भारत का ई-सफर: उत्तर प्रदेश में हर 49 वाहन पंजीकरण में एक ई रिक्शा, बिजली आपूर्ति बड़ी चुनौती

2021 से 2023 के बीच लखनऊ में वायु प्रदूषण में 30 फीसदी और कानपुर में 19 फीसदी की कमी
लखनऊ की सड़कों पर इलेक्ट्रिक ऑटो व रिक्शा का कब्जा बढ़ रहा है। फोटो: विकास चौधरी
लखनऊ की सड़कों पर इलेक्ट्रिक ऑटो व रिक्शा का कब्जा बढ़ रहा है। फोटो: विकास चौधरी
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उत्तर प्रदेश 17.5 लाख से ज्यादा इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) बेड़ों के साथ देश में ईवी का सबसे बड़ा बाजार बनकर उभरा है, लेकिन ईवी अभी लोगों की निजी पसंद नहीं बल्कि बेरोजगारी की बड़ी खाई के एक छोटे से हिस्से को पाटने और ईंधन की लागत को कम करने के लिए सड़कों पर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रहा है।

यही कारण है कि राज्य में पंजीकृत होने वाले हर 49 वाहनों में एक ई-रिक्शा शामिल है और हर तीन इलेक्ट्रिक वाहनों में करीब दो ई-रिक्शा पंजीकृत हैं। वहीं, यूपी की सघन आबादी वाले बड़े शहरों में आवाजाही के लिए सार्वजनिक परिवहनों के पारंपरिक डीजल और सीएनजी बसों को भी ई-बसों में बदलने की योजना थी लेकिन यह तय किए गए लक्ष्य से अभी बहुत पीछे है और शहरी व स्थानीय परिवहन में ई-रिक्शा बड़ी भूमिका निभा रहे हैं।

भारत सरकार ने इलेक्ट्रिक और हाइब्रिड वाहनों को बढ़ावा देने के लिए फास्टर एडॉप्टेशन एंड मैन्युफैक्चरिंग ऑफ (हाइब्रिड एंड) इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (फेम) इंडिया स्कीम शुरू की थी। इसका दूसरा चरण यानी फेम-2  वर्ष 2019 में शुरु हुआ था, जो विशेष रूप से इलेक्ट्रिक वाहनों, चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और सार्वजनिक परिवहन में ई-बसों को बढ़ावा देने पर केंद्रित था।

इसी योजना के तहत 2019 से अब तक उत्तर प्रदेश के 11 शहरों जिनमें  लखनऊ, कानपुर, आगरा, वाराणसी, प्रयागराज, मेरठ, गाजियाबाद, अलीगढ़, बरेली, झांसी और मुरादाबाद में कुल 600 इलेक्ट्रिक बसें तैनात की गई हैं। लेकिन निजी वाहनों और थ्री व्हीलर ईवी और ई रिक्शा आदि के लिए चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार नहीं किया जा सका है।

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में दुबग्गा के पास ई-रिक्शा चालक सौरभ कुमार बताते हैं कि छह से आठ घंटे के चार्ज में करीब 100 किलोमीटर तक चल जाता है। वह कहते हैं, कि इससे पहले वह रोजगार के लिए भटक रहे थे लेकिन फाइनेंस की व्यवस्था के बाद उन्होंने यह रिक्शा लिया और प्रतिदिन 800 रुपए तक की आमदनी करते हैं। लेकिन वह यह भी कहते हैं कि अब इतने ई-रिक्शे और ईवी के थ्री व्हीलर हो गए हैं कि आमदनी घटती जा रही है लेकिन खाली बैठने से बेहतर है कि कुछ कमाते रहें।

लखनऊ डिवीजन के आरटीओ एनफोर्समेंट प्रभात पांडेय डाउन टू अर्थ को बताते हैं कि लखनऊ में अकेले 61 हजार से ज्यादा ई-रिक्शा पंजीकृत हैं। इनके लिए हर तरह की छूट है और किसी भी तरह की कोई कैपिंग नहीं है। न ही मोटर अधिनियम में ऐसा कोई प्रावधान है कि इन्हें हम रेग्युलेट कर सकें। यातायात नियमों के तहत पुलिस को यह प्रावधान है कि वह इनके रूट फिक्स कर दे लेकिन परिवहन विभाग के दायरे से यह पूरी तरह बाहर हैं।

वह हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में वकीलों की तरफ से दायर एक जनहित याचिका का हवाला देते हुए कहते हैं कि हर चौराहों पर इन्हें 100 मीटर दूर रहने का निर्देश दिया गया है। साथ ही बस अड्डों की तरह इनके स्थान भी तय करने के लिए नगर निगम को आदेश दिया गया है। लेकिन यह आसान नहीं है।

दूसरी तरफ किसी शहर में इनकी कितनी संख्या होनी चाहिए वह भी तय नहीं है। इनकी चार्जिंग के लिए भी कोई व्यवस्था नहीं है ज्यादातर बिजली चोरी के जरिए ई-रिक्शा चार्ज हो जाते हैं। इसलिए यह एक चुनौती है। वह जोड़ते हैं कि वायु प्रदूषण  को कम करने के लिहाज से यह बेहतर हैं लेकिन सड़कों पर जाम और ट्रैफिक व्यवस्थाओं को उथल-पुथल करने में इनकी बड़ी चुनौती उभरी है।

