‘वी आर ईटिंग द अर्थ’: जमीन, जलवायु और खेती के बीच खतरनाक संतुलन की कहानी
जमीन मुफ्त नहीं है। यही विचार माइकल ग्रुनवाल्ड की किताब “वी आर ईटिंग द अर्थ” की बुनियाद है। पहली नजर में यह बात चौंकाने वाली लग सकती है, लेकिन लेखक इसे बेहद व्यवस्थित और ठोस तर्कों के साथ समझाते हैं।
आज यह बात आम हो चुकी है कि दुनिया की खाद्य व्यवस्था से वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगभग एक तिहाई हिस्सा आता है। जलवायु परिवर्तन पर लिखे जाने वाली रिपोर्टों में यह तथ्य अक्सर दोहराया जाता है। लेकिन ग्रुनवाल्ड केवल यह तथ्य बताकर आगे नहीं बढ़ते। वह पूरे हिसाब को पाठकों के सामने खोलकर रखते हैं। अध्याय दर अध्याय, एकड़ दर एकड़ और गलत नीतियों के एक के बाद एक फैसलों के जरिए वह दिखाते हैं कि हम इस स्थिति तक कैसे पहुंचे।
आज इंसान खेती के लिए एशिया और यूरोप के कुल क्षेत्रफल के बराबर जमीन साफ कर चुका है। वर्ष 2050 तक दुनिया की आबादी लगभग 10 अरब हो जाएगी, जिसे भोजन उपलब्ध कराना होगा। लेकिन ग्रुनवाल्ड चेतावनी देते हैं कि अगर हर छह सेकंड में एक एकड़ यानी लगभग 0.4 हेक्टेयर रेनफॉरेस्ट काटने का सिलसिला जारी रहा, तो हम दुनिया का पेट तो भर सकते हैं, लेकिन उसे झुलसने से नहीं बचा पाएंगे।
किताब का सबसे मजबूत आधार टिम सर्चिंगर का शोध है। वह अमेरिका के प्रिंसटन स्कूल ऑफ पब्लिक एंड इंटरनेशनल अफेयर्स में वरिष्ठ शोधकर्ता हैं और वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट से भी जुडे़ हैं। उन्होंने 2008 में ही यह दिखा दिया था कि फसलों से बनने वाले एथेनॉल के लिए लैंड यूज चेंज जैसे समाधान दरअसल जलवायु के लिए फायदे की बजाय नुकसान ज्यादा पहुंचाता है। उनकी दलील सीधी है। अगर सोयाबीन, मक्का या गन्ने जैसी फसलों को ईंधन बनाने के लिए उगाया जाएगा तो भोजन पैदा करने के लिए कहीं और नई जमीन की जरूरत होगी। इसके लिए अक्सर जंगल या प्राकृतिक वनस्पति वाले इलाके साफ किए जाते हैं। यही इलाके बड़ी मात्रा में कार्बन को अपने भीतर संजोकर रखते हैं। जब इन्हें नष्ट किया जाता है तो वह कार्बन वातावरण में पहुंच जाता है।
सर्चिंगर ने यह बात करीब दो दशक पहले सामने रखी थी, लेकिन उसके बाद भी हालात में बहुत बदलाव नहीं आया है। फर्क सिर्फ इतना है कि समस्या और बड़ी हो गई है। उदाहरण के लिए, भारत में हाल के वर्षों में एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम तेजी से बढ़ा है। कुछ अनुमानों के अनुसार, बड़े पैमाने पर एथेनॉल उत्पादन के लिए बिहार जैसे पूरे राज्य के बराबर खेती योग्य जमीन की जरूरत पड़ सकती है। दूसरी ओर भू-राजनीतिक बदलाव और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव ने भी ऐसे कार्यक्रमों को और गति दी है। लेकिन जमीन के वास्तविक उपयोग और उसके असर का हिसाब आज भी उतना ही अधूरा है, जितना सर्चिंगर ने वर्षों पहले बताया था।
