भारत का ई-सफर: असम में ई-वाहनों की रफ्तार का असली सच

असम में शहर से लेकर गांवों तक ड्राइवर तेजी से ई-रिक्शा अपना रहे हैं। इसे चलाने में रोजाना खर्च कम होना इसकी बड़ी वजह है। हालांकि, भारी ईएमआई और महंगी बैटरी की वजह से कर्ज का खतरा भी बना हुआ है
फोटो: आईस्टॉक
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तसीम अली गुवाहाटी में बजाज गोगो इलेक्ट्रिक ऑटो-रिक्शा चलाते हैं और उबर, ओला व रैपिडो के जरिए सवारियां ले जाते हैं। करीब एक साल पहले इलेक्ट्रिक वाहन अपनाने वाले अली अपनी खुद की गाड़ी के मालिक बनकर खुश हैं। वह कहते हैं कि डीजल वाली टाटा मैजिक की तुलना में इसे चलाना काफी आसान है, जिसे वे पहले किसी और के यहां नौकरी करते हुए चलाते थे।
उन्होंने डाउन टू अर्थ को बताया, “ई-ऑटो-रिक्शा की सबसे बड़ी खासियत इसकी कम लागत है। एक बार फुल चार्ज करने पर मैं आसानी से इसे 100 किमी तक चला सकता हूं और दोपहर तक काम कर सकता हूं। यह घर पर ही चार्ज हो जाती है और पेट्रोल-डीजल की तुलना में खर्च भी बहुत कम आता है।” लेकिन अली जैसे चालकों के लिए हर महीने की किश्त एक बड़ा बोझ बनी हुई है, क्योंकि वे लगभग 4 लाख रुपए की कीमत वाले इस इलेक्ट्रिक तिपहिया के लिए बड़ा डाउन पेमेंट नहीं दे सकते।

अकेले अली ही ऐसे नहीं हैं। आर्थिक जोखिमों के बावजूद पूरे असम में बड़ी संख्या में ड्राइवर इलेक्ट्रिक ऑटो-रिक्शा अपना रहे हैं। यह बदलाव सिर्फ शहरों तक सीमित नहीं है। ग्रामीण इलाकों में पहले से ही ई-रिक्शा की भरमार है, जिन्हें स्थानीय तौर पर टमटम या पिलपिली कहा जाता है। वहीं बजाज, टीवीएस और महिंद्रा जैसी कंपनियों के इलेक्ट्रिक ऑटो भी अब अपनी जगह तेजी से बना रहे हैं।

इस बदलाव की वजह से पिछले वित्तीय वर्ष में असम ई-वाहनों के रजिस्ट्रेशन में देश में दूसरे स्थान पर पहुंच गया। असम में कुल रजिस्टर्ड ई-वाहनों में आधी से ज्यादा हिस्सेदारी अकेले ई-रिक्शा की है। अली जैसे ड्राइवरों के लिए ई-वाहन अपनाने की वजह बहुत साफ है। कर्ज और महंगी बैटरी के बावजूद ई-वाहन पेट्रोल या डीजल गाड़ियों की तुलना में ज्यादा कमाई का मौका देते हैं।

ड्राइवर क्यों अपना रहे ई-वाहन
गुवाहाटी से लगभग 20-25 किमी दूर नाहीरा गांव के विपुल दास पिछले एक दशक से भी ज्यादा समय से अपने परिवार के गुजारे के लिए ई-रिक्शा पर ही निर्भर हैं। उनका अनुभव असम में इलेक्ट्रिक गाड़ियों से बदलते आर्थिक हालात को साफ तौर पर दिखाता है। दास कहते हैं, “मैंने 10 साल पहले टमटम चलाना शुरू किया था। इसने मुझे पैडल वाले रिक्शे की हाड़-तोड़ मेहनत से आजादी दिलाई। तब इसकी कीमत 1.5 लाख रुपए से ज्यादा थी। तबसे मैं एक बार अपना ई-रिक्शा बदल भी चुका हूं और आज भी ईएमआई भर रहा हूं।”

