ईशा बनर्जी -कमिश्निंग एडिटर, हार्पर कॉलिंस

हवा की बढ़ती कीमत: जीवन के अधिकार पर सवाल

एयर प्यूरीफायर खरीदना अब विलासिता नहीं रहा बल्कि एक जरूरत बन गया है
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पिछले कुछ सालों में कहीं न कहीं, एयर प्यूरीफायर खरीदना अब विलासिता की वस्तु नहीं रहा बल्कि यह एक जरूरी देखभाल करने वाला यंत्र बन गया है। अब हम कभी जिज्ञासा से और ज्यादातर बेचैनी में एयर क्वालिटी इंडेक्स चेक करते हैं। यह ठीक वैसा है जैसे कभी हमारे माता-पिता मौसम का अंदाजा लेते रहे होंगे। यह पता चलते ही “आज हवा खराब है” मैं अपनी बहन को संदेश भेज कर उसे सतर्क करते हुए कहती हूं कि “कैब ले लेना, ऑटो मत पकड़ो नहीं तो परेशान हो जाओगी।” हम साथ बैठकर साफ हवा की बढ़ती कीमत पर और जिंदगी की खुद बढ़ती कीमत पर शोक जताते हैं।

पिछली सर्दियों में काम के बाद खांसी के दौरे मुझे उल्टी तक करवा देते थे। बस एक महीना पहले ही, थिएटर फेस्टिवल जाने वाली कैब की सवारी ऐसा लगी जैसे धुएं वाली चिमनी में सांस ले रही हूं। एक कार में चुपचाप और मास्क पहने हुए ऐसा लगता था कि हम सभी दिल्ली के भविष्य को लेकर एक ही डर साझा कर रहे हों। मैं चुपचाप उल्टी कर रही थी, दिल तेजी से धड़क रहा था और खुद को सोशल मीडिया में डुबोकर भटका रही थी, जहां लोग शहर छोड़ने की बातें कर रहे थे।

जैसा मालूम था कि हवा का बिगड़ना तय है, उससे कुछ महीने पहले ही मैंने दूसरा एयर प्यूरीफायर खरीद लिया, इसके बाद फिर एक और खरीद लिया यानी कुल मिलाकर हर कमरे के लिए अब हमारे पास एक एयर प्यूरीफायर। खुद से कहा, यह जरूरी है। जहां मैं काम करती हूं, वहां जीने की कीमत यही है। लेकिन धीरे-धीरे यह एहसास होने लगा कि कहीं न कहीं, कोई न कोई गुनाहगार और नाकाम है। मैं इसे वहन कर सकती हूं लेकिन कई नहीं कर सकते। हमारे घरेलू काम करने वाली मेड घर में बहुत अधिक मात्रा में छींकते हुए आई। हमने उससे कहा ठीक से पहले आराम कर लो। लेकिन पता चला कि कुछ ही समय बाद वह बीमार पड़ गई। इस पर मैं फिर सोचने क लिए बैठ गई। सोचते हुए घड़ी की सुई की तरह, दिल की धड़कनें भी तेज होने लगीं।

असफल सरकारों की लगातार आती-जाती कड़ी ने असफलता की भाषा को अनिवार्यता में बदल दिया है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में अधिकारों की बातें हमेशा होती रहती हैं। फिर भी, संविधान में दर्ज सबसे मूलभूत अधिकार जीवन का अधिकार यहां हर रोज चुपचाप दम तोड़ता है।

ऐसे शहर में इस अधिकार की मांग करना व्यर्थ सा लगता है, जहां चुने हुए नेता अपने लिए प्यूरीफायर खरीदते हैं और टीवी पर कहते हैं कि हवा साफ है । यहां जहरीली हवा के विरोध में नागरिकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाती हैं।

यह रटने के अलावा मैं क्या कर सकती हूं? क्या यही हर सेंटरिस्ट नहीं पूछता कि शिकायत बंद करो और समाधान ढूंढो? वह कहते हैं, किसान बड़े पैमाने पर पराली जलाते हैं या यह सब भौगोलिक स्थिति के कारण ऐसा हो रहा है या सर्दियों के कारण ऐसा हो रहा है। इस पर अब तक कोई बात नहीं होती कि सरकार अपने काम में पिछले कई सालों से नाकाम होते आ रही है।

मैं बार-बार इसी चक्कर में फंसती हूं। शायद प्यूरीफायर उद्योग में फायदा कमा रहे अरबपति अपनी अनंत टैक्स कटौती के साथ, कोई रास्ता निकाल लेंगे। अगर साफ पानी को विलासिता के रूप में बेचा जा सकता है तो शायद यह तय था कि हवा भी उसी राह पर जाएगी। एक भयावह रूप से जलती हुई देश की व्यवस्था हमें यह सिखाती है कि जो वहन कर सकता है, उसे बचना है और जो नहीं कर सकता, उसे सहना है। यह स्थिति बहुत ही असामान्य है। मेरा प्यूरीफायर धीरे-धीरे गुनगुनाता रहता है। यह लाल चमकता है, फिर नारंगी हो जाता है और फिर हर रंग दिखाने लगता है जो इसके बस की बात है। बाहर की हवा और गहरी होती जा रही है। फिलहाल मैं अभी के लिए सांस लेती हूं।

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