फोटो: सुनीश कुमार
फोटो: सुनीश कुमार

बिहार की शुगर फैक्ट्रियों का किसानों पर प्रभाव: समृद्धि या संकट?

वर्तमान में पश्चिमी चंपारण में छह शुगर फैक्ट्रियां चल रही हैं
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औद्योगिकीकरण की अपनी सीमाएं भी हैं। यह हमेशा समृद्धि ही नहीं लाती।।  कई बार यह सामाजिक और आर्थिक संरचना पर अनपेक्षित परिणाम भी थोप देती  है। इस बात को समझने के लिए लौरिया-नंदनगढ़ का मामला महत्वपूर्ण हो सकता है, जो ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से बिहार का एक प्रसिद्ध स्थान है। पर्यटन के संदर्भ में इसकी अपनी अलग पहचान है।

इसकी ऐतिहासिकता की बात की जाए तो यहां सम्राट अशोक द्वारा बनवाया गया अशोक स्तंभ ( 268 से 232 ईसा पूर्व ) हो या नंद वंश (344 से 322 ईसा पूर्व ) की नगरी के रूप में इसकी ख्याति- दोनों ही इसे विशेष बनाते हैं। गांधी द्वारा चलाया गया सत्याग्रह आंदोलन भी इसी भूमि से प्रेरित हुआ था. इसकी सांस्कृतिक पहचान भी इसे अन्य जिलों से अलग बनाती है। नंदनगढ़  के अवशेष आज भी इसकी ऐतिहासिकता के प्रतीक के रूप में खड़ा है।

यहां हम बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले (लौरिया) में शुगर (चीनी) फैक्ट्री के कारण किसानों पर होने वाले प्रभाव को रेखांकित करने का प्रयास कर रहे हैं। यह उत्तर में नेपाल, दक्षिण में गोपालगंज, पूर्व में पूर्वी चंपारण और पश्चिम में उत्तर प्रदेश के साथ अपनी सीमा साझा करता है। पश्चिमी चंपारण शुगर फैक्ट्रियों का एक प्रमुख केंद्र बनता जा रहा है।

वर्तमान में छह शुगर फैक्ट्रियां पश्चिमी चंपारण में कार्यरत हैं- ‘हरीनगर शुगर मिल्स’, ‘नरकटियागंज शुगर मिल्स’, ‘बगहा शुगर मिल्स’’, ‘लौरिया शुगर मिल्स’, ‘चनपटिया शुगर मिल्स’, और ‘मझौलिया शुगर मिल्स’।

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इन शुगर फैक्ट्रियों  ने यहां नकदी फसलों को बढ़ावा दिया, जिस कारण यहां रोजगार के कई बड़े अवसर भी विकसित हुए हैं और आर्थिक रूप से इस क्षेत्र को अधिक सक्रिय बनाया, लेकिन साथ ही इसने यहां के सामाजिक और आर्थिक जीवन पर कई अनपेक्षित प्रभावों को भी जन्म दिया।

जैसे इन उद्योगों से बड़े किसानों को तो निश्चित रूप से लाभ मिला, लेकिन छोटे और मझोले किसानों के लिए यह अधिक लाभप्रद नहीं रह पाया, क्योंकि गन्ने की कृषि के लिए बड़े स्तर पर पूंजी और श्रम की जरूरत होती है, और जिसे बड़े किसान ही पूरा कर सक्ने  मे सक्षम हो पाते हैं. खेती के लिए बड़