

महाराष्ट्र में इलेक्ट्रिक वाहनों, खासकर दोपहिया और चारपहिया गाड़ियों की संख्या में भारी उछाल देखा जा रहा है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, 2026 में 2,71,705 इलेक्ट्रिक दोपहिया और 37,556 इलेक्ट्रिक कारों का रजिस्ट्रेशन हो चुका है। राज्य ने नई इलेक्ट्रिक वाहन नीति 2025 लागू की है, जिसका मकसद गाड़ियों से होने वाले पीएम 2.5 प्रदूषण को रोकना है। इसके तहत 2030 तक राज्य के परिवहन क्षेत्र से 325 टन पीएम 2.5 उत्सर्जन और लगभग 10 लाख टन ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने की योजना है।
1 अप्रैल 2025 से 31 मार्च 2030 तक के लिए लागू की गई यह पॉलिसी महाराष्ट्र को देश में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी का प्रमुख केंद्र बनाने के उद्देश्य से तैयार की गई है। इसका मकसद बड़े पैमाने पर ई-वाहनों को बढ़ावा देना और स्थानीय स्तर पर विनिर्माण को मजबूत करना है, ताकि पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास के बीच संतुलन साधा जा सके। इस पॉलिसी का मुख्य उद्देश्य एक टिकाऊ और आधुनिक परिवहन व्यवस्था विकसित करना है, जो ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करे और वायु प्रदूषण घटाए। इसके साथ ही विशेष प्रोत्साहन योजनाओं के जरिए सभी तरह के वाहनों में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को तेजी से अपनाना इसका प्रमुख लक्ष्य है।
इस पॉलिसी के दौरान पंजीकृत होने वाले सभी ई-वाहनों को मोटर वाहन कर और रजिस्ट्रेशन फीस में 100 प्रतिशत की पूरी छूट दी जाएगी। पॉलिसी के मुताबिक, राज्य में होने वाले कुल नए वाहन पंजीकरण में 30 प्रतिशत हिस्सेदारी ई-वाहनों की होनी चाहिए। इसमें 40 प्रतिशत दोपहिया और 40 प्रतिशत तिपहिया जैसे बड़े लक्ष्य भी रखे गए हैं, ताकि इन वाहनों को तेजी से इलेक्ट्रिक में बदला जा सके।
सार्वजनिक परिवहन के लिए भी इसी तरह के लक्ष्य तय किए गए हैं, जिसके तहत प्रमुख शहरों जैसे मुंबई, पुणे, नागपुर, नासिक, छत्रपति संभाजीनगर और अमरावती की सार्वजनिक बसों के बेड़े को इलेक्ट्रिक बनाने की योजना है।
ई-मोबिलिटी को बढ़ावा देने के लिए राजमार्गों पर हर 25 किमी पर चार्जिंग की सुविधा उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है। साथ ही इस पहल के तहत यशवंतराव चव्हाण मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे, हिंदू हृदयसम्राट बालासाहेब ठाकरे महाराष्ट्र समृद्धि महामार्ग और अटल बिहारी वाजपेयी सेवरी-न्हावा शेवा अटल सेतु पर यात्री वाहनों को टोल टैक्स में 100 प्रतिशत की छूट दी गई है। राज्य सरकार के परिवहन विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि ई-वाहनों को बढ़ावा देने के लिए इस तरह की अनोखी पहल करने वाला महाराष्ट्र देश का इकलौता राज्य है।
पॉलिसी के तहत राज्य और राष्ट्रीय राजमार्गों पर स्थित सभी पेट्रोल पंपों पर कम से कम एक फास्ट चार्जिंग स्टेशन होना अनिवार्य किया गया है। इसके साथ ही पूरे राज्य में राज्य परिवहन के सभी बस अड्डों और बस स्टॉप परिसरों में भी कम से कम एक फास्ट चार्जिंग स्टेशन लगाया जाएगा। हालांकि, ये योजनाएं तकनीकी तौर पर व्यवहारिक होने पर ही लागू की जा सकेंगी।
पॉलिसी में इस बात का उल्लेख भी है कि 2019 में भारत सरकार के आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय ने बिल्डिंग कोड और टाउन प्लानिंग से जुड़े नियमों में संशोधन जारी किए थे, ताकि निजी और व्यावसायिक इमारतों में ई-वाहन चार्जिंग स्टेशन स्थापित किए जा सकें। इन संशोधनों के अनुसार, सभी नई रिहायशी इमारतों में 100 प्रतिशत पार्किंग स्पेस को ईवी चार्जिंग के लिए तैयार करना अनिवार्य है। साथ ही इन इमारतों में पूरी सोसायटी के लिए कम से कम एक अलग ईवी चार्जिंग पॉइंट होना भी जरूरी है।
