बढ़ती महंगाई के दौर में भी क्यों आलू-प्याज सड़कों पर फेंक रहे हैं किसान?

खेत से थोक मंडी तक दामों में भारी गिरावट, लेकिन खुदरा बाजार में महंगाई बरकरार; किसान को उपभोक्ता के हर रुपए में सिर्फ आधी से भी कम हिस्सेदारी
 फाइल फोटो : कुमार संभव श्रीवास्तव
फाइल फोटो : कुमार संभव श्रीवास्तव
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महाराष्ट्र के किसान को 25 बोरी प्याज के बदले मात्र एक रुपया मिला, जबकि नासिक के किसानों ने सड़क पर प्याज डंप कर दिया।  उत्तर प्रदेश के किसानों  ने आलू की कीमत न मिलते देख खड़ी फसल पर ट्रेक्टर चला दिया। कर्नाटक के किसानों ने कीमतों में गिरावट से हताश होकर टमाटरों से भरा ट्रक भेड़ बकरियों के बाड़े में पलट दिया।

इतना ही नहीं, लगभग सभी फसलें न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम कीमत पर बिक रही हैं। देश के अलग-अलग इलाकों से आ रही इन खबरों ने एक बार फिर से सुर्खियां बटोर रही हैं। जबकि अप्रैल माह में खाद्य मूल्य सूचकांक में वृद्धि रिकॉर्ड की गई।

मार्च 2026 में खाद्य मुद्रास्फीति दर 3.87 प्रतिशत थी, जो अप्रैल 2026 में बढ़कर 4.20 प्रतिशत हो गई। रिटेल यानी खुदरा में भी लोगों को बढ़ी हुई कीमत पर आलू प्याज लेने पड़ रहे हैं। 

किसानों को कम कीमत मिलने के वही पुराने कारण ही गिनाए जा रहे हैं। जैसे कि- फसलों का बंपर उत्पादन, खराब  मौसम, कोल्ड स्टोरेज की कमी की वजह से किसानों को पूरे दाम नहीं मिल रहे हैं। 

लेकिन उपभोक्ताओं के लिए कीमतें कम नहीं हो रही हैं। केंद्रीय खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के उपभोक्ता मामलों के विभाग (मूल्य निगरानी प्रकोष्ठ) की रिपोर्ट बताती है कि 12 मई 2026 को प्याज का अखिल भारतीय औसत खुदरा (रिटेल) मूल्य 25.36 रुपए प्रति किलो था, जो एक माह पहले 23.63 रुपए था। हालांकि पिछले साल इसी दिन प्याज का रिटेल मूल्य 27.07 रुपए प्रति किलो था। 

इसी तरह 12 मई 2026 को आलू का रिटेल मूल्य 20.86 रुपए प्रति किलो था, जो एक महले पहले 19.06 रुपए प्रति किलो था, जबकि टमाटर का मूल्य 12 मई को 34.85 रुपए और एक माह पहले 25.28 रुपए प्रति किलो था। 

वहीं मंडियों में किसानों को 5 से 7 रुपए प्रति किलो प्याज बेचने को मजबूर हैं। 

उदाहरण के लिए अगर महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर जिले की ही बात की जाए तो सरकारी कृषि मंत्रालय के एगमार्कनेट के अनुसार इस जिले की प्रमुख कृषि उपज मंडियों में मई 2026 के दूसरे सप्ताह में प्याज के थोक भाव में लगातार गिरावट दर्ज की गई। 

जिले की पांच प्रमुख मंडियों छत्रपति संभाजीनगर एपीएमसी, गंगापुर, लासूर स्टेशन, पैठण और वैजापुर में औसत थोक भाव 578.08 रुपए प्रति क्विंटल रहा, जो पिछले सप्ताह के 688.37 रुपए और पिछले वर्ष इसी अवधि के 835.22 रुपए प्रति क्विंटल की तुलना में काफी कम है। 

