जलवायु परिवर्तन, अनिश्चित मानसून और तेजी से घटते भूजल के बीच भारतीय कृषि एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। ऐसे समय में वैज्ञानिकों का मानना है कि अंतरिक्ष से मिलने वाले उच्च-रिजॉल्यूशन सैटेलाइट आंकड़े खेती के भविष्य को नई दिशा दे सकते हैं।
साइंस जर्नल में प्रकाशित नए अध्ययन के अनुसार आधुनिक सैटेलाइट और जियोस्पेशियल तकनीक की मदद से यह पता लगाया जा सकेगा कि किस क्षेत्र में कौन-सी फसल और कृषि पद्धति सबसे अधिक सफल होगी, कहां जल संकट सबसे गंभीर है और किन इलाकों को तत्काल सरकारी सहायता की जरूरत है।
इससे संसाधनों का बेहतर उपयोग, जल संरक्षण और कृषि योजनाओं को अधिक प्रभावी बनाया जा सकेगा।
अध्ययन में खास तौर पर भारत के छोटे और सीमांत किसानों पर ध्यान दिया गया है, जिनके खेत अब नई पीढ़ी के सैटेलाइट से सटीक रूप से देखे जा सकते हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि सैटेलाइट डेटा सरकारों और नीति-निर्माताओं को अधिक सटीक फैसले लेने में मदद करेगा।
यदि इस तकनीक को कृषि नीतियों, फसल प्रबंधन और जल संरक्षण से जोड़ा गया, तो भारत खाद्य सुरक्षा मजबूत करने के साथ-साथ भूजल बचाने, खेती को अधिक पर्यावरण अनुकूल बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठा सकता है।
भारत में किसान आज दोहरी चुनौती से जूझ रहे हैं। एक ओर जलवायु परिवर्तन के चलते अनिश्चित मानसून, बाढ़, सूखा, बेमौसम बारिश और बढ़ता तापमान खेती की मुश्किलें बढ़ा रहे हैं, तो दूसरी ओर तेजी से घटता भूजल कृषि के भविष्य पर सवाल खड़े कर रहा है। ऊपर से एक बड़ा सवाल यह भी है कि प्रकृति पर अतिरिक्त बोझ डाले बिना बढ़ती आबादी के लिए अधिक भोजन कैसे उगाया जाए?
ऐसे समय में अंतरिक्ष से मिलने वाली जानकारी भारतीय किसानों के लिए नई उम्मीद बनकर सामने आई है।
अमेरिका के मिशिगन विश्वविद्यालय में पर्यावरण एवं सतत विकास से जुड़े मुद्दों पर रिसर्च कर रही विशेषज्ञ प्रोफेसर मेहा जैन के नेतृत्व में किए नए अध्ययन से पता चला है कि उच्च-रिजॉल्यूशन वाली सैटेलाइट तस्वीरें और आधुनिक भू-स्थानिक (जियोस्पेशियल) आंकड़ों का विश्लेषण भारत जैसे देशों में कृषि की तस्वीर बदल सकता है।
इनकी मदद से यह पता लगाया जा सकता है कि भारत के किस इलाके में कौन-सी कृषि पद्धति सबसे अधिक कारगर होगी। कहां सरकारी योजनाओं का सबसे ज्यादा असर होगा और किन क्षेत्रों को तत्काल सहायता की जरूरत है।
इससे सरकारें और नीति-निर्माता अपने संसाधनों का सही जगह उपयोग कर सकेंगे और छोटे किसानों तक भी अधिक प्रभावी कृषि योजनाएं पहुंचाई जा सकेंगी।
छोटे किसानों पर दिया गया है विशेष ध्यान
यह अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल साइंस में प्रकाशित हुए हैं। इस अध्ययन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें छोटे जोत वाले किसानों की खेती पर विशेष ध्यान दिया गया है। अध्ययन में रिमोट सेंसिंग, भू-स्थानिक (जियोस्पेशियल) विश्लेषण, जनगणना और किसानों से जुड़े आंकड़ों को मिलाकर यह समझने की कोशिश की गई है कि बदलते मौसम और भूजल के गिरते स्तर का फसलों पर क्या असर पड़ रहा है।
साथ ही यह भी देखा गया कि किसान अपनी फसल और खेती के तौर-तरीके बदलकर इन चुनौतियों से किस हद तक मुकाबला कर सकते हैं।
गौरतलब है कि भारत में 85 फीसदी से अधिक किसान छोटे और सीमांत हैं। इनके खेत अक्सर इतने छोटे होते हैं कि पुराने सैटेलाइट उन्हें स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं कर पाते थे। लेकिन अब नई पीढ़ी के सैटेलाइट 10 मीटर या उससे बेहतर रिजॉल्यूशन पर खेतों की तस्वीरें उपलब्ध करा रहे हैं। इससे छोटे-छोटे खेतों की भी सटीक निगरानी संभव हो गई है।
क्या है यह नई रणनीति?
