

राजस्थान के श्रीगंगानगर में राज्य स्तरीय किसान मेला 'किन्नू महाकुंभ' आयोजित किया जा रहा है, जो किन्नू उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है।
हालांकि, किसानों का मानना है कि उनकी दीर्घकालिक समस्याओं का समाधान किए बिना ऐसे आयोजनों से वास्तविक लाभ नहीं मिल सकता।
उत्पादन में अस्थिरता और निर्यात की कमी से किसानों की आय प्रभावित हो रही है।
किन्नू की बागवानी में लागत बढ़ रही है, और सरकारी नर्सरियों में पौध की कमी से किसान निजी नर्सरियों पर निर्भर हैं।
राजस्थान के श्रीगंगानगर में राज्य सरकार की ओर से 23, 24 और 25 जनवरी 2026 को राज्य स्तरीय किसान मेला ‘किन्नू महाकुंभ’ आयोजित किया जा रहा है। किन्नू उत्पादन के लिए देश भर में पहचान बना चुके श्रीगंगानगर में इस आयोजन को सरकार की एक सकारात्मक पहल के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, किन्नू उत्पादक किसानों का कहना है कि ऐसे आयोजनों से तब तक वास्तविक लाभ नहीं मिल सकता, जब तक उनकी बुनियादी और दीर्घकालिक समस्याओं का समाधान नहीं किया जाता।
श्रीगंगानगर जिले में कई दशकों से किन्नू की बागवानी की जा रही है। बागों का रकबा भी बढ़ रहा है। 2015-16 में जिले में 7,380 हेक्टेयर क्षेत्रफल में किन्ने के बाग थ, वर्तमान में 12 हजार हेक्टेयर में बाग लगे हैं। एक पेड़ से 150 से 170 किलोग्राम औसत उत्पादन आदर्श माना जाता है लेकिन वर्ष 2021-22 एवं 2022-23 में यह औसत 40 किलोग्राम ही रह गया। इस साल यह 125 से 150 किलोग्राम होने की उम्मीद है। उद्यान अधिकारियों का कहना है कि प्रति पेड़ उत्पादन मेंं निरंतर गिरावट की स्थिति तो नहीं है लेकिन अस्थिरता बढ़ गई है। किसानों की आय में भी उतार-चढ़ाव आते रहे हैं।
उद्यान अधिकारियों के अनुसार पांच साल के बाद किन्नू के पेड़ों पर फल आने लगते हैं लेकिन दस साल या इससे पुराने बागों में औसत उत्पादन अधिक होता है। दस साल या इससे पुराने बागों से किसानों को डेढ़ लाख रुपए प्रति हेक्टेयर की आय हो रही है। अगर एक पेड़ से 150 किलोग्राम किन्नू का उत्पादन हो तो 22 रुपए प्रति किलो के हिसाब से 3300 रुपए आय हो जाती है। जब बम्पर फसल हो जाती है तो दस साल या इससे पुराने बागों से आय का आंकड़ा यहां तक पहुंच जाता है लेकिन मौसम की अनिश्चितता, पानी की कमी आदि से इसमें उतार-चढ़ाव आ जाता है।
उदाहरण के रूप में, वर्ष 2021-22 एवं 2022-23 में यह औसत 40 किलोग्राम ही रह गया तो आय भी 880 रुपए तक सिमट कर रह गई। किसानों का कहना है कि जब उत्पादन कम होता है तो भाव भले ही ज्यादा मिल जाएं लेकिन औसत आय बहुत घट जाती है। जब उत्पादन बम्पर होता है तो अच्छे भाव नहीं मिलते। इससे भी आय कम हो जाती है। बागों पर लागत हर साल बढ़ती जा रही है। फसल बीमा करते हुए जो लागत मानी जाती है, उसके अनुसार किन्नू के बागों मेंं 70 हजार 896 रुपए प्रति हेक्टेयर लागत आती है लेकिन किसानों का कहना है कि वास्तविक लागत इससे कहीं ज्यादा है।
उद्यानिकी विभाग के अधिकारियों के अनुसार इस बार करीब 3.50 लाख मीट्रिक टन किन्नू उत्पादन की संभावना है, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 25 से 30 प्रतिशत अधिक है।
श्री गंगानगर का किन्नू अपनी मिठास और गुणवत्ता के कारण देश-विदेश में मांग रखता है लेकिन निर्यात सुविधाओं के अभाव में यह बाजारों तक सुचारू रूप से नहीं पहुंच पा रहा है। वर्ष 2021 में बांग्लादेश निर्यात के लिए एक विशेष ट्रेन चलाई गई थी लेकिन वह भी एक ही साल में बंद कर दी गई।
