रिपोर्ट ने चेताया है कि अगर दुनिया में चल रहे मौजूदा संकट, युद्ध और बाजारों की उथल-पुथल इसी तरह जारी रही, तो इस बात की करीब 25 फीसदी आशंका है कि 2035 तक किसानों की आमदनी बढ़ने के बजाय आज के स्तर से भी नीचे गिर जाएगी। यानी मेहनत दोगुनी होगी, लेकिन जेब और खाली हो जाएगी। फोटो: सेंटर फॉर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट  
कृषि

किसानों की कमाई में 9 फीसदी की बढ़ोतरी की उम्मीद, लेकिन महंगी खाद-ऊर्जा और युद्ध बिगाड़ सकते हैं पूरा गणित

तरक्की की राह में युद्ध और मंदी के रोड़े: क्या दोगुनी मेहनत के बाद भी खाली रह जाएगी किसान की जेब?

Lalit Maurya

  • यह रिपोर्ट दुनिया की खेती के सामने खड़ी दोहरी तस्वीर को उजागर करती है—एक तरफ उत्पादकता, तकनीक और बढ़ते उत्पादन के सहारे किसानों की आय में अगले दशक में औसतन 9 फीसदी बढ़ोतरी की उम्मीद है, तो दूसरी तरफ युद्ध, ऊर्जा संकट, महंगी खाद और बाजार की अनिश्चितता इस पूरी उम्मीद पर पानी फेर सकते हैं।

  • एफएओ-ओईसीडी की ‘एग्रीकल्चर आउटलुक 2026-2035’ बताती है कि अगर मौजूदा वैश्विक उथल-पुथल बनी रही, तो 2035 तक किसानों की आय बढ़ने के बजाय आज के स्तर से भी नीचे जा सकती है।

  • ऊर्जा कीमतों में उछाल का असर खाद की लागत और फिर फसल उत्पादन पर पड़ेगा, जिससे अनाज उत्पादन घट सकता है और गरीब देशों में भूख व कुपोषण का संकट और गहरा सकता है।

  • रिपोर्ट यह भी बताती है कि 2035 तक वैश्विक अनाज उत्पादन 322 करोड़ टन तक पहुंच सकता है और कृषि-मत्स्य उत्पादन में 13 फीसदी वृद्धि संभव है, जिसमें एशिया-प्रशांत, उप-सहारा अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका अहम भूमिका निभाएंगे।

  • भारत इस बदलाव का बड़ा इंजन बन सकता है और अकेले अतिरिक्त वैश्विक कृषि उत्पादन में 26 फीसदी योगदान दे सकता है।

  • लेकिन यह प्रगति भी बिना कीमत नहीं आएगी—कृषि से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन बढ़ेगा, छोटे किसानों पर लागत और कीमतों का दबाव बढ़ेगा और खाद्य सुरक्षा का सवाल और जटिल होगा। साफ है, भविष्य की खेती का असली सवाल सिर्फ उत्पादन बढ़ाने का नहीं, बल्कि किसान को आर्थिक, ऊर्जा और बाजार के झटकों से बचाने का है।

हमारा पेट भरने के लिए दिन-रात मिट्टी से सोना उगाने वाले किसान के लिए आने वाला दशक एक अजीब कशमकश लेकर आ रहा है। एक तरफ जहां उसकी मेहनत और आधुनिक तकनीकों के दम पर खुशहाली की नई उम्मीदें अंगड़ाई ले रही हैं, वहीं दूसरी तरफ दुनिया के सियासी तनाव, युद्ध और अनिश्चितताओं के काले बादल उसकी इस तरक्की को लील जाने के लिए तैयार खड़े हैं।

संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) और आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) ने अपनी ताजा रिपोर्ट 'एग्रीकल्चर आउटलुक 2026-2035' में इसी कड़वे-मीठे सच का एक ऐसा आईना सामने रखा है, जो सीधे हमारी थाली और किसान की फटी जेब से जुड़ा है।