इससे यह समझना आसान होगा कि कहां फसलें जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित हो रही हैं, किन इलाकों में भूजल तेजी से घट रहा है, किसान इन चुनौतियों से निपटने के लिए अपनी खेती में क्या बदलाव कर सकते हैं और किन क्षेत्रों में नई कृषि तकनीकों या फसल बदलाव से सबसे अधिक लाभ मिल सकता है।
यह सच है कि जलवायु परिवर्तन के कारण खेती पहले से अधिक अनिश्चित होती जा रही है, जबकि भारत सहित दुनिया में खाद्य मांग लगातार बढ़ रही है। दूसरी ओर, कृषि क्षेत्र ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन, भूजल दोहन और जैव विविधता के नुकसान का भी एक बड़ा कारण है। ऐसे में बढ़ती मांग अपने साथ पर्यावरण से जुड़ी कई समस्याएं भी पैदा कर रही हैं।
एक-दूसरे के विरोधी नहीं कृषि और पर्यावरण
हालांकि अध्ययन के मुताबिक कृषि और पर्यावरण को बचाने के लिए लक्ष्य एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। ऐसी कई कृषि पद्धतियां पहले से मौजूद हैं जो कम पानी और कम संसाधनों में बेहतर उत्पादन देने के साथ-साथ पर्यावरण को भी नुकसान नहीं पहुंचातीं।
यह तकनीकें ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने और जैव विविधता की रक्षा करने में भी मदद कर सकती हैं।
लेकिन समस्या यह है कि इन तकनीकों का लाभ अभी बड़े पैमाने पर किसानों तक नहीं पहुंच पाया है। शोधकर्ताओं के मुताबिक सबसे बड़ी चुनौती इन्हें बड़े स्तर पर अपनाने की है। कई तकनीकें महंगी हैं, किसानों तक समय पर नहीं पहुंच पातीं या हर क्षेत्र की परिस्थितियों में समान रूप से प्रभावी नहीं होतीं।
ऐसे में सैटेलाइट से प्राप्त आंकड़े यह पहचानने में मदद करेंगें कि किस क्षेत्र में कौन-सा उपाय सबसे अधिक सफल होगा। इससे सरकारें और कृषि एजेंसियां संसाधनों का अधिक प्रभावी उपयोग कर सकेंगी।
नीतियां होंगी ज्यादा सटीक
प्रोफेसर जैन के अनुसार उनका उद्देश्य फिलहाल सैटेलाइट डेटा को सीधे किसानों तक पहुंचाना नहीं, बल्कि ऐसे बड़े डेटा प्लेटफॉर्म तैयार करना है जिनकी मदद से सरकारें और नीति-निर्माता यह तय कर सकें कि किस जिले या क्षेत्र में कौन-सी कृषि योजनाएं वास्तव में काम कर रही हैं। साथ ही किन इलाकों में निवेश से सबसे अधिक लाभ मिलेगा।
उनका मानना है कि इससे कृषि योजनाओं का बेहतर मूल्यांकन होगा, संसाधनों की बर्बादी कम होगी और जरूरतमंद किसानों तक सही समय पर सही सहायता पहुंच सकेगी।
हालांकि शोधकर्ताओं का मानना है कि सैटेलाइट से प्राप्त आंकड़े पूरी तरह त्रुटिरहित नहीं होते। कई बार वे सबसे अधिक या सबसे कम पैदावार वाले खेतों का सटीक अनुमान नहीं लगा पाते। इसलिए इन आंकड़ों का उपयोग वैज्ञानिक समझ और स्थानीय परिस्थितियों के साथ मिलाकर करना जरूरी होगा।
एक बेहतर कल की ओर कदम
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में सैटेलाइट आधारित निगरानी कृषि संबंधी नीतियों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है।
उन्हें उम्मीद है कि यदि इस तकनीक को कृषि योजनाओं, फसल प्रबंधन और जल संरक्षण से जोड़ा जाए, तो भारत न केवल बदलती जलवायु के बीच अपनी खाद्य सुरक्षा को मजबूत कर सकता है, बल्कि करोड़ों छोटे किसानों की आय बढ़ाने, भूजल बचाने और खेती को अधिक पर्यावरण अनुकूल बनाने की दिशा में भी आगे बढ़ सकता है।