हो सकते हैं और उनसे निपटने के लिए बेहतर पूर्वानुमान के साथ-साथ तैयारी कितनी जरूरी है।
डब्ल्यूएमओ की महासचिव प्रोफेसर सेलेस्टे साउलो के मुताबिक, बढ़ता तापमान, गर्म होते महासागर, समुद्र स्तर में वृद्धि और पिघलते ग्लेशियर एशिया के लिए गंभीर खतरा बन चुके हैं। ऐसे में प्रभावी निगरानी, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और बेहतर तैयारी ही जलवायु संकट के बढ़ते प्रभावों से बचाव का सबसे मजबूत साधन हैं।
देखा जाए तो 2025 की यह रिपोर्ट केवल बीते साल के मौसम का लेखा-जोखा नहीं, बल्कि भविष्य की एक स्पष्ट चेतावनी है। एशिया आज जलवायु परिवर्तन के सबसे बड़े मोर्चे पर खड़ा है, जहां हर दिनी गर्मी, हर पिघलता ग्लेशियर और समुद्र का बढ़ता स्तर यह याद दिला रहा है कि अब समय केवल संकट को समझने का नहीं, बल्कि उससे निपटने के लिए तेज और ठोस कदम उठाने का है। क्योंकि आज की तैयारी ही आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा तय करेगी।