उनका कहना है कि जब सड़कों पर ई-रिक्शे कम थे, तब कमाई ज्यादा थी। लेकिन जैसे-जैसे इनकी संख्या बढ़ी है, प्रतिस्पर्धा भी बढ़ गई है। वह बताते हैं, “पहले कम गाड़ियां होने की वजह से मुझे ज्यादा मुनाफा होता था। अब ई-रिक्शा बहुत बढ़ गए हैं, इसलिए पहले जैसी कमाई करना मुश्किल होता जा रहा है।” उनके मुताबिक सबसे बड़ा आर्थिक जोखिम अभी भी बैटरी ही है। कुछ ई-रिक्शों में बैटरी सिस्टम बदलने का खर्च लगभग 32,000 रुपए आता है, जबकि नए सिंगल-बैटरी सिस्टम को बदलवाने में करीब 90,000 रुपए तक का खर्च बैठता है।

ई-रिक्शा और ई-ऑटो की संख्या बढ़ने के बावजूद भारी लागत और नुकसान के डर को लेकर ड्राइवरों में चिंता बनी हुई है। एक दशक से भी ज्यादा समय से पेट्रोल ऑटो चला रहे अरबिंद बैश्य अभी इलेक्ट्रिक गाड़ी अपनाने के लिए तैयार नहीं हैं। वह कहते हैं, “नया ई-ऑटो खरीदने में 5 से 6 लाख रुपए का खर्च आएगा। मैं बड़ा डाउन पेमेंट नहीं दे सकता, इसलिए मेरी महीने की किश्तें काफी बढ़ जाएंगी। पेट्रोल वाले ऑटो की मरम्मत बहुत आसानी से हो जाती है। लेकिन ई-ऑटो में बैटरी सिस्टम ही गाड़ी की जान होती है और मुझे नहीं लगता कि इसकी मरम्मत आसान होगी। इसलिए इसमें जोखिम है, ऊपर से चार-पांच साल तक लगातार किश्तें भी भरनी पड़ेंगी।”

असम की ई-वाहन पॉलिसी कितनी मददगार?
असम ने 2021 में ई-वाहन पॉलिसी शुरू की थी, जिसके तहत सितंबर 2026 तक कई बड़े लक्ष्य हासिल करने थे। इनमें 2026 तक राज्य में रजिस्टर्ड होने वाली गाड़ियों में ई-वाहनों की हिस्सेदारी 25 प्रतिशत तक पहुंचाना और 2030 तक सभी सार्वजनिक बसों को इलेक्ट्रिक में बदलना शामिल था। पॉलिसी में ई-वाहनों को बढ़ावा देने के लिए कई तरह की छूट का प्रस्ताव रखा गया था। इसमें दोपहिया, तिपहिया और चार-पहिया वाहनों के लिए पांच साल तक रोड टैक्स और रजिस्ट्रेशन फीस माफ करने या उसे वापस लौटाने की बात कही गई थी।

इसके अलावा, इलेक्ट्रिक दोपहिया पर 20,000 रुपए, तिपहिया पर 50,000 और चार-पहिया वाहनों पर 1.5 लाख रुपए तक की सब्सिडी देने का प्रावधान था। लेकिन ई-वाहन मालिकों से हुई बातचीत से पता चलता है कि इस पॉलिसी को लागू करने का काम बहुत ढीला रहा है। ई-ऑटो चालकों ने डाउन टू अर्थ को बताया कि उन्हें कोई सब्सिडी नहीं मिली। जब उनसे टैक्स छूट के बारे में पूछा गया, तो उन्हें यह भी साफ-साफ नहीं पता था कि उन्हें कितनी छूट मिली है। इससे पता चलता है कि अधिकतर ड्राइवर या तो इन सरकारी सुविधाओं से अनजान हैं या फिर उन तक पहुंच नहीं पा रहे हैं। अधिकतर ड्राइवरों के लिए ई-वाहन अपनाने की मुख्य वजह सरकार की पॉलिसी नहीं, बल्कि रोजाना की कम लागत से होने वाली सीधी बचत रही है।

