भारत का ई-सफर: 2030 तक 30% ईवी लक्ष्य, सार्वजनिक परिवहन व चार्जिंग नेटवर्क में बड़े निवेश की जरूरत

देश के अलग-अलग राज्यों में इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने के लिए क्या प्रयास किए जा रहे हैं, ये प्रयास कितने सफल हैं और क्या अड़चनें हैं, यह जानने के लिए डाउन टू अर्थ ने देश के नौ राज्यों का दौरा किया और जमीनी हकीकत को नजदीक से देखा।
कोलाज: डाउन टू अर्थ
कोलाज: डाउन टू अर्थ
Published on

ऐसे समय में जब भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन की वजह से बढ़ रही आपदाओं से जूझ रही है और यह साफ हो चुका है कि जीवाश्म ईंधनों की बढ़ती खपत पर रोक लगाने के लिए हरित तकनीक को अपनाना लाजिमी हो गया है, तब देश में बिजली से चलने वाले वाहनों (ईवी) को बढ़ावा देना एक स्वागतयोग्य कदम है। देश ने 2030 तक नए वाहनों के पंजीकरण में ईवी की हिस्सेदारी 30 प्रतिशत सुनिश्चित करने का लक्ष्य रखा है। राज्य सरकारें इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए अपनी-अपनी नीतियां बना रही हैं।

यह भी पढ़ें
भारत का ई-सफर: स्वच्छ हवा के लिए दिल्ली का परिवहन मॉडल, क्या सीख सकता है देश?
कोलाज: डाउन टू अर्थ

राजधानी दिल्ली में जनवरी 2027 के बाद केवल इलेक्ट्रिक तिपहिया व हल्के कमर्शियल वाहनों का पंजीकरण किया जाएगा। इस तरह ज्यादातर राज्य पेट्रोल-डीजल वाले वाहनों का पंजीकरण बंद करने जा रहे हैं। इससे साइलेंसर (टेलपाइप) से शून्य प्रदूषण उत्सर्जन वाले वाहनों को बढ़ावा मिलेगा। लेकिन इस दौर में यदि सार्वजनिक परिवहन के नेटवर्क में भारी सुधार नहीं किया गया तो बहुत ज्यादा सुधार की संभावना कम ही है। सरकार को सार्वजनिक परिवहन में सुधार के लिए भारी निवेश करना होगा। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट की ताजा रिपोर्ट बताती है कि 2047 तक नियमित शहरी बसों का बेड़ा 65 हजार से बढ़ाकर 6.71 लाख करना होगा और 90 फीसदी बसों को इलेक्ट्रिक बनाना होगा।

इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने के लिए सिर्फ सब्सिडी देना पर्याप्त नहीं होगा। सरकार को एक साथ कई ठोस कदम उठाने होंगे। वाहन कंपनियों के लिए तय किया जाए कि उन्हें कितने इलेक्ट्रिक वाहन बेचने होंगे। वाहनों की ईंधन दक्षता के नियम और सख्त किए जाएं। राज्यों के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने के स्पष्ट और अनिवार्य लक्ष्य तय हों। सरकारी वाहनों और ऐप से चलने वाली टैक्सियों में इलेक्ट्रिक वाहनों की खरीद जरूरी की जाए।

इलेक्ट्रिक बसों की खरीद और संचालन में होने वाले जोखिम को कम किया जाए। दोपहिया और तिपहिया इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए आसानी से कर्ज मिले। डिलीवरी वाहनों को इलेक्ट्रिक में बदलने के लिए कंपनियों को निर्धारित लक्ष्य दिए जाएं। प्रमुख माल ढुलाई मार्गों पर इलेक्ट्रिक ट्रकों को बढ़ावा दिया जाए। हर जगह आसानी से उपलब्ध और सस्ता सार्वजनिक चार्जिंग नेटवर्क बनाया जाए। बैटरी के पुनर्चक्रण का उद्योग विकसित किया जाए और बैंकों से इलेक्ट्रिक वाहन खरीदने के लिए कर्ज मिलने की दिक्कत दूर की जाए।

डाउन टू अर्थ ने नौ राज्यों में जमीनी पड़ताल की है। इन रिपोर्ट्स को विस्तार से पढ़ने के लिए क्लिक करें

Down to Earth- Hindi
hindi.downtoearth.org.in