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) की स्टेट ऑफ इंडियाज एनवॉयरमेंट 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक वायु प्रदूषण के कारण उत्तर प्रदेश में औसत जीवन प्रत्याशा में अनुमानित 5 वर्ष 11 महीने की हानि हो रही है। यही कारण है कि ईवी वाहनों को राज्य की नीतियों में गंभीर वायु प्रदूषण की मार झेल रहे उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी जरूरत के तौर पर भी देखा जा रहा है। राज्य में इलेक्ट्रॉनिक वाहनों के बेड़ों को बढ़ाने वाली नीतियां भविष्य के लिए आस जरूर पैदा करती हैं लेकिन धरातल पर ईवी के लिए बुनियादी सरंचनाएं और निरंतर बिजली ईंधन की आपूर्ति और मानव संसाधन एक चुनौती बनी हुई हैं।

शुरुआती प्रयासों के चलते राजधानी लखनऊ और स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में शामिल कानपुर नगर जैसे सघन आबादी वाले जिलों में बीते तीन वर्षों में वायु प्रदूषण के औसत आंकड़ों खासतौर से पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) और अतिसूक्ष्ण प्रदूषक पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) 2.5 में 19 से 36 फीसदी तक की कमी दर्ज की गई है। हालांकि, अब भी वायु गुणवत्ता अपने सामान्य मानकों से दो से तीन गुना अधिक दर्ज की जा रही है। वायु प्रदूषण को घटाने में इलेक्ट्रॉनिक वाहनों की हिस्सेदारी अभी एक नन्हें कदम जैसी है और यह उत्सर्जन के बोझ में यह कमी बीएस-6 जैसे स्वच्छ ईंधन मानकों और सीएनजी के प्रसार और स्थानीय कदमों के बाद भी आ सकती है।

सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के वाहन डैशबोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में 15 अगस्त, 2026 तक 5,62,92,968 कुल वाहन पंजीकृत हैं। इनमें पेट्रोल और डीजल वाहनों की हिस्सेदारी मिलाकर करीब 90.3 प्रतिशत है, पेट्रोल वाहन 4,47,01,020 और डीजल वाहन 61,52,756 पंजीकृत हैं। जबकि 17.73 लाख वाहन ईवी (3.15 फीसदी) श्रेणी में पंजीकृत हैं । इनमें कुल 11.47 लाख ई-रिक्शा ही हैं। सवारी ढ़ोने वाले ई रिक्शे की  संख्या 10.33 लाख है और माल ढुलाई में लगे ई-रिक्शे  की संख्या 1.14 लाख है। इनके अलावा 8,29,605 तिपहिया वाहन भी पंजीकृत हैं जो लखनऊ और कानपुर में ई-रिक्शा के बाद बड़ी संख्या पर दिखते हैं।

फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशंस (फाडा) के अनुसार जुलाई 2026 में देश में इलेक्ट्रिक तिपहिया वाहनों की राष्ट्रीय बाजार हिस्सेदारी 65.1 प्रतिशत तक जा पहुंची, जबकि इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों की हिस्सेदारी 11.2 प्रतिशत रही। यह राष्ट्रीय रुझान उत्तर प्रदेश में भी उसी दिशा का संकेत देता है। इसकी एक बड़ी वजह यह मानी जा सकती है कि तिपहिया वाहन, खासकर सवारी और माल ढुलाई के लिए इस्तेमाल होने वाले ई-रिक्शा, वाणिज्यिक इस्तेमाल में हैं जहां दैनिक परिचालन लागत सीधे कमाई से जुड़ी है, इसलिए ईंधन की बचत करने वाला विकल्प जल्दी अपनाया जाता है।

लखनऊ में एक प्राइवेट जॉब करने वाले विजय गुप्ता रोजाना पॉलिटेक्निक चौराहे से स्कूटर चौराहा करीब 28 किलोमीटर का सफर तय करते हैं। वह, ई बसों को लेकर काफी उत्साहित हैं लेकिन उनकी सीमित संख्या और आस-पास जुड़ने वाले जिलों से जोड़ने की जरूरत पर बल देते हैं।

पहले सिटी बसों को पकड़ना एक दुरूह काम हुआ करता था, जरूरत से ज्यादा भीड़ और गर्मी इसे एक खराब सफर में तब्दील कर देते थे। लेकिन ई-बसें इस सफर को न सिर्फ आसान बनाती हैं बल्कि बजट फ्रैंडली भी हैं। गुप्ता कहते हैं, यदि ई-बस लखनऊ से आस-पास जिलों को भी कवर करने लगें तो लखनऊ  पर बोझ थोड़ा कम हो सकता है। वह इनकी संख्या बढ़ाने के साथ चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को भी बढ़ाने पर जोर देने के लिए कहते हैं।

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