स्थानीय साप्ताहिक अखबार जी-प्लस में नवंबर 2025 में छपी एक रिपोर्ट में पॉलिसी के तहत दिए जाने वाले प्रोत्साहनों में गड़बड़ियों को उजागर किया गया था। इस रिपोर्ट में परिवहन विभाग के उस दावे का भी जिक्र था, जिसमें कहा गया था कि रजिस्ट्रेशन फीस पूरी तरह माफ कर दी गई है और रोड टैक्स घटा दिया गया है। डाउन टू अर्थ ने इन सरकारी सुविधाओं को लागू किए जाने के ब्योरे के लिए जिला परिवहन कार्यालय से संपर्क किया, लेकिन यह खबर छपने तक वहां से कोई जवाब नहीं मिला।

पॉलिसी की खामियां और सरकारी बसें
सम्यक जैन पूर्वोत्तर में काम करने वाली ई-वाहन चार्जिंग कंपनी ए प्लस चार्ज के संस्थापक हैं। उनका कहना है कि इस पॉलिसी को सही तरीके से लागू नहीं किया गया। वह कहते हैं, “जब 2021 में यह पॉलिसी बनाई गई थी, तब लोगों को आकर्षित करने के लिए छूट और आर्थिक मदद ही इसका मुख्य आकर्षण थी। लेकिन सब्सिडी देने का काम पूरी तरह नाकाम रहा है। यहां तक कि रोड टैक्स और रजिस्ट्रेशन फीस माफ करने का दावा भी सवालों के घेरे में है।”

जैन ने बताया कि वे ऐसे लोगों को जानते हैं जो गाड़ियां तो असम में खरीद रहे हैं, लेकिन बेहतर छूट पाने के लिए रजिस्ट्रेशन पड़ोसी राज्य मेघालय में करा रहे हैं। उन्होंने कहा, “हाल ही में इलेक्ट्रिक मर्सिडीज-बेंज कार खरीदने वाले मेरे एक दोस्त ने भी यही किया और सब्सिडी से कुछ लाख रुपए बचा लिए।” उन्होंने आगे बताया कि राज्य में दोपहिया और तिपहिया ई-वाहनों की तेजी से बढ़ती संख्या की मुख्य वजह इनको चलाने में आने वाली कम लागत है। इलेक्ट्रिक वाहन अपनाने से ऑटो चालक रोजाना कम से कम 500 रुपए यानी महीने में लगभग 15,000 रुपए तक बचा सकते हैं।

पूर्वका फाउंडेशन से जुड़े ट्रांसपोर्ट प्लानर ऋतुराज शर्मा का भी यही कहना है कि सब्सिडी का फायदा कई जरूरतमंद लोगों तक नहीं पहुंच पाया। हालांकि, सार्वजनिक परिवहन के मामले में सरकार की कोशिशें जमीन पर साफ दिखाई दे रही हैं। गुवाहाटी जैसे भीड़भाड़ वाले शहर में अब 300 से ज्यादा इलेक्ट्रिक एसी बसें चल रही हैं, जिससे लोगों का रोज का सफर आसान हुआ है। इस बस सेवा को अब कुछ लंबे रूटों पर भी शुरू कर दिया गया है।

भारी लागत और रेंज एंग्जाइटी
जैन का कहना है कि पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों की वजह से अब बहुत से लोग ई-वाहनों के बारे में सोच रहे हैं, लेकिन सरकार ने खरीदारों को आर्थिक रूप से सुरक्षित महसूस कराने के लिए पर्याप्त काम नहीं किया है। वह कहते हैं, “लोग ई-वाहन अपनाने के लिए तैयार हैं। कमी बस इस बात की है कि स्पष्ट लक्ष्यों वाली नीति होने के बावजूद वे इन्हें खरीदने और चलाने को लेकर आश्वस्त नहीं हो पा रहे हैं।”

