

कर्नाटक के बेंगलुरु जैसे बड़े शहर जहां सड़कों पर बढ़ते जाम और वायु प्रदूषण से जूझ रहे हैं, वहीं हुबली और धारवाड़ जैसे छोटे शहरों के पास परिवहन के अधिक टिकाऊ साधन अपनाने का विकल्प अभी भी मौजूद है। हुबली और धारवाड़ के लिए टिकाऊ परिवहन व्यवस्था का मतलब ऐसे साझा वाहनों पर ध्यान केंद्रित करना होगा, जैसे बिजली से चलने वाली बसें, जिनके लिए बिजली नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से पैदा की जाए। इन शहरों में टिकाऊ परिवहन व्यवस्था विकसित करने की प्रक्रिया जारी है। इसी बीच निजी इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी), खासतौर पर दोपहिया इलेक्ट्रिक वाहनों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। इनमें से कुछ का निर्माण स्थानीय स्तर पर भी हो रहा है।
हुबली के 36 वर्षीय बिल्डर विनायक नवाली ने 2024 के अंत में बिना ज्यादा शोध किए एमजी विंडसर ईवी खरीदी थी। उनकी कार खराब हो गई थी, इसलिए उन्होंने तुरंत ईवी खरीदने का फैसला किया। चार से पांच महीने तक इस्तेमाल करने के बाद उन्हें महसूस हुआ कि ईवी को फिलहाल केवल दूसरे वाहन के रूप में और मुख्य रूप से शहर की सीमा के भीतर ही इस्तेमाल किया जा सकता है।
उन्होंने डाउन टू अर्थ से कहा, “जब आप ईवी को 100 किलोमीटर प्रति घंटे से ज्यादा की रफ्तार से चलाते हैं तो इसकी रेंज बहुत तेजी से घटकर कंपनी के दावे की करीब 50 फीसदी रह जाती है। अगर वाहन को लगातार 80 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलाया जाए तो इसकी रेंज कंपनी के दावे के करीब हो सकती है, लेकिन मेरे लिए यह अच्छा विकल्प नहीं है। मेरे लिए समय ही पैसा है और मैं इसमें समझौता नहीं करना चाहता।”
कुछ समय पहले हुबली से करीब 200 किलोमीटर दूर चित्रदुर्ग की यात्रा के दौरान उन्हें एहसास हुआ कि हाईवे पर सफर के लिए ईवी बेहद खराब विकल्प हो सकती है। उन्होंने बताया, “उस तरफ जाते समय मैं आमतौर पर घर से ईवी को पूरी तरह चार्ज करके निकलता हूं और फिर हुबली से करीब 100 किलोमीटर दूर रानेबेनूर में दोबारा चार्ज करता हूं, लेकिन उस दिन किसी कारण से वहां चार्जर उपलब्ध नहीं था।”
इसके बाद नवाली ने रानेबेनूर से 40 किलोमीटर और आगे दावणगेरे के एक चार्जिंग स्टेशन पर जाने का फैसला किया। उन्होंने 140-150 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से वहां तक सफर किया, लेकिन जब उन्होंने अपनी ईवी चार्जिंग पर लगाई तो वह चार्ज ही नहीं हो रही थी। चार से पांच चार्जिंग स्टेशनों पर कोशिश करने के बाद उन्होंने एमजी शोरूम में फोन कर इसकी जानकारी ली।
नवाली ने कहा, “उन्होंने मुझे बताया कि बैटरी निकालनी होगी और दोबारा चार्ज करने की कोशिश करने से पहले 45-50 मिनट तक इंतजार करना होगा। पूरी यात्रा में मुझे कुल आठ घंटे लग गए और यह बेहद खराब अनुभव रहा।” वहीं, कंपनी ने उन्हें पहले से इस तरह की समस्या के बारे में कोई जानकारी नहीं दी थी।
नवाली का यह भी कहना है कि पिछले डेढ़ साल में हुबली में इलेक्ट्रिक कारों की संख्या बढ़ी है, जिसके कारण चार्जिंग स्टेशन ढूंढना भी चुनौतीपूर्ण हो गया है। वह कहते हैं, “इसलिए फिलहाल मैं ईवी का इस्तेमाल शहर की सीमा के भीतर ही कर रहा हूं। ऐसे में मैं इसे रात में घर पर चार्ज कर सकता हूं और दिन में इस्तेमाल कर सकता हूं।”
उनका कहना है कि अगर ईवी की रेंज बढ़कर 800-1000 किलोमीटर हो जाए और वह अपनी रफ्तार और एक्सीलरेशन से समझौता किए बिना बेंगलुरु जाकर वापस आ सकें, तभी वह ईवी को अपना प्राथमिक वाहन बनाएंगे। उनका कहना है कि हुबली की वायु गुणवत्ता बेंगलुरु और दिल्ली जैसे शहरों जितनी खराब नहीं है, इसलिए फिलहाल यहां वायु प्रदूषण भी ईवी को तुरंत बड़े पैमाने पर अपनाने की कोई बड़ी वजह नहीं है।