नेतेवाला गांव के किसान दिलीप गोदारा बताते हैं कि इस ट्रेन के बंद होने से किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। किन्नू को बाहर भेजने के लिए आज किसानों के पास कोई प्रभावी व्यवस्था नहीं है।
वे कहते हैं कि जब मौसम की प्रतिकूलता या सिंचाई की कमी से उत्पादन कम होता है, तब तो नुकसान होता ही है लेकिन जब बंपर पैदावार होती है, तब भी निर्यात और मार्केटिंग की कमी के कारण किन्नू सब्जियों से भी कम दामों में बेचना पड़ता है। भरपूर उत्पादन का फायदा तभी है, जब उसके वाजिब भाव मिलें।
गोदारा बताते हैं कि जब किन्नू के बागों को सबसे अधिक पानी की जरूरत उस समय होती है, तब नहरों में बंदी कर दी जाती है। सिंचाई विभाग कई बार नहर बंदी की पूर्व सूचना तक नहीं देता। पिछले दो वर्षों में किसानों को अत्यधिक नहर बंदी का सामना करना पड़ा है।
एक समय श्रीगंगानगर के कृषि अनुसंधान केंद्र में उच्च गुणवत्ता की किन्नू पौध तैयार की जाती थी, जो किसानों को सस्ती दरों पर उपलब्ध होती थी। लेकिन पिछले एक-डेढ़ दशक से यह काम लगभग बंद हो चुका है।
कृषि कॉलेज की स्थापना के बाद अधिकांश वैज्ञानिकों को शिक्षण कार्य में लगा दिया गया, जिससे अनुसंधान के लिए समय नहीं बचता। पुराने बागों में रोग फैल रहे हैं लेकिन मौके पर जाकर मार्गदर्शन देने वाला तंत्र कमजोर हो गया है।
वर्तमान में जिले के किसान किन्नू पौध के लिए मुख्य रूप से उद्यान विभाग की नर्सरियों पर निर्भर हैं, जहां कुल आवश्यकता के मुकाबले मात्र 10 प्रतिशत पौध ही उपलब्ध हो पाती है। शेष पौध किसानों को निजी नर्सरियों से 100 से 150 रुपए प्रति पौधा की दर से खरीदनी पड़ती है जबकि सरकारी नर्सरियों में यही पौध 50 से 60 रुपए में मिलती है।
मौसम की मार और बीमारियों के चलते कई बार किसान बाग उखाडऩे को मजबूर हो जाते हैं। वर्ष 2022 इसका बड़ा उदाहरण है, जब सरकारी आंकड़ों के अनुसार किन्नू बागों में 80 से 90 प्रतिशत तक नुकसान हुआ। श्रीगंगानगर, पदमपुर, सूरतगढ़, श्रीकरणपुर, श्रीविजयनगर, घड़साना, अनूपगढ़ और रायसिंहनगर तहसीलों में किसानों ने करीब 289 हेक्टेयर क्षेत्र में लगे किन्नू बाग उखाड़ दिए।
किसानों का कहना है कि यदि समय-समय पर कृषि वैज्ञानिक बागों का निरीक्षण करें, तकनीकी सलाह दें और उत्पादन के अनुरूप उचित मूल्य सुनिश्चित किया जाए तो ऐसी स्थिति से बचा जा सकता है।
सादुलशहर के किसान शिवप्रकाश सहारण का कहना है कि जब तक श्रीगंगानगर में अलग से किन्नू मंडी स्थापित नहीं होती, तब तक किसानों को उचित दाम मिलना मुश्किल है। वे बताते हैं कि जिस तरह हाल ही में श्रीगंगानगर में अलग से गाजर मंडी की स्थापना की गई है, उसी तर्ज पर किन्नू मंडी की भी आवश्यकता है।
इसके अभाव में किसान लगातार नुकसान उठाते रहेंगे। सहारण मानते हैं कि जिले में किन्नू आधारित फूड प्रोसेसिंग प्लांट की स्थापना बेहद जरूरी है। जूस, पल्प जैसे उत्पाद बनने पर किन्नू की बड़े पैमाने पर खरीद संभव होगी। इसके साथ ही किन्नू आधारित औषधीय उत्पादों की संभावनाओं पर भी काम किया जाना चाहिए।
मदेरां गांव के किसान अरविंद गोदारा बताते हैं कि आज भी किसानों को किन्नू की अच्छी गुणवत्ता वाली पौध के लिए पंजाब और हरियाणा का रुख करना पड़ता है। यदि सरकार श्रीगंगानगर में ही टिश्यू कल्चर आधारित पौध उचित दरों पर उपलब्ध कराए, तो किसानों को बड़ा लाभ मिल सकता है। पंजाब और हरियाणा की तरह यहां भी सुविधाएं दी जानी चाहिए।
वर्तमान में यदि कोई किसान ड्रिप सिस्टम, सोलर प्लांट, पानी की डिग्गी या तारबंदी करना चाहता है तो उसे अलग-अलग विभागों के चक्कर काटने पड़ते हैं। यदि इन सभी सुविधाओं के लिए संयुक्त आवेदन प्रणाली लागू की जाए तो यह किसानों के लिए बेहद उपयोगी साबित होगी।