पेट्रोल या डीजल गाड़ियों की तुलना में ई-वाहन अभी भी काफी महंगे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर लोगों को ई-वाहन की तरफ मोड़ना है, तो सरकारी छूट और बैंक लोन की व्यवस्था को सुधारना होगा। कारों के मामले में यह बात और भी अहम हो जाती है।
शर्मा के मुताबिक, ई-वाहनों की शुरुआती लागत ज्यादा होने की वजह से आज भी सड़कों पर पेट्रोल, डीजल और सीएनजी गाड़ियों का दबदबा बना हुआ है। वह कहते हैं, “बाजार में अभी भी कम कीमत वाली कोई इलेक्ट्रिक हैचबैक कार उपलब्ध नहीं है। बैंक भी ई-वाहनों के लिए लोन देने में सख्ती बरत रहे हैं।” उन्होंने आगे कहा कि लंबी दूरी के सफर के लिए जगह-जगह चार्जिंग स्टेशन न होने के कारण पूर्वोत्तर के लोगों में रेंज एंग्जाइटी यानी रास्ते में ही बैटरी खत्म होने का डर बना रहता है। वह कहते हैं, “बड़ा और सार्थक बदलाव लाने के लिए एक पूरा ई-मोबिलिटी इकोसिस्टम बनाना होगा। इसके लिए और बेहतर योजनाओं और उनके सही क्रियान्वयन की बेहद जरूरत है।”

चार्जिंग नेटवर्क की भारी कमी
असम के ई-वाहनों में तिपहिया गाड़ियों का सबसे बड़ा हिस्सा है, जो दोपहिया और कार दोनों से काफी ज्यादा है। इसकी मुख्य वजह इससे मिलने वाला आर्थिक फायदा ही है। ई-कारों से सफर के दौरान बैटरी खत्म होने का डर अब भी एक बड़ी समस्या है। असम में चार्जिंग का बुनियादी ढांचा काफी सीमित है, जिससे इलेक्ट्रिक कार मालिकों के लिए लंबी दूरी तय करना मुश्किल हो जाता है। जैन के मुताबिक, देश के कुल चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर में पूरे पूर्वोत्तर की हिस्सेदारी महज 1 प्रतिशत के आसपास है। वह बताते हैं, “इसके विपरीत भारत के पश्चिमी, उत्तरी, मध्य और दक्षिणी राज्यों में देश के कुल चार्जिंग नेटवर्क का 95 प्रतिशत हिस्सा मौजूद है।”

2021 में शुरू हुई स्टार्टअप कंपनी ए प्लस चार्ज ने अपना पहला ई-वाहन चार्जिंग स्टेशन काजीरंगा में स्थापित किया था। आज असम, मेघालय और त्रिपुरा में इसके 63 से 64 स्टेशन काम कर रहे हैं। यह कंपनी सिलीगुड़ी-तिनसुकिया राजमार्ग पर चार्जिंग कॉरिडोर बना रही है, जहां हर 60-70 किमी पर चार्जर लगाए जा रहे हैं। भविष्य में सरकारी चार्जिंग नेटवर्क से भी कुछ राहत मिलने की उम्मीद है। असम राज्य परिवहन निगम द्वारा लंबी दूरी की इलेक्ट्रिक बसों के लिए बनाए गए कुछ चार्जिंग स्टेशनों को आम लोगों के लिए भी खोला जा सकता है। जैन बताते हैं, “हमने सुना है कि काजीरंगा के पास जखलाबांधा में स्थित एएसटीसी चार्जिंग स्टेशन को जल्द ही आम लोगों के लिए खोल दिया जाएगा।”