हुबली और धारवाड़ जैसे अभी विकसित हो रहे शहरों के लिए टिकाऊ परिवहन व्यवस्था में ईवी की क्या भूमिका हो सकती है? ईवी की कुल संख्या बढ़ रही है, हालांकि हुबली-धारवाड़ क्षेत्र में इस वृद्धि की रफ्तार एक जैसी नहीं है।
20 अगस्त 2026 तक धारवाड़ ईस्ट क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय (आरटीओ) के तहत पंजीकृत नॉन-ट्रांसपोर्ट इलेक्ट्रिक वाहनों की कुल संख्या 15,444 है। इनमें बैटरी चालित वाहन (बीओवी), प्योर ईवी और स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड वाहन शामिल हैं। वहीं, धारवाड़ वेस्ट आरटीओ के तहत ऐसे वाहनों की संख्या 8,927 है।
हुबली और धारवाड़ शहरों के साथ आसपास के ग्रामीण इलाकों में वाहनों का पंजीकरण करने वाले दोनों आरटीओ में नॉन-ट्रांसपोर्ट ईवी पंजीकरण में 2022 में तेज वृद्धि हुई। धारवाड़ ईस्ट में ईवी पंजीकरण 2021 में 446 से बढ़कर 2022 में 2,217 हो गया, हालांकि 2023 के बाद से इसमें थोड़ी गिरावट आई है। धारवाड़ वेस्ट में गैर-परिवहन ईवी पंजीकरण 2021 के 363 से बढ़कर 2022 में 1,104 हो गया। इसके बाद से इनकी संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है।
धारवाड़ वेस्ट के परिवहन उपायुक्त और वरिष्ठ क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी श्रीधर के मल्लाड ने डाउन टू अर्थ से कहा, “हाल के वर्षों में ईवी की संख्या कई कारणों से बढ़ी है। इनमें लोगों के लिए घर पर वाहन चार्ज कर पाना, प्रदूषकों के उत्सर्जन में कमी और दूसरे ईंधनों पर निर्भरता का कम होना शामिल है।”
हुबली स्थित एमजी शोरूम के प्रतिनिधियों के अनुसार, ईवी खरीदने आने वाले ग्राहकों की सबसे बड़ी चिंता वाहन की रेंज और ईंधन पर होने वाली बचत को लेकर होती है। इनमें से ज्यादातर ग्राहक कारोबारी हैं, जिन्हें रोजाना आसपास के शहरों या कस्बों में जाना पड़ता है और वे ईवी के जरिए पेट्रोल पर होने वाला खर्च बचा पा रहे हैं। वास्तव में शोरूम में सबसे ज्यादा बिक्री कॉमेट और विंडसर ईवी की हुई है।
शोरूम के एक प्रतिनिधि ने डाउन टू अर्थ से कहा, “हर 25 वाहनों की बिक्री में 20 ईवी होते हैं, क्योंकि ग्राहक हर महीने ईंधन के खर्च में 20,000 रुपये तक की बचत कर पा रहे हैं।”
इकोनिक इम्पोर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड नाम की कंपनी चलाने वाले विनय कुमार पुजार इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहन बनाते हैं। उन्होंने इनकी बिक्री केवल छह महीने पहले शुरू की है और उनका कहना है कि इस अवधि में उनकी बिक्री काफी ज्यादा रही है।
पुजार ने डाउन टू अर्थ से कहा, “मैंने छह महीने में 600 वाहन बेच दिए हैं और हर महीने बिक्री की संख्या बढ़ी है। डीलरों के पास भी करीब 400 वाहन मौजूद हैं।” वह इलेक्ट्रिक वाहनों का निर्माण बेलगावी में स्थानीय स्तर पर, बिल्कुल शुरुआत से कर रहे हैं। उन्होंने बढ़ती पेट्रोल और डीजल की कीमतों को ध्यान में रखते हुए यह कंपनी शुरू की थी।
पुजार ने कहा, “हमारे वाहनों की कीमत हीरो, एथर और टीवीएस जैसी दूसरी ब्रांडेड कंपनियों के वाहनों की तुलना में काफी कम है, जिसे ग्राहक पसंद कर रहे हैं।”
उनकी योजना अगले एक साल या उससे कुछ अधिक समय में हर महीने करीब 1,000 वाहन बेचने की है। उनका कहना है कि दस साल की अवधि में तीन साल के लिए मिलने वाली सरकारी कर छूट एक बड़ी सहायक नीति है।
भारत में जैसे-जैसे देश के भीतर ही बैटरियों का निर्माण शुरू होगा और उनकी कीमत कम होगी, हुबली और धारवाड़ में ईवी की संख्या और बढ़ सकती है। मल्लाड के मुताबिक, फिलहाल भारत को अपनी अधिकांश बैटरियां चीन और यूक्रेन जैसे दूसरे देशों से आयात करनी पड़ती हैं।
