1979 से आर्कटिक समुद्री बर्फ का पिघलने का मौसम करीब 40 दिन लंबा हुआ, अधिकांश बदलाव 2010 से पहले हुआ। फोटो साभार: आईस्टॉक
जलवायु

आर्कटिक में समुद्री बर्फ पिघलने का मौसम 40 दिन बढ़ा, 2010 के बाद बदलाव थमा

आर्कटिक समुद्री बर्फ का पिघलने का मौसम 40 दिन लंबा हुआ, 2010 के बाद स्थिरता दिखी, लेकिन जलवायु परिवर्तन का खतरा अब भी बरकरार

Dayanidhi

  • 1979 से आर्कटिक समुद्री बर्फ का पिघलने का मौसम करीब 40 दिन लंबा हुआ, अधिकांश बदलाव 2010 से पहले हुआ।

  • 2010 के बाद पिघलने के मौसम की औसत अवधि स्थिर रही, लेकिन हर साल मौसम के अनुसार बड़ा अंतर दिखाई दिया।

  • आर्कटिक में मोटी बहुवर्षीय बर्फ घटने से पतली बर्फ बढ़ी, जिससे बादल, तूफान और हवाओं का प्रभाव बढ़ा।

  • 2000 के दशक में खुला समुद्री पानी सूर्य की अधिक गर्मी सोखता रहा, जिससे शरद ऋतु में बर्फ जमना देर से हुआ।

  • आर्कटिक अब भी वैश्विक औसत से लगभग चार गुना तेजी से गर्म हो रहा है, इसलिए स्थिरता अस्थायी साबित हो सकती है।

उपग्रह आंकड़ों के नए अध्ययन में सामने आया है कि आर्कटिक में समुद्री बर्फ के पिघलने का मौसम 1979 की तुलना में करीब 40 दिन लंबा हो गया है। हालांकि इस बदलाव की रफ्तार 2010 के आसपास अचानक स्थिर हो गई। वैज्ञानिकों के अनुसार, इसका मतलब यह नहीं है कि आर्कटिक पर जलवायु परिवर्तन का असर कम हो गया है। बल्कि अब मौसम और वायुमंडलीय परिस्थितियां बर्फ के पिघलने और जमने को अधिक प्रभावित कर रही हैं।

1979 से 2023 तक उपग्रह आंकड़ों का अध्ययन

नासा के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन में 1979 से 2023 तक के उपग्रह अवलोकनों का विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं ने यह पता लगाया कि हर साल वसंत ऋतु में समुद्री बर्फ कब पिघलना शुरू होती है और शरद ऋतु में दोबारा कब जमती है।

कम्युनिकेशन्स अर्थ एंड एनवायरनमेंट पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, पिछले चार दशकों में आर्कटिक समुद्री बर्फ का पिघलने का मौसम लगभग 40 दिन लंबा हो चुका है। इस बढ़ोतरी का अधिकांश हिस्सा 2010 से पहले हुआ। 2010 के बाद औसत पिघलने के मौसम की अवधि में कोई बड़ा लगातार बदलाव नहीं देखा गया, हालांकि अलग-अलग वर्षों में काफी अंतर बना रहा।

बर्फ जल्दी पिघलने के बजाय देर से जम रही

वैज्ञानिकों को इस बदलाव में एक अहम बात पता चली। पिघलने का मौसम लंबा होने का मुख्य कारण यह नहीं था कि वसंत में बर्फ बहुत जल्दी पिघलने लगी। इसके बजाय शरद ऋतु में बर्फ का दोबारा जमना देर से होने लगा।

2000 के दशक में आर्कटिक समुद्री बर्फ के क्षेत्रफल और मोटाई में तेजी से कमी आई। पहले आर्कटिक में कई वर्षों तक टिकने वाली मोटी बर्फ काफी मात्रा में मौजूद थी। अब समुद्री बर्फ का बड़ा हिस्सा अपेक्षाकृत नया और पतला है।

