भारत का ई-सफर: ओडिशा की महिलाओं के लिए आजीविका का साधन बना ई-रिक्शा सेवा

एएमए यानी अमा ई-राइड महिला चालकों को तय मासिक आय और अधिक सुरक्षित काम के घंटे देती है, लेकिन कुछ का कहना है कि कम वेतन, सीमित छुट्टियां और चिकित्सा सहायता का अभाव अब भी चिंता का विषय हैं
41 साल की सबिता भोई ओडिशा में इलेक्ट्रिक रिक्शा चलाती हैं और बस स्टॉप तक यात्रियों को लाने-ले जाने का काम करती हैं। पूजा दास
41 साल की सबिता भोई ओडिशा में इलेक्ट्रिक रिक्शा चलाती हैं और बस स्टॉप तक यात्रियों को लाने-ले जाने का काम करती हैं। पूजा दास
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तीन साल पहले 41 वर्षीय सबिता भोई ने भुवनेश्वर के एक होटल में रूम अटेंडेंट की नौकरी छोड़ दी। उन्होंने ऐसे काम को अपनाने का फैसला किया, जिसमें उन्हें अधिक स्वतंत्रता और काम का एक निश्चित समय मिल सके। आज वह ओडिशा की एएमए ई-राइड सेवा के तहत इलेक्ट्रिक रिक्शा चलाती हैं और राज्य की राजधानी में एएमए बस स्टॉप तक यात्रियों को लाने-ले जाने का काम करती हैं।

भोई ने यह बदलाव करने से पहले करीब आठ साल तक मेफेयर लैगून होटल में काम किया था। उन्होंने डाउन टू अर्थ को बताया, “एएमए ई-राइड शुरू होने के बाद एक एनजीओ हमारे पास आया और उसने हमें इस पहल के बारे में बताया। यह बेहतर लगा, न कोई हम पर हुक्म चलाने वाला, न ज्यादा दबाव और रात की शिफ्ट के बिना आठ घंटे की ड्यूटी। सॉफ्ट स्किल्स और ड्राइविंग की तीन महीने की ट्रेनिंग के बाद हमें एक ई-रिक्शा मिला।”

ओडिशा की सार्वजनिक परिवहन एजेंसी कैपिटल रीजन अर्बन ट्रांसपोर्ट (सीआरयूटी) ने मई 2022 में एएमए ई-राइड शुरू की थी। इसका उद्देश्य भुवनेश्वर में यात्रियों को एएमए बस स्टॉप से जोड़कर साफ-सुथरी और किफायती पहले और आखिरी छोर तक की कनेक्टिविटी उपलब्ध कराना था।

कॉम्प्रिहेंसिव रीजन अर्बन ट्रांसपोर्ट (सीआरयूटी) ओडिशा सरकार के आवास एवं शहरी विकास विभाग के तहत काम करने वाली सार्वजनिक परिवहन एजेंसी है, जो पहले मो बस के नाम से संचालित एएमए बस और एएमए ई-राइड सेवाओं का संचालन करती है। एजेंसी का कहना है कि उसका लक्ष्य एकीकृत, किफायती और टिकाऊ शहरी परिवहन उपलब्ध कराना है।

इस सेवा में ड्राइवर के सभी पद, जिन्हें सारथी  कहा जाता है, महिलाओं, ट्रांसजेंडर लोगों और वंचित या हाशिये पर रहने वाले समूहों के लोगों के लिए आरक्षित हैं। डाउन टू अर्थ ने अपनी रिपोर्टिंग के दौरान केवल महिला चालकों को देखा। सीआरयूटी के प्रबंध निदेशक मोहम्मद सादिक आलम ने भी इस बात की पुष्टि की।

सीआरयूटी के अनुसार, यह भारत की पहली सार्वजनिक परिवहन एजेंसी है जो अपने स्वयं के ई-रिक्शा बेड़े का संचालन करती है। फिलहाल यह सेवा भुवनेश्वर में 13 फीडर रूटों पर चलती है, जिनमें प्रशांति विहार, पाटियागड़ा, शैलाश्री विहार, एसयूएम अस्पताल, आईटीईआर, पोखरीपुट, इन्फोसिटी, केआईआईटी स्क्वायर, एम्स अस्पताल, कलिंगा नगर, दमाना स्क्वायर और जगमारा शामिल हैं।

