वन्यजीव संरक्षण बनाम किसानों की आजीविका, क्या है जरूरी?

जानवरों के कारण जहां किसानों की फसल खराब हो रही हैं, वहीं किसान खेती तक छोड़ने को मजबूर हो गए हैं
वन्यजीव संरक्षण बनाम किसानों की आजीविका, क्या है जरूरी?
इलेस्ट्रेशन: योगेंद्र आनंद / सीएसई
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जंगली जानवर फसलों को नष्ट कर रहे हैं और भारी आर्थिक नुकसान के कारण किसानों के लिए चिंता का विषय बन गए हैं। भारत के कई हिस्सों में हमलावर जानवरों के कारण खेती करना अब घाटे का सौदा होता जा रहा है। अब एक ऐसा युद्ध छिड़ गया है जिसमें न केवल बाघ, हाथी और तेंदुए जैसे बड़े स्तनधारी शामिल हैं, बल्कि जंगली सूअर, नीलगाय और अन्य खुर वाले जानवर और सबसे अधिक नुकसान पहुंचाने वाले बंदर भी शामिल हैं।

यह एक सच्चाई अवश्य है, लेकिन एक ऐसी सच्चाई जिस पर हम चर्चा तक करने को तैयार नहीं हैं और समाधान कहें तो दूर की बात है। संरक्षण समुदाय इस चर्चा से बचना चाहेगा। उनके लिए और शायद यह सही भी हो क्योंकि ऐसा कोई संघर्ष चल रहा है तो उसके लिए मनुष्य ही दोषी होंगे।

हम जानते हैं कि मानव गतिविधियों से जंगली जानवरों के आवास नष्ट हो रहे हैं और वे आसान भोजन और शिकार की तलाश में जंगलों से बाहर निकल रहे हैं। यह संघर्ष आंशिक रूप से सफल वन्यजीव संरक्षण का भी परिणाम है जिसके फलस्वरूप वन्यजीवों की संख्या में वृद्धि हुई है। लेकिन यह किसानों की दयनीय स्थिति से मुंह मोड़ने का बहाना नहीं हो सकता।

हम इसे दबाने की कोशिश करते हैं और चूंकि यह गरीबों की समस्या है इसलिए ऐसा करना आसान होता है। पुणे स्थित गोखले राजनीति एवं अर्थशास्त्र संस्थान की 2025 की रिपोर्ट “ह्यूमन वाइल्डलाइफ कॉन्फ्लिक्ट्स: एन एस्टिमेशन ऑफ नेट एग्रीकल्चरर लॉसेस इन महाराष्ट्र” अपनी तरह का एकमात्र अध्ययन है।

इसके निष्कर्ष बताते हैं कि राज्य में वन्यजीवों के कारण होने वाली शुद्ध कृषि हानि सालाना 10,000-40,000 करोड़ रुपए है। रिपोर्ट यह भी कहती है कि असली आंकड़े इससे कहीं अधिक हैं। अध्ययन में एक चिंताजनक बात पाई गई कि 62 प्रतिशत किसानों ने जानवरों के हमलों के कारण अपने बुवाई क्षेत्र को कम कर दिया था। किसानों ने बेमौसम बारिश और उपज की कम कीमतों के बाद जंगली जानवरों द्वारा फसल के नुकसान को मुख्य समस्या के रूप में सूचीबद्ध किया। एक-तिहाई ने तो यहां तक कहा कि यह उनके नुकसान का मुख्य कारण था।

कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया विश्वविद्यालय और भारत के वन्यजीव अनुसंधान केंद्र द्वारा 2021 के एक अध्ययन में पाया गया कि कर्नाटक के किसान जंगली जानवरों के हमलों के कारण हर साल एक से तीन महीने के बराबर की आय का नुकसान सहन करते हैं।

हाथी के साथ एक ही “मुठभेड़” से एक किसान को 20 प्रतिशत या उससे अधिक का नुकसान हो सकता है। कर्नाटक के कोडागु जिले के 2025 के एक अध्ययन में पाया गया कि सर्वेक्षण में शामिल लगभग 50 प्रतिशत किसानों को प्रति वर्ष 90,000 रुपए का भारी नुकसान हुआ, जिसके फलस्वरूप कई किसान कर्ज में डूब गए।

हिमाचल प्रदेश के वन विभाग का अनुमान है कि फसल का वार्षिक नुकसान कुल मिलाकर 500 करोड़ रुपए तक पहुंच जाता है और यदि बाड़ लगाने और अन्य सुरक्षा उपायों की अप्रत्यक्ष लागतों को शामिल किया जाए तो यह कम से कम 1,500 करोड़ रुपए होगा।