खुशहाली की उम्मीद, लेकिन अनिश्चितता का साया

रिपोर्ट एक सुखद तस्वीर के साथ शुरू होती है जिसके मुताबिक आने वाले दशक में दुनिया भर के किसानों और कृषि श्रमिकों की औसत आमदनी में नौ फीसदी की बढ़ोतरी देखी जाएगी। यह विकास जमीन बढ़ने से नहीं, बल्कि किसानों के पसीने और उत्पादकता में सुधार की वजह से होगा। लेकिन इसी पन्ने को पलटते ही एक डरा देने वाली सच्चाई भी सामने आती है।

रिपोर्ट चेतावनी देती है कि अगर दुनिया में चल रहे मौजूदा संकट, युद्ध और बाजारों की उथल-पुथल इसी तरह जारी रही, तो इस बात की करीब 25 फीसदी आशंका है कि 2035 तक किसानों की आमदनी बढ़ने के बजाय आज के स्तर से भी नीचे गिर जाएगी। यानी मेहनत दोगुनी होगी, लेकिन जेब और खाली हो जाएगी।

तरक्की की राह में अनिश्चितताओं के रोड़े

रिपोर्ट में चिंता जताई गई है कि युद्ध, ऊर्जा संकट, महंगे उर्वरक और बाजार की अनिश्चितता इस बढ़त को कभी भी पटरी से उतार सकती है। खासकर बिजली, डीजल और खाद की आसमान छूती कीमतें इस संकट को और गहरा कर रही हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2026 में ऊर्जा की कीमतों में जो भारी उछाल आया है, उसका सीधा असर 2027 में हमारी फसलों पर दिखेगा। नतीजन पूरी दुनिया में अनाज उत्पादन में बड़ी गिरावट आ सकती है।

रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 की पहली छमाही में ऊर्जा कीमतों में औसतन 33 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई। अगर यह बढ़ोतरी आगे भी बनी रहती है, तो 2027 में वैश्विक अनाज उत्पादन 0.9 फीसदी तक घट सकता है। वहीं कमजोर देशों में यह गिरावट और गंभीर होकर 1.7 फीसदी तक पहुंच सकती है।

ऊर्जा महंगी होने का सीधा असर उर्वरकों पर पड़ता है। जब खाद महंगी होती है, तो किसान उसका इस्तेमाल कम करते हैं। इसका नतीजा उत्पादन में गिरावट, किसानों की कम आय और बाजार में महंगे खाद्य पदार्थों के रूप में सामने आता है।

इस संकट की सबसे चिंताजनक बात यह है कि अमीर देश तो महंगी कीमतों का झटका बर्दाश्त कर लेंगे, लेकिन कमजोर और विकासशील देशों के करोड़ों परिवारों के सामने भुखमरी का संकट खड़ा हो जाएगा। लोग मजबूरन पौष्टिक खाना छोड़कर सिर्फ पेट भरने के लिए सस्ता और घटिया भोजन चुनने को मजबूर हो जाएंगे।

रिपोर्ट में इस तथ्य पर भी प्रकाश डाला है कि यदि हालात स्थिर रहे तो अगले 10 वर्षों में वैश्विक कृषि और मत्स्य उत्पादन में 13 फीसदी की वृद्धि हो सकती है। इस बढ़त का बड़ा हिस्सा उत्पादकता में सुधार और उत्पादन को अधिक गहन बनाने से आएगा। एशिया, उप-सहारा अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका इस वृद्धि के प्रमुख केंद्र होंगे।

रिकॉर्ड 322 करोड़ टन तक पहुंच सकता है अनाज उत्पादन

रिपोर्ट में सामने आया है कि 2035 तक दुनिया का अनाज उत्पादन बढ़कर रिकॉर्ड 322 करोड़ टन तक पहुंच सकता है। यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से प्रति हेक्टेयर पैदावार में सालाना 0.9 फीसदी सुधार से होगी, जबकि अनाज की खेती के क्षेत्र में विस्तार बहुत सीमित, सिर्फ 0.1 फीसदी सालाना रहने का अनुमान है।