एएमए ई-राइड में प्रति सवारी 10 रुपये का एक समान किराया लिया जाता है। एएमए बस सेवाएं भुवनेश्वर, कटक, खुर्दा, पिपिली, पुरी, कोणार्क और राउरकेला में संचालित होती हैं।

आलम ने भुवनेश्वर में डाउन टू अर्थ को बताया, “शहरी परिवहन के लिए पहले और आखिरी छोर तक कनेक्टिविटी सबसे बड़ी चुनौती है। हमारी ई-राइड योजना लोगों को उनके घरों से लेकर बस स्टेशन तक पहुंचाती है। इसकी आवृत्ति भी बसों के अनुरूप है और यह सेवा बसों के समय के साथ समन्वित है।”

आजीविका में सुधार, लेकिन सुविधाएं सीमित

भोई केआईआईटी स्क्वायर के आसपास 1.78 किलोमीटर लंबे ईआर-9 रूट पर ई-रिक्शा चलाती हैं और रोजाना करीब 60 से 80 यात्रियों को ले जाती हैं। उन्हें 15,500 रुपये मासिक वेतन और चार दिन की सवेतन छुट्टी मिलती है।

उन्होंने कहा, “हम यात्रियों की संख्या से बंधे नहीं हैं, क्योंकि हमें मासिक वेतन मिलता है। लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। निर्धारित छुट्टी से अधिक एक दिन की छुट्टी लेने पर वेतन काट लिया जाता है। अगर ई-रिक्शा में कम से कम एक यात्री हो, तो हमें 10 से 15 मिनट के भीतर स्टेशन से निकलना होता है।”

आलम के अनुसार, एएमए ई-राइड की शुरुआत 50 ई-रिक्शों के बेड़े के साथ हुई थी। उन्होंने बताया कि मरम्मत और पर्याप्त कर्मचारियों की कमी के कारण फिलहाल केवल 38 ई-रिक्शा ही चल रहे हैं।

38 वर्षीय संजुक्ता डागर के लिए इस काम ने परिवार पर आर्थिक बोझ कम करने में मदद की है। 2022 तक गृहिणी रहीं डागर अब इन्फोसिटी के आसपास 2.8 किलोमीटर लंबे ईआ-8 रूट पर एएमए ई-राइड का ई-रिक्शा चलाती हैं।

उन्होंने कहा, “मेरी चार बेटियां और एक बेटा है और मेरी सबसे बड़ी बेटी बीए के अंतिम वर्ष में है। मेरे पति पेंटर हैं और महीने में करीब 12,000 से 15,000 रुपये कमाते हैं। मेरी तनख्वाह से आर्थिक तनाव थोड़ा कम हुआ है।” लेकिन यह काम शारीरिक रूप से काफी मेहनत वाला है। डागर ने बताया कि आठ घंटे की शिफ्ट में वह करीब 22 चक्कर लगाती हैं और अब उनके घुटनों और पीठ में लगातार दर्द रहने लगा है। सहारे के लिए वह कभी-कभी कमर की बेल्ट भी पहनती हैं।

उन्होंने कहा, “हमें चिकित्सा या दूसरी सुविधाएं नहीं मिलतीं। सीआरयूटी केवल हमें वेतन देता है और महीने में चार दिन की छुट्टी देता है।”

विस्तार की योजनाएं

आलम ने बताया कि सीआरयूटी सेवा के विस्तार के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल पर विचार कर रहा है। उन्होंने कहा, “प्रस्तावित मॉडल के तहत सीआरयूटी ई-रिक्शा सेवाओं का बसों के समय-सारणी के साथ समन्वय जारी रखेगा, जबकि व्यवस्था को आर्थिक रूप से अधिक व्यवहार्य और बड़े स्तर पर विस्तार के लिए आसान बनाया जाएगा।”

एएमए ई-राइड हाल ही में संबलपुर में शुरू की गई है और इसे राउरकेला, कटक, क्योंझर, अंगुल, झारसुगुड़ा, भद्रक, बालासोर और बारीपदा समेत अन्य शहरों में शुरू करने की योजना है।