किताब बताती है कि यही गलती दूसरे कई तथाकथित जलवायु समाधानों में भी दोहराई जाती है। चाहे लकड़ी से बायोफ्यूल बनाना हो या फिर एग्रोइकोलॉजी और रिजनरेटिव एग्रीकल्चर के आधार पर तैयार किए गए कार्बन क्रेडिट जैसे समाधान हों, लेखक के अनुसार इनमें भी गंभीर खामियां हैं। ये ऐसे समाधान हैं जो सुनने में तो अच्छे लगते हैं लेकिन यह नहीं देखते कि अगर उस जमीन को बिना प्रभावित किए छोड़ दिया जाता तो वह कितनी अधिक मात्रा में कार्बन को अपने भीतर समेट सकती थी।
ग्रुनवाल्ड का कहना है कि सबसे प्रभावी रास्ता वही है, जिसे हमने अपनाया ही नहीं, यानी जहां संभव हो वहां जमीन को उसकी प्राकृतिक अवस्था में रहने दिया जाए। उनके मुताबिक, जलवायु के लिए इसकी कीमत हमारी सोच से कहीं अधिक है। वह एक अनुमान पेश करते हैं कि जमीन के उपयोग में बदलाव से होने वाला कार्बन नुकसान दरअसल जीवाश्म ईंधन की जगह दूसरे ईंधनों के इस्तेमाल से होने वाली बचत से तीन गुना तक अधिक हो सकता है।
सर्चिंगर ने वर्षों तक नीति निर्माताओं और वैज्ञानिकों को यह समझाने की कोशिश की लेकिन उन्हें बहुत कम सफलता मिली। किताब का सबसे असहज निष्कर्ष यही है कि केवल ठोस सबूत या स्पष्ट तर्क काफी नहीं होते। दशकों के शोध, मॉडल और प्रमाण भी उस सोच को नहीं बदल सके, जो केवल फायदे गिनती रही और लगातार नुकसान को नजरअंदाज करती रही।
यह किताब एक और प्रचलित धारणा को चुनौती देती है कि औद्योगिक खेती ही पर्यावरण की सबसे बड़ी दुश्मन है। ग्रुनवाल्ड का तर्क है कि अगर तकनीक और बेहतर तरीकों से प्रति एकड़ अधिक उत्पादन लिया जाए तो नई जमीन को खेती के लिए साफ करने की जरूरत कम होगी और प्राकृतिक क्षेत्र बचाए जा सकेंगे। यह एक विवादास्पद तर्क है, लेकिन लेखक इसे मजबूती से रखते हैं। हालांकि, वह यह भी मानते हैं कि ऐसी दुनिया में, जहां आज भी ज्यादातर खेती छोटे किसान करते हैं, वहां इस सोच को अपनाना आसान नहीं होगा। लेकिन यहां एक अहम सवाल उठता है। अगर खेती में बड़े पैमाने पर औद्योगिक तरीके अपनाए जाते हैं तो भारत और सब सहारा अफ्रीका के उन करोड़ों छोटे और सीमांत किसानों का क्या होगा, जो आज भी विकासशील देशों की कृषि व्यवस्था की रीढ हैं? किताब इस सवाल को उठाती तो है, लेकिन इस पर बहुत गहराई से चर्चा नहीं करती।
ग्रुनवाल्ड के अनुसार आगे का रास्ता दो बातों का संतुलन है। पहला, जहां संभव हो वहां जमीन को उसकी प्राकृतिक अवस्था में छोड़ दिया जाए। दूसरा, कम जमीन से टिकाऊ तरीके से अधिक भोजन पैदा किया जाए। लेकिन इन दोनों लक्ष्यों को एक साथ हासिल करने के लिए दुनिया को आज के मुकाबले कहीं ज्यादा ध्यान, संसाधन और निवेश की जरूरत होगी।
ग्रुनवाल्ड लिखते हैं कि आधुनिक खेती अब दो अलग-अलग खेमों में बंट चुकी है। एक ओर रिजनरेटिव फार्मिंग के समर्थक हैं, जो प्रकृति आधारित खेती को समाधान मानते हैं। दूसरी ओर औद्योगिक खेती के समर्थक हैं, जो तकनीक और अधिक उत्पादन को सबसे अहम मानते हैं। दोनों पक्ष अक्सर एक-दूसरे के नजरिये को खारिज कर देते हैं।
लेखक का मानना है कि अकेले कोई भी रास्ता इस समस्या का समाधान नहीं कर सकता। असली हल दोनों सोच की अच्छी बातों को साथ लेकर चलने में है। लेकिन व्यवहार में ऐसा होना आसान नहीं दिखता। दोनों धड़े अब भी अपनी-अपनी राह पर चलते नजर आते हैं।