इसी तरह 2035 तक उत्पादित कुल अनाज का करीब 40 फीसदी हिस्सा सीधे इंसानी भोजन के रूप में इस्तेमाल होगा, जबकि 34 फीसदी पशुओं के चारे में जाएगा। गेहूं और चावल का उपयोग मुख्य रूप से भोजन के लिए जारी रहेगा, जबकि मक्का का सबसे बड़ा उपयोग चारे के रूप में होगा।

फिर भी, उत्पादन बढ़ाने की यह कहानी पूरी तरह बेदाग नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार, खेती और पशुपालन के विस्तार के साथ अगले दशक में कृषि क्षेत्र से सीधे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 6.5 फीसदी की बढ़ोतरी हो सकती है। इसमें करीब 77 फीसदी हिस्सा पशुधन से और 23 फीसदी हिस्सा रासायनिक उर्वरकों के बढ़ते इस्तेमाल से पैदा होने वाले नाइट्रस ऑक्साइड उत्सर्जन का होगा।

हालांकि, अच्छी खबर यह है कि कृषि उत्पादन में वृद्धि की रफ्तार उत्सर्जन की तुलना में तेज रहने का अनुमान है। यानी यदि सही नीतियां अपनाई जाएं, तो कम संसाधनों में ज्यादा उत्पादन की दिशा में प्रगति संभव है।

छोटे किसानों के लिए बढ़ सकती हैं चुनौतियां

रिपोर्ट चेतावनी देती है कि उत्पादकता बढ़ने से कृषि जिंसों की वास्तविक कीमतों पर दबाव पड़ सकता है। उपभोक्ताओं के लिए यह राहत की खबर हो सकती है, लेकिन छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह नई मुश्किलें खड़ी कर सकती है। भारत सहित दुनिया भर में छोटे किसान पहले ही मौसम, कीमतों और लागत के उतार-चढ़ाव से जूझ रहे हैं।

उनके पास नई तकनीक अपनाने, सिंचाई सुधारने, बेहतर बीज खरीदने या बाजार तक सीधी पहुंच बनाने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं होते। ऐसे में अगर कीमतों पर दबाव के साथ लागत बढ़ती है, तो उनकी कमाई और ज्यादा अस्थिर हो सकती है।

इसी वजह से रिपोर्ट सरकारों को सलाह देती है कि वे केवल उत्पादन बढ़ाने पर नहीं, बल्कि किसानों की बाजार तक पहुंच, स्थानीय जरूरतों के अनुरूप सहायता योजनाओं और झटकों से बचाव की व्यवस्था पर भी ध्यान दें।

क्या कहतें हैं आंकड़ें

रिपोर्ट में इस पहलु को भी उजागर किया है निम्न और मध्यम आय वाले देशों में लोगों के भोजन में विविधता बढ़ेगी और जैसे-जैसे आय बढ़ेगी, पशु-आधारित खाद्य पदार्थों की खपत भी बढ़ सकती है। लेकिन उप-सहारा अफ्रीका के कई कमजोर देशों में खाद्य सुरक्षा और पोषण की स्थिति अब भी दुनिया के अन्य हिस्सों से पीछे रहने की आशंका है।

अमीर देशों में जरूरत से ज्यादा भोजन का चलन जारी रहने की संभावना है। दूसरी तरफ 2035 तक दुनिया में खाद्य खपत में होने वाली कुल बढ़ोतरी का 39 फीसदी हिस्सा अकेले दक्षिण-पूर्व एशिया से आ सकता है। इसकी बड़ी वजह वहां बढ़ती आबादी और हर व्यक्ति की खाद्य मांग में इजाफा होना है।

इसी तरह जैव ईंधन की वैश्विक मांग अगले दशक में औसतन 1.4 फीसदी सालाना बढ़ सकती है। इस बढ़त में ब्राजील, भारत और इंडोनेशिया की बड़ी भूमिका होगी, जबकि उच्च आय वाले देशों में नीतिगत प्रोत्साहन कमजोर पड़ने और इलेक्ट्रिक वाहनों के बढ़ने से इसकी रफ्तार धीमी हो सकती है।