आलम ने कहा कि भविष्य में ई-रिक्शाओं की तैनाती मांग के आधार पर होगी। यानी प्रत्येक शहर में ई-रिक्शाओं की संख्या किसी तय आवंटन के बजाय स्थानीय जरूरतों के अनुसार निर्धारित की जाएगी।

आलम ने बताया कि भुवनेश्वर से करीब 70 किलोमीटर दूर पुरी में सीआरयूटी करीब 20 वाहनों वाली एक ई-रिक्शा सेवा को तकनीकी सहायता देता है। इस सेवा का रखरखाव नगर निगम करता है और इसका कुछ हिस्सा जगन्नाथ मंदिर ट्रस्ट द्वारा वित्तपोषित है, लेकिन सीआरयूटी सीधे इस बेड़े का संचालन नहीं करता।

भुवनेश्वर के केंद्रीकृत तरीके से संचालित एएमए ई-राइड नेटवर्क के विपरीत, पुरी की ई-रिक्शा व्यवस्था अधिक विकेंद्रीकृत है और छोटे ऑपरेटरों द्वारा संचालित होती है। जगन्नाथ मंदिर, वार्षिक रथ यात्रा और पुरी बीच के लिए प्रसिद्ध इस तीर्थ नगरी में बड़ी संख्या में निजी ई-रिक्शा चालक हैं, जो होटलों, समुद्र तट, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड और मंदिर क्षेत्र में यात्रियों को सेवाएं देते हैं।

पुरी में निजी ऑपरेटर

ऐसे ही एक चालक 25 वर्षीय पी. राकेश बेहरा हैं, जिन्होंने कम वेतन और मैनेजर के दबाव के कारण चार साल पहले कपड़ों की दुकान में हेल्पर की नौकरी छोड़ दी थी। पहले दो साल तक उन्होंने ई-रिक्शा लीज पर लिया और रोजाना 800 रुपये किराया दिया।

उन्होंने कहा, “यह मेरी कमाई का लगभग आधा हिस्सा था। दो साल पहले अपना ई-रिक्शा खरीदने के बाद अब मैं केवल चार घंटे में रोजाना करीब 1,500 से 2,000 रुपये कमा लेता हूं। मैं केवल दोपहर 2 बजे से 4 बजे तक काम करता हूं और मुझ पर हुक्म चलाने वाला कोई नहीं है।”

बेहरा रूट के आधार पर प्रति यात्री 20 से 100 रुपये तक किराया लेते हैं। ऑफ-सीजन में बस स्टैंड या रेलवे स्टेशन से जगन्नाथ मंदिर तक का किराया करीब 20 रुपये होता है, लेकिन रथ यात्रा के दौरान यह काफी बढ़ सकता है।

उनका वाहन श्री श्री दशरथीदेव एंड ठाकुर सीतारामदास ओंकारनाथ देव सेवाश्रम ई-रिक्शा यूनियन के तहत चलता है। यह पुरी का एक स्थानीय परिवहन संगठन है, जो आध्यात्मिक गुरु सीतारामदास ओंकारनाथ से जुड़े आश्रमों और धार्मिक स्थलों के आसपास ई-रिक्शा सेवाओं का समन्वय करता है।

बेहरा ने बताया कि पुरी में इस यूनियन के करीब 32 ई-रिक्शा हैं। उन्होंने कहा, “शहर में ऐसे 12 से 15 ई-रिक्शा यूनियन हैं और कुछ यूनियन 80 तक वाहनों के बेड़े का संचालन करती हैं।”

केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के वाहन डैशबोर्ड के अनुसार, 23 जून 2026 तक ओडिशा में दोपहिया, तिपहिया और चारपहिया वाहनों की श्रेणियों में पंजीकृत कुल 51,383 इलेक्ट्रिक वाहनों में से 2,974 ई-रिक्शा थे।

2025-26 में ई-रिक्शा का पंजीकरण बढ़कर करीब 6,901 हो गया, जो राज्य में पंजीकृत 92,364 इलेक्ट्रिक दोपहिया, तिपहिया और चारपहिया वाहनों का 7.5 प्रतिशत था।

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