सितंबर 2026 में देश के ज्यादातर शहरों की हवा भले ही सर्दियों जैसी जहरीली नहीं दिखी हो, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि सांस लेने लायक हवा अभी भी लाखों लोगों से दूर है।
सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) के विश्लेषण के मुताबिक, पर्याप्त आंकड़ों वाले 251 शहरों में से 230 में पीएम2.5 का मासिक औसत विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की 15 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की सुरक्षित दैनिक सीमा से अधिक रहा। यानी करीब 92 फीसदी शहर इस स्वास्थ्य-आधारित मानक पर खरे नहीं उतरे।
हरियाणा का पानीपत 78 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर के औसत पीएम2.5 स्तर के साथ देश का सबसे प्रदूषित शहर रहा। यहां 29 में से 20 दिन प्रदूषण भारत के राष्ट्रीय मानक से भी ऊपर रहा। देश के 10 सबसे प्रदूषित शहरों में हरियाणा के पांच शहर शामिल रहे।
इसके उलट नागालैंड की राजधानी कोहिमा में पीएम2.5 का औसत महज 10 माइक्रोग्राम रहा और पूरे महीने हवा ‘अच्छी’ श्रेणी में रही। यह अंतर बताता है कि साफ हवा कोई असंभव लक्ष्य नहीं, बल्कि सही नीतियों और स्थानीय कार्रवाई से हासिल की जा सकने वाली जरूरत है।
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) द्वारा जारी नई रिपोर्ट के मुताबिक, 92 दिनों के पूरे मानसून के दौरान दिल्ली में सिर्फ एक दिन हवा ‘बेहतर’ श्रेणी में रही, जबकि इस दौरान राजधानी में अच्छी बारिश हुई। रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में 9 जुलाई को हवा की गुणवत्ता ‘बेहतर’ श्रेणी में रही। उस दिन सफदरजंग और पालम मौसम केंद्रों पर दर्ज औसत बारिश 67.75 मिलीमीटर थी। इसके बावजूद मानसून के बाकी दिनों में वायु गुणवत्ता ‘बेहतर’ श्रेणी तक नहीं पहुंच सकी। सीएसई ने 1 जून से 31 अगस्त 2026 तक 92 दिनों के आंकड़ों का विश्लेषण किया है।
सितंबर के आंकड़े यह भी चेताते हैं कि वायु प्रदूषण अब सिर्फ सर्दियों का संकट नहीं, बल्कि सालभर हमारी सांसों और सेहत पर मंडराता खतरा है।
साफ हवा हमारी जिंदगी की सबसे बुनियादी जरूरतों में से एक है, इतनी बुनियादी कि हम अक्सर इसके बारे में सोचते भी नहीं। लेकिन जब इसी हवा में पीएम2.5 जैसे प्रदूषण के बेहद महीन कण घुल जाते हैं, तो हर सांस अपने साथ एक अदृश्य खतरा लेकर आती है। ऐसा ही कुछ पिछले महीने भी देखने को मिला।
भले ही इस दौरान जब देश के कई हिस्सों में बारिश और बदलते मौसम से गर्मी में राहत जरूर मिली, लेकिन तब भी करोड़ों लोगों के लिए हवा पूरी तरह सुरक्षित नहीं रही। रुझान दर्शाते हैं कि सितम्बर 2026 में देश के ज्यादातर शहरों में सांस के साथ शरीर के भीतर पहुंचने वाला प्रदूषण के महीन कण (पीएम2.5) सुरक्षित सीमा से ऊपर बने रहे।
इससे साफ है कि वायु प्रदूषण केवल सर्दियों की समस्या नहीं, बल्कि सालभर लोगों की सेहत को प्रभावित करने वाला संकट बन चुका है।
सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) ने अपने ताजा विश्लेषण में खुलासा किया है कि सितंबर 2026 के दौरान देश में निगरानी किए गए 251 शहरों में से 230 में पीएम2.5 का मासिक औसत स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की सुरक्षित दैनिक सीमा (15 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर) से ऊपर दर्ज किया गया।
यानी इस दौरान देश के करीब 92 फीसदी शहरों में लोगों ने ऐसी हवा में सांसें ली जो स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से सुरक्षित नहीं मानी जाती।
हालांकि, भारतीय मानकों की बात करें तो तस्वीर कुछ बेहतर नजर आती है। 251 शहरों में से 246 शहरों में पीएम2.5 का मासिक औसत भारत के राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानक (एनएएक्यूएस) की 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की सीमा से नीचे रहा। लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी मानकों के मुताबिक महज 21 शहर ही सुरक्षित सीमा के भीतर रहे।