मल्लाड के अनुसार, हुबली और धारवाड़ तथा आसपास के हाईवे पर चार्जिंग का बुनियादी ढांचा भी पर्याप्त है। हुबली और धारवाड़ शहरों में करीब 4-5 चार्जिंग स्टेशन हैं और आसपास के हाईवे पर इससे कहीं अधिक स्टेशन मौजूद हैं।
उन्होंने कहा, “बेंगलुरु से बेलगावी तक पर्याप्त चार्जिंग स्टेशन हैं, इसलिए हाईवे पर यात्रा करने वाले लोगों को किसी परेशानी का सामना नहीं करना चाहिए।” डाउन टू अर्थ ने बेंगलुरु हाईवे पर हुबली से करीब 11 किलोमीटर दूर अदारगुंची गांव में हुंडई द्वारा संचालित ऐसे ही एक चार्जिंग स्टेशन का दौरा किया।
चार्जिंग स्टेशन के एक कर्मचारी जुबेर ने बताया, “हर दिन करीब आठ से दस वाहन यहां चार्जिंग के लिए रुकते हैं।”
हुबली स्थित एमजी शोरूम के प्रतिनिधियों ने ईवी चार्जिंग को लेकर अपने ग्राहकों, खासकर बुजुर्ग लोगों के सामने आने वाली एक बड़ी समस्या की ओर ध्यान दिलाया। अलग-अलग कंपनियों द्वारा लगाए गए चार्जिंग स्टेशनों पर ईवी चार्ज करने के लिए उन्हें अलग-अलग ऐप डाउनलोड करने पड़ते हैं और वे अक्सर इसे लेकर भ्रमित हो जाते हैं।
एमजी के एक प्रतिनिधि ने डाउन टू अर्थ से कहा, “हर कंपनी का अलग ऐप है, जो यात्रियों के लिए परेशानी का कारण बनता है। अगर सभी कंपनियों के लिए एक ही ऐप हो तो उनके लिए यह काफी आसान हो जाएगा।”
धारवाड़ जिले की उपायुक्त और जिलाधिकारी स्नेहल आर के मुताबिक, लंबे समय में हुबली-धारवाड़ के लिए निजी इस्तेमाल वाले इलेक्ट्रिक वाहन सही रास्ता नहीं हैं। हालांकि, वह सार्वजनिक परिवहन में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी का समर्थन करती हैं। उन्होंने डाउन टू अर्थ से कहा, “जिले की 50 फीसदी से अधिक आबादी शहरी क्षेत्रों में रहती है और आज की स्थिति में सार्वजनिक और निजी तौर पर संचालित बस सेवाओं के रूप में सार्वजनिक परिवहन काफी अच्छा है। इसके अलावा हुबली और धारवाड़ की सड़कों पर बड़ी संख्या में ऑटो रिक्शा भी चलते हैं।”
स्नेहल के अनुसार, इलाके में इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहन उपलब्ध हैं, लेकिन बेंगलुरु जैसे शहरों की तुलना में वे सड़कों पर उतने ज्यादा दिखाई नहीं देते। हुबली और धारवाड़ में बड़े पैमाने पर सार्वजनिक परिवहन के लिए फिलहाल ईवी की ज्यादा गुंजाइश नहीं है। हालांकि, नॉर्थ वेस्ट कर्नाटक रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन (एनडब्ल्यूकेआरटीसी) की अगले साल तक हुबली, धारवाड़ और बेलगावी (बेलगाम) के शहरी इलाकों में चलाने के लिए 200 इलेक्ट्रिक बसें शुरू करने की योजना है।
स्नेहल ने कहा, “मैं व्यक्तिगत परिवहन के लिए निजी इलेक्ट्रिक वाहनों का समर्थन नहीं करती, लेकिन सार्वजनिक परिवहन के लिए ईवी का समर्थन करती हूं, क्योंकि इससे ईंधन की लागत कम होगी और आबादी के एक बड़े हिस्से को इस सेवा का लाभ मिलेगा।”
उन्होंने कहा, “इसका कारण यह है कि हम ईवी की लाइफ-साइकिल लागत को ध्यान में नहीं रखते, खासकर बैटरियों की उम्र पूरी होने के बाद उनके निपटान की लागत को भी ध्यान में नहीं रखा जाता। फिलहाल लिथियम-आयन बैटरियों को पर्यावरण के अनुकूल तरीके से निपटाने का कोई रास्ता नहीं है और सात से आठ साल में यह एक बड़ी समस्या बनने वाली है।”
उन्होंने आगे कहा, “हुबली और धारवाड़ के लोगों में सार्वजनिक परिवहन तक पैदल जाने या रोजमर्रा के छोटे-मोटे कामों के लिए पैदल घूमने और इस दौरान दूसरे लोगों से मिलने-जुलने की संस्कृति अब भी मौजूद है। इस संस्कृति को संरक्षित करने की जरूरत है।”