छत्रपति संभाजी नगर एपीएमसी में 496.65 रुपए प्रति क्विंटल थोक कीमत थी। गंगापुर एपीएमसी में सालाना आधार पर सबसे बड़ी 47.7 प्रतिशत गिरावट दर्ज की गई, जबकि पैठण मंडी में कीमतें एक महीने में 25 प्रतिशत तक टूट गईं। पैठण वह इलाका है, जहां किसान को 25 बोरी के बदले एक रुपया मिला था। 

ऐसे में सवाल यह उठता है कि उपभोक्ता से वसूले जा रहे मूल्य के मुकाबले किसानों को कितना मूल्य मिल रहा है? अगर पूरे महाराष्ट्र की बात की जाए तो मई के दूसरे सप्ताह में प्याज की औसत थोक कीमत 933.30 रु्पए प्रति क्विंटल थी, जबकि उपभोक्ता मामलों के विभाग के आंकड़े बताते हैं कि 12 मई 2026 को प्याज का औसत फुटकर मूल्य 21.63 रुपए किलो था। यानी किसानों को रिटेल कीमतों के मुकाबले 43 प्रतिशत ही मिला। 

क्या है समाधान 

ऐसे में सरकारी दखल की मांग बहुत समय से की जाती रही है। किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य की मांग करते रहे हैं। वहीं विशेषज्ञ मानते हैं कि मूल्य स्थिरीकरण कोष (पीएसएफ) किसानों और उपभोक्ताओं दोनों के लिए राहत का माध्यम बन सकता है। 

केंद्र सरकार ने 2014-15 में मूल्य स्थिरीकरण कोष (पीएसएफ) शुरू किया था, जिसका उद्देश्य अधिक उत्पादन के समय खरीद कर किसानों को राहत देना और बाद में कमी के दौर में उपभोक्ताओं को नियंत्रित दाम पर प्याज उपलब्ध कराना है। 

उपभोक्ता मंत्रालय द्वारा तैयार की गई ‘डॉक्यूमेंटिंग ऑनियन ऑपरेशंस अंडर पीएसएफ’ रिपोर्ट के अनुसार 2015-16 में पीएसएफ के तहत केवल 0.09 लाख मीट्रिक टन प्याज खरीदा गया था, जो 2023-24 तक बढ़कर 6.38 लाख मीट्रिक टन हो गया। 

इसका असर यह हुआ कि किसानों की हिस्सेदारी उपभोक्ता के एक रुपए में 45 प्रतिशत से बढ़कर 54 प्रतिशत तक पहुंच गई। किसानों को मंडी मूल्य से 3 से 19 प्रतिशत तक अधिक कीमत मिली और भुगतान का समय 7-10 दिनों से घटकर तीन दिन रह गया। वहीं उपभोक्ता स्तर पर दिल्ली में प्याज की खुदरा कीमतों की अस्थिरता में 24 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।

लेकिन पीसीएफ के तहत खरीद का बेहद छोटा है। अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार 2023-24 में पीएसएफ के तहत 6.38 लाख मीट्रिक टन प्याज खरीदी गई, जबकि देश का कुल प्याज उत्पादन 300 लाख मीट्रिक टन से अधिक था। यानी सरकारी खरीद कुल उत्पादन के केवल 1-2 प्रतिशत तक ही सीमित रही।

रिपोर्ट में यह भी सिफारिश की गई है कि पीएसएफ को केवल संकट प्रबंधन योजना की तरह नहीं, बल्कि स्थायी बाजार स्थिरीकरण तंत्र के रूप में विकसित किया जाए। इसके लिए वैज्ञानिक भंडारण, ग्रामीण और अर्ध-शहरी बाजारों तक सस्ती बिक्री, परिवहन नेटवर्क का विस्तार और राज्यों के स्तर पर खरीद केंद्रों की संख्या बढ़ाने की जरूरत बताई गई है। 

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