इसकी पुष्टि तमिलनाडु के पश्चिमी घाट में 2026 के एक अध्ययन से भी होती है, जिसके अनुसार 90 प्रतिशत किसानों ने वन्यजीव संघर्ष को अपने प्राथमिक उत्पादन जोखिम के रूप में चिह्नित किया, जिसमें मुख्य रूप से जंगली सूअर, मोर और हाथियों द्वारा 50-60 प्रतिशत फसलों को नुकसान पहुंचा।

डाउन टू अर्थ द्वारा देशभर में की गई पड़ताल आय की हानि, आजीविका के नुकसान और बढ़ते कर्ज की कहानी बार-बार दोहराती है। सवाल यह है कि इस रिश्ते को “पुनः संतुलित” करने और मनुष्यों एवं जानवरों के बीच सह-अस्तित्व का कोई स्वरूप स्थापित करने के लिए क्या किए जाने की आवश्यकता है?

भारत सरकार की प्रतिक्रिया अब तक धीमी, भ्रमित और निराशाजनक रही है। अच्छी बात यह है कि अब वह इस संकट की “प्रकृति” को स्वीकार करती है। साल 2026 जून-जुलाई की खरीफ फसल के बाद से सरकार ने अपनी राष्ट्रीय फसल बीमा योजना (प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना) में जानवरों से होने वाले नुकसान को शामिल किया है।

किसानों को नुकसान की सूचना देने के लिए 72 घंटे का समय दिया जाता है। मुआवजे के भुगतान से पहले ड्रोन का उपयोग करके पुष्टि की जाएगी। योजना की मौजूदा खामियों को देखते हुए यह देखना बाकी है कि क्या यह कारगर होगा।

इसके अतिरिक्त किसानों को मुआवजा राज्य सरकारें देती हैं। लेकिन जैसा कि गोखले संस्थान की रिपोर्ट में पाया गया है कि भले ही जंगली जानवरों के हमलों से प्रभावित 25 प्रतिशत किसानों ने मुआवजे की मांग की लेकिन केवल 1-2 प्रतिशत को ही नुकसान के अनुरूप भुगतान प्राप्त हुआ। अधिकांश या तो योजना के बारे में नहीं जानते थे या इसकी जटिल नौकरशाही प्रक्रियाओं को पार नहीं कर सके।

विवाद का मुख्य केंद्र केरल है, जहां यह मुद्दा न केवल मनुष्यों और जानवरों के बीच की लड़ाई बन गया है बल्कि केंद्र और राज्य के बीच का विवाद भी बन गया है। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की धारा 62 के तहत केवल केंद्र ही किसी जंगली जानवर को “वर्मिन” (उपद्रवी) घोषित कर सकता है, जिससे वन विभाग द्वारा उसे मारने की अनुमति मिल जाती है।

केंद्र ऐसा करने में हिचकिचाता रहा है, यहां तक कि विशिष्ट राज्यों में कुछ खास जानवरों के लिए भी। इसलिए केरल सरकार ने 2024-25 में अपना स्वयं का वन्यजीव संरक्षण विधेयक पेश किया, जिसमें जंगली सूअर के हमलों को राज्यव्यापी आपदा घोषित किया गया और जानवर को “वर्मिन” के रूप में वर्गीकृत किया गया।

फरवरी 2026 में राज्य के राज्यपाल अंततः इस विधेयक को मंजूरी के लिए राष्ट्रपति के पास भेजने पर सहमत हुए। यह विधेयक किसानों को स्वयं जंगली सूअरों को मारने की अनुमति नहीं देता है। इसके बजाय यह उन लाइसेंस प्राप्त निशानेबाजों को अधिकार सौंपता है जिन्हें पंचायतों द्वारा जानवर को मारने के लिए बुलाया जा सकता है।

दूसरी ओर 2025 के अंत में राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड ने रीसस मकाक (लाल मुंह वाले बंदर) को “अनुसूची II” के जानवर के रूप में सुरक्षा बहाल करने की सिफारिश की, जिससे उन्हें मारना कठिन हो गया है।

यह पशु अधिकार समूहों की सिफारिशों का पालन करता है, लेकिन इस तथ्य को नजरअंदाज करता है कि वन विभाग भी इस बात से सहमत हैं कि बंदर एक खतरा बन गए हैं और नसबंदी के माध्यम से उनकी आबादी को नियंत्रित करने के प्रयास सफल नहीं हुए हैं। मैं इस निर्णय को जमीनी हकीकत से बेखबर कहूंगी। इस तरह का दृष्टिकोण अपनाने से संघर्ष कम होने की बजाय बढ़ेगा। यह न तो संरक्षण के लिए अच्छा है और न ही किसानों के लिए।

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