इसका मतलब है कि देश के ज्यादातर शहरों में लोगों के पास सांस लेने के लिए हवा तो थी, लेकिन वह हवा पूरी तरह सुरक्षित नहीं थी। सबसे ज्यादा चिंता हरियाणा को लेकर सामने आई। रिपोर्ट दर्शाती है कि सितंबर में देश के सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में हरियाणा का दबदबा रहा। जहां देश के 10 सबसे प्रदूषित शहरों में पांच शहर शामिल रहे।
इनमें पानीपत, जींद, यमुनानगर, गुरुग्राम और मानेसर शामिल रहे। इसके अलावा उत्तर प्रदेश के दो शहर, जबकि पंजाब, मध्य प्रदेश और असम का एक-एक शहर इस सूची में शामिल रहा।
विश्लेषण में सामने आया है कि हरियाणा का पानीपत सितंबर में देश का सबसे प्रदूषित शहर रहा। यहां पीएम2.5 का मासिक औसत स्तर 78 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया, जो भारत के 60 माइक्रोग्राम के दैनिक मानक से भी काफी अधिक है।
आंकड़े दर्शाते हैं कि पानीपत में सितंबर के 29 दिनों के आंकड़ों में से 20 दिन पीएम2.5 का स्तर राष्ट्रीय मानक से ऊपर रहा। इनमें पांच दिन हवा ‘बेहद खराब’, छह दिन ‘खराब’ और नौ दिन ‘मध्यम’ श्रेणी में रही। वहीं केवल तीन दिन हवा ‘संतोषजनक’ और छह दिन ‘अच्छी’ श्रेणी में रही।
दूसरे स्थान पर भी हरियाणा का ही जींद रहा। यहां पीएम2.5 का मासिक औसत स्तर 66 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रिकॉर्ड किया गया। सितंबर के दौरान जींद में 16 दिन हवा ‘मध्यम’, दो दिन ‘खराब’ और 12 दिन ‘संतोषजनक’ श्रेणी में रही।
इसके बाद उत्तर प्रदेश का खोड़ा तीसरे, पंजाब का मंडी गोबिंदगढ़ चौथे और हरियाणा का यमुनानगर पांचवें स्थान पर रहा। गुरुग्राम, मानेसर, मध्य प्रदेश का पीथमपुर, उत्तर प्रदेश का गोरखपुर और असम का बर्नीहाट भी शीर्ष 10 प्रदूषित शहरों में शामिल रहे।
चिंता की बात है कि प्रदूषण की समस्या केवल कुछ दिनों तक सीमित नहीं रही। सितंबर में कुल 62 शहर ऐसे रहे, जो अलग-अलग दिनों में देश के 10 सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में शामिल हुए। उदाहरण के लिए मंडी गोबिंदगढ़ 21 दिनों के साथ सबसे अधिक बार इस सूची में आया। इसके बाद जींद 20 दिन, पानीपत 18 दिन, खोड़ा और मानेसर 16-16 दिन तथा पीथमपुर और यमुनानगर 15-15 दिन इस सूची में रहे।
यह आंकड़े बताते हैं कि कई शहरों में प्रदूषण कोई अचानक बढ़ने वाली घटना नहीं है। यह वहां के लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनता जा रहा है, ऐसी हवा, जिसे बच्चे स्कूल जाते समय, बुजुर्ग सुबह की सैर के दौरान और कामगार पूरे दिन सांस के साथ अपने शरीर में लेते हैं।
देखा जाए तो प्रदूषण की चर्चा अक्सर दिल्ली और दूसरे बड़े महानगरों के आसपास केंद्रित रहती है, लेकिन सितंबर के आंकड़े बताते हैं कि समस्या इससे कहीं व्यापक है।
नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (एनसीएपी) के तहत आने वाले 94 शहरों में से 93 शहरों में पीएम2.5 का मासिक औसत स्तर भारत के राष्ट्रीय मानक से नीचे रहा। लेकिन इनमें 86 शहर विश्व स्वास्थ्य संगठन की 15 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की सुरक्षित दैनिक सीमा से ऊपर रहे।
वहीं, एनसीएपी से बाहर के 157 शहरों में से 143 शहरों में पीएम2.5 का मासिक औसत डब्ल्यूएचओ की सुरक्षित सीमा से अधिक रहा। इनमें से चार शहरों में तो यह स्तर भारत के 60 माइक्रोग्राम के राष्ट्रीय मानक से भी ऊपर पहुंच गया।
विश्लेषण के मुतबिक जहां पानीपत में प्रदूषण का स्तर चिंता बढ़ाने वाला रहा, वहीं नागालैंड की राजधानी कोहिमा ने सितंबर में देश के सबसे साफ शहर का स्थान हासिल किया। यहां पीएम2.5 का मासिक औसत महज 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रहा।