नासा के वैज्ञानिकों के अनुसार, पतली बर्फ मौसम में होने वाले बदलावों के प्रति ज्यादा संवेदनशील होती है। बादल, तूफान और तेज हवाएं अब पिघलने के मौसम की अवधि पर अधिक प्रभाव डाल सकती हैं।

बर्फ कम होने से समुद्र ने ज्यादा गर्मी सोखी

शोधकर्ताओं ने यह समझने के लिए आर्कटिक के ऊर्जा संतुलन का भी अध्ययन किया। इसमें सूर्य से आने वाली गर्मी, वायुमंडल और समुद्र से मिलने वाली ऊर्जा तथा अंतरिक्ष में वापस जाने वाली गर्मी के बीच अंतर देखा गया।

2000 के दशक में जब समुद्री बर्फ तेजी से कम हुई, तो गहरे रंग का समुद्री पानी अधिक मात्रा में खुल गया। समुद्री पानी बर्फ की तुलना में सूर्य की ज्यादा ऊर्जा सोखता है। इससे समुद्र गर्म हुआ और शरद ऋतु में बर्फ के जमने में देरी हुई। परिणामस्वरूप पिघलने का मौसम और लंबा होता गया।

2010 के बाद बादलों का बढ़ा असर

2010 के बाद स्थिति कुछ बदली। वैज्ञानिकों ने पाया कि आर्कटिक के कुछ हिस्सों में बादलों के बदलते स्वरूप के कारण समुद्र की सतह तक पहुंचने वाली सूर्य की ऊर्जा कम हुई। इससे बर्फ के पिघलने के मौसम को और लंबा होने से कुछ हद तक रोकने में मदद मिली।

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि हर साल बर्फ एक जैसी स्थिति में रहती है। किसी वर्ष ज्यादा बादल, तूफान या हवाएं हो सकती हैं, जबकि दूसरे साल परिस्थितियां अलग हो सकती हैं। इसलिए साल-दर-साल पिघलने के मौसम में काफी उतार-चढ़ाव देखा जा सकता है।

आर्कटिक अब भी तेजी से गर्म हो रहा

अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि 2010 के बाद पिघलने के मौसम का स्थिर होना जलवायु परिवर्तन के रुकने का संकेत नहीं है। आर्कटिक क्षेत्र अब भी दुनिया के औसत की तुलना में लगभग चार गुना तेजी से गर्म हो रहा है। समुद्री बर्फ की मोटाई भी कई दशक पहले की तुलना में काफी कम है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि पतली बर्फ के कारण अब वातावरण में होने वाले बदलावों का असर ज्यादा दिखाई देता है। बादलों और मौसम की परिस्थितियों में छोटा बदलाव भी किसी वर्ष बर्फ के पिघलने की अवधि को बढ़ा या घटा सकता है।

आगे फिर तेजी से पिघल सकती है बर्फ

शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि मौजूदा स्थिरता स्थायी नहीं भी हो सकती। ग्रीनलैंड के उत्तर और कनाडाई आर्कटिक द्वीपसमूह के आसपास अभी भी मोटी समुद्री बर्फ मौजूद है। यदि आने वाले वर्षों में इन क्षेत्रों की बर्फ भी लगातार पतली होती गई, तो आर्कटिक समुद्री बर्फ में फिर से तेजी से कमी आ सकती है।

ऐसी स्थिति में पिघलने का मौसम दोबारा लंबा हो सकता है। इसलिए वैज्ञानिकों ने लगातार उपग्रह निगरानी जारी रखने की जरूरत बताई है। इससे समुद्री बर्फ की मोटाई, क्षेत्रफल और उसके पिघलने-जमने को प्रभावित करने वाली ऊर्जा में हो रहे बदलावों को समझने में मदद मिलेगी। फिलहाल यह सवाल खुला है कि 2010 के बाद दिखाई दे रही स्थिरता आर्कटिक के पिघलने के मौसम में लंबे समय का बदलाव है या तेज बदलाव से पहले आया एक अस्थायी विराम।