क्या ई-वाहन वायु प्रदूषण कम कर सकते हैं?
असम के शहरी इलाकों खासकर गुवाहाटी में तेजी से बढ़ता वायु प्रदूषण चिंता का विषय बन गया है। नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम के तहत असम की 5 जगहें गुवाहाटी, नलबाड़ी, नगांव, शिवसागर और सिलचर नॉन-अटेनमेंट श्रेणी में आती हैं, जहां हवा की गुणवत्ता लगातार खराब रहती है।
आईआईटी, गुवाहाटी ने इन इलाकों में कणों से होने वाले प्रदूषण के स्रोत का पता लगाने के लिए एक अध्ययन किया। यह अध्ययन इन पांचों क्षेत्रों में पीएम-2.5 और पीएम-10 प्रदूषण के अलग-अलग स्रोतों और उसमें हर स्रोत की हिस्सेदारी का ब्योरा देता है। इस अध्ययन की अगुवाई करने वाले प्रोफेसर शरद गोखले का कहना है कि ई-वाहन साइलेंसर से निकलने वाले धुएं को खत्म कर उत्सर्जन खासकर बारीक धूल-कणों में कमी ला सकते हैं। वह बताते हैं, “गाड़ियों के धुएं से निकलने वाला उत्सर्जन पीएम-2.5 को बढ़ाने वाले प्रमुख कारणों में से एक है। फ्यूल के जलने से पीएम-2.5 का स्तर ज्यादा बढ़ाता है, जबकि सड़क की धूल और निर्माण कार्यों जैसे स्रोत पीएम-10 ज्यादा बढ़ाते हैं।”
उनका कहना है कि पीएम-10 में पीएम-2.5 की हिस्सेदारी बढ़ रही है, जो वाहनों से होने वाले उत्सर्जन को कम करने की जरूरत की तरफ इशारा करती है। वह कहते हैं, “असम के इन पांचों नॉन-अटेनमेंट इलाकों में पीएम-2.5 की हिस्सेदारी करीब 20 प्रतिशत है, जो मुख्य रूप से गाड़ियों से निकलता है। इसलिए टेक्नोलॉजी या फिर पॉलिसी के जरिए पीएम-2.5 पर नियंत्रण पाना जरूरी है और ई-वाहन इसका एक बेहतरीन विकल्प हो सकते हैं।”
हालांकि, प्रोफेसर गोखले का मानना है कि कारों पर ध्यान केंद्रित करने की बजाय पहले दोपहिया, तिपहिया गाड़ियों और बसों को इलेक्ट्रिक में बदलना चाहिए। इसका सबसे ज्यादा असर दिखेगा। वह कहते हैं, “सड़कों पर चलने वाले कुल वाहनों में दोपहिया गाड़ियों की हिस्सेदारी लगभग 50 प्रतिशत है। असम में भी यह बदलाव पूरी तरह व्यावहारिक है। गुवाहाटी में पहले ही कुछ इलेक्ट्रिक सिटी बसें शुरू हो चुकी हैं।”
वह सुझाव देते हैं कि ई-वाहनों को अपनाने के साथ चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और बैटरियों के सही निपटारे पर भी काम होना चाहिए। वह आगाह भी करते हैं कि सिर्फ ई-वाहनों से ही हवा में मौजूद धूल-कणों का प्रदूषण खत्म नहीं किया जा सकता। वह बताते हैं, “पीएम-10 और पीएम-2.5 सिर्फ साइलेंसर से निकले धुएं से ही नहीं बढ़ता, बल्कि इसका एक बड़ा हिस्सा गाड़ियों की आवाजाही से सड़कों पर उड़ने वाली धूल, टायरों और ब्रेक के घिसने से निकलने वाले बारीक कणों से भी निकलता है। अध्ययन में खासकर सड़कों की धूल इस प्रदूषण का सबसे बड़ा स्रोत बनकर सामने आई है।”

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