नई व्यावसायिक इमारतों में कुल पार्किंग क्षमता का 50 प्रतिशत हिस्सा ई-चार्जिंग के लिए होना अनिवार्य है, जबकि पहले से बनी व्यावसायिक इमारतों के लिए इस नियम में ढील देते हुए इसे 20 प्रतिशत रखा गया है। हालांकि, चार्जिंग के बुनियादी ढांचे के मामले में अभी भी चुनौतियां बरकरार हैं। महाराष्ट्र के पास देश का सबसे बड़ा सार्वजनिक ई-चार्जिंग नेटवर्क मौजूद है, लेकिन राज्य में तेजी से बढ़ते ई-वाहनों के मुकाबले इन स्टेशनों का वितरण सही नहीं है।
मंत्रालय के अनुसार, तेल विपणन कंपनियों ने पिछले 5 वर्षों के दौरान महाराष्ट्र में 2,243 सार्वजनिक ई-वाहन चार्जिंग स्टेशन स्थापित किए, जिनमें से 1 मार्च 2026 तक 1,786 स्टेशन चालू हालत में थे। साल 2020-21 में तेल कंपनियों ने महाराष्ट्र में केवल 9 सार्वजनिक चार्जिंग स्टेशन लगाए थे, जिसकी तुलना में 2026 तक इनकी संख्या कई गुना बढ़ चुकी है। इसमें सबसे बड़ी सालाना बढ़ोतरी वर्ष 2024-25 में देखने को मिली।
दिसंबर 2025 तक महाराष्ट्र में 4,166 सार्वजनिक ई-वाहन चार्जिंग स्टेशन थे, जिनमें 1,205 फास्ट चार्जर और 2,961 स्लो चार्जर शामिल थे। इस संख्या के साथ राज्यों की सूची में महाराष्ट्र दूसरे स्थान पर और 6,096 चार्जिंग स्टेशनों वाला कर्नाटक पहले स्थान पर रहा।
वहीं, 2024 में प्रकाशित एयर क्वालिटी स्टेटस ऑफ महाराष्ट्र 2022-23 की रिपोर्ट एक अलग ही तस्वीर पेश करती है। इस रिपोर्ट में वायु गुणवत्ता सूचकांक के 30,128 आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इनमें से केवल 3.28 प्रतिशत आंकड़े अच्छी और 12.97 प्रतिशत संतोषजनक श्रेणी में थे। इसके उलट 43.13 प्रतिशत आंकड़े मध्यम, 40.23 प्रतिशत खराब और 0.24 प्रतिशत बेहद खराब श्रेणी में दर्ज किए गए।
कुल मिलाकर देखें तो मॉनिटर किए गए सभी आंकड़ों में से 40.47 प्रतिशत स्थिति खराब या उससे भी बदतर थी, जबकि 43.13 प्रतिशत स्थिति मध्यम स्तर पर रही। हवा की यह खराब गुणवत्ता का प्रमुख कारण वाहनों का धुआं नहीं है। पीएम 10 के सबसे बड़े स्रोत निर्माण कार्य (26 प्रतिशत) और सड़कों पर फिर से उड़ने वाली धूल (19 प्रतिशत) हैं। कचरा-पराली जैसे बायोमास जलाने से 17 प्रतिशत, फैक्ट्रियों से 16 प्रतिशत, जीवाश्म ईंधन से 12 प्रतिशत और वाहनों से होने वाला उत्सर्जन 10 प्रतिशत दर्ज किया गया।
इसी तरह, पीएम 2.5 के मामले में 25 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ जीवाश्म ईंधन का दहन सबसे बड़ा स्रोत रहा। औद्योगिक स्रोतों का हिस्सा 22 प्रतिशत, बायोमास जलाने से 19 प्रतिशत और गाड़ियों से निकले धुएं की हिस्सेदारी 13 प्रतिशत रही।
महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने अपने एक्शन प्लान में फिलहाल 18 नॉन-अटेनमेंट शहरों को शामिल किया है। इनमें मुंबई, पुणे, नागपुर, नासिक, नवी मुंबई, ठाणे, औरंगाबाद, चंद्रपुर, कोल्हापुर, सोलापुर, सांगली, लातूर, जलगांव, जालना, अकोला, अमरावती, बदलापुर और उल्हासनगर शामिल हैं।
आईआईटी बॉम्बे ने 2022 में मुंबई की सड़कों पर स्थित 2 सुरंगों में पीएम 2.5 उत्सर्जन का विश्लेषण किया। इस अध्ययन में पाया गया कि ट्रैफिक से जुड़े पीएम 2.5 में 52 प्रतिशत हिस्सेदारी साइलेंसर से निकले धुएं की, 30 प्रतिशत ब्रेक घिसने और 18 प्रतिशत हिस्सेदारी वाहनों की आवाजाही से उड़ने वाली धूल की पाई गई। वहीं पीएम 10 के मामले में सड़क पर उड़ने वाली धूल की हिस्सेदारी 63 प्रतिशत दर्ज की गई, जबकि वाहनों के धुएं से 28 प्रतिशत और ब्रेक घिसने से 9 प्रतिशत उत्सर्जन पाया गया।