उप-सहारा अफ्रीका की हिस्सेदारी वैश्विक कृषि उत्पादन में बढ़ेगी और 2035 तक वैश्विक कृषि उत्पादन में होने वाली अतिरिक्त वृद्धि में उसका योगदान मूल्य के आधार पर करीब 16 फीसदी हो सकता है, जो पिछले दशक में 11 फीसदी था। इसके बावजूद यह क्षेत्र खाद्य असुरक्षा और बाहरी झटकों के प्रति बेहद संवेदनशील बना रहेगा।

भारत बन सकता है कृषि उत्पादन का 'इंजन'

इस पूरे वैश्विक परिदृश्य में हमारा भारत एक चमकते हुए सितारे की तरह उभर रहा है। रिपोर्ट से पता चला है कि 2035 तक दुनिया में होने वाले अतिरिक्त कृषि उत्पादन का 58 फीसदी हिस्सा एशिया-प्रशांत क्षेत्र से आ सकता है।

इसमें अकेले भारत की हिस्सेदारी 26 फीसदी रहने का अनुमान है। भारत की यह बढ़त खासतौर पर डेयरी क्षेत्र की मजबूती, दुधारू पशुओं की बढ़ती संख्या और दूध उत्पादन में सुधार के दम पर होगी।

हालांकि, इस तरक्की की प्रकृति को एक बड़ी कीमत भी चुकानी होगी। जब दुनिया का पेट भरने के लिए अनाज और मवेशियों की संख्या बढ़ेगी, तो पर्यावरण में जहरीली गैसों का उत्सर्जन भी साढ़े छह फीसदी तक बढ़ जाएगा, जिसमें एक बड़ा हिस्सा रासायनिक खादों के अंधाधुंध इस्तेमाल से होने वाला नुकसान है।

उच्च आय वाले देशों में मांस की खपत की रफ्तार धीमी पड़ सकती है। महंगाई, स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं और पर्यावरणीय दबावों के कारण लोग का झुकाव पोल्ट्री की ओर ज्यादा हो सकता है। मत्स्य और जलीय कृषि क्षेत्र में भी वृद्धि की उम्मीद है।

2035 तक वैश्विक मत्स्य और जलीय कृषि उत्पादन 11 फीसदी बढ़ सकता है। इस बढ़त का मुख्य आधार एक्वाकल्चर होगा, जिसकी हिस्सेदारी कुल उत्पादन में 53 फीसदी से बढ़कर 56 फीसदी तक पहुंच सकती है। एशिया इस क्षेत्र में मांग और आपूर्ति, दोनों का प्रमुख केंद्र बना रहेगा, हालांकि चीन में वृद्धि की रफ्तार कुछ धीमी पड़ सकती है।

किसान की मजबूती ही खाद्य सुरक्षा की असली गारंटी

यह रिपोर्ट सिर्फ आंकड़ों का दस्तावेज नहीं है। यह उस सच्चाई की ओर इशारा करती है कि कृषि पर मंडराता संकट केवल खेतों तक सीमित नहीं रहता, यह सीधे परिवार की थाली, बच्चों के पोषण, किसानों की आय और गांवों की स्थिरता से जुड़ा होता है। हमारे किसान आज बढ़ती लागत के खिलाफ अग्रिम मोर्चे पर जंग लड़ रहे हैं। उनकी मजबूती ही हमारी खाद्य सुरक्षा का आधार है।

ऐसे में सरकारों को अब सिर्फ कागजी योजनाएं बनाने से ऊपर उठना होगा। अगर हमें भविष्य की भुखमरी से बचना है, तो आज ही किसानों के लिए खाद-बीज के स्थानीय भंडार बनाने होंगे, उन्हें सौर ऊर्जा जैसे सुरक्षित विकल्पों से जोड़ना होगा और एक ऐसा पारदर्शी बाजार देना होगा जहां उनके पसीने की सही कीमत मिल सके।

क्योंकि जब तक खेत में खड़ा किसान खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करेगा, तब तक हमारी थाली का निवाला सुरक्षित नहीं हो सकता।