कोहिमा के बाद जम्मू-कश्मीर का लेह और महाराष्ट्र का डोंबिवली सबसे साफ शहरों में शामिल रहे। वहीं देश के दस सबसे साफ 10 शहरों में छत्तीसगढ़, जम्मू-कश्मीर और महाराष्ट्र के दो-दो शहर शामिल रहे, जबकि नागालैंड, ओडिशा, सिक्किम और उत्तर प्रदेश का एक-एक शहर में इस लिस्ट में शामिल रहा।
सितंबर के पूरे महीने कोहिमा में सभी 29 दिनों का पीएम2.5 स्तर ‘अच्छी’ श्रेणी में रहा। लेह में भी सभी 26 उपलब्ध दिनों में हवा 'बेहतर' श्रेणी में दर्ज की गई।
देश के बड़े महानगरों की बात करें तो दिल्ली में सितम्बर के दौरान पीएम2.5 का मासिक औसत स्तर 38 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रहा। यह भारत के 60 माइक्रोग्राम के दैनिक मानक से काफी नीचे है, लेकिन दूसरी तरफ डब्ल्यूएचओ की 15 माइक्रोग्राम की सुरक्षित सीमा से ढाई गुना से अधिक है।
इसी तरह कोलकाता में यह औसत 28, चेन्नई में 27, बेंगलुरु में 23 और मुंबई में 15 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रहा। यानी इन सभी महानगरों ने भारत के राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानक को हासिल किया, लेकिन मुंबई को छोड़कर सभी विश्व स्वास्थ्य संगठन की दैनिक सुरक्षित सीमा से ऊपर रहे।
हालांकि ये आंकड़े राष्ट्रीय मानकों के दायरे में हैं, लेकिन बदलते मौसम के साथ जैसे-जैसे पराली और सर्दियों का प्रकोप बढ़ेगा, यह साफ हवा जहरीले कोहरे में तब्दील होने में देर नहीं लगाएगी।
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) द्वारा जारी नई रिपोर्ट के मुताबिक, 92 दिनों के पूरे मानसून के दौरान दिल्ली में सिर्फ एक दिन हवा ‘बेहतर’ श्रेणी में रही, जबकि इस दौरान राजधानी में अच्छी बारिश हुई। रिपोर्ट 30 सितंबर 2026 को जारी की गई थी।
रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में 9 जुलाई को हवा की गुणवत्ता ‘बेहतर’ श्रेणी में रही। उस दिन सफदरजंग और पालम मौसम केंद्रों पर दर्ज औसत बारिश 67.75 मिलीमीटर थी। इसके बावजूद मानसून के बाकी दिनों में वायु गुणवत्ता ‘बेहतर’ श्रेणी तक नहीं पहुंच सकी। सीएसई ने 1 जून से 31 अगस्त 2026 तक 92 दिनों के आंकड़ों का विश्लेषण किया है।
इस दौरान दिल्ली में सिर्फ 3 दिन (3.3 फीसदी) हवा ‘खराब’ श्रेणी में रही। वहीं 35 दिन (38 फीसदी) हवा ‘संतोषजनक’ और सबसे ज्यादा 53 दिन (57.6 फीसदी) ‘मध्यम’ श्रेणी में रहे। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि तुलना के लिए गर्मी के मौसम में 1 अप्रैल से 31 मई तक के 61 दिनों के आंकड़ों को भी देखा गया। आंकड़े बताते हैं कि भारी बारिश के बावजूद मानसून दिल्ली की हवा को लगातार ‘बेहतर’ श्रेणी में बनाए रखने में सफल नहीं रहा।
सितंबर में सामने आए यह आंकड़े एक महत्वपूर्ण अंतर को सामने रखते हैं। भारत के राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानक के मुताबिक 251 में से 246 शहरों में पीएम2.5 का मासिक औसत सीमा के भीतर रहा, लेकिन दूसरी तरफ विश्व स्वास्थ्य संगठन के स्वास्थ्य-आधारित मानक के मुताबिक केवल 21 शहर ही सुरक्षित सीमा में रहे।
इस अंतर को केवल आंकड़ों का फर्क मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पीएम2.5 के बेहद महीन कण सांसों के जरिए फेफड़ों में पहुंच जाते हैं और लंबे समय तक इनके संपर्क में रहना स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकते हैं।
इसलिए साफ हवा का सवाल केवल यह नहीं कि कोई शहर राष्ट्रीय मानक के भीतर है या बाहर। असली सवाल यह है कि वहां रहने वाले लोगों को हर दिन कितनी साफ हवा मिल रही है।
सितंबर के आंकड़े यही याद दिलाते हैं कि प्रदूषण से लड़ाई सिर्फ सर्दियों में दिखाई देने वाली धुंध को हटाने तक सीमित नहीं हो सकती। साफ हवा के लिए सालभर उत्सर्जन के स्रोतों पर नियंत्रण, बेहतर निगरानी और शहरों के स्तर पर ठोस कार्रवाई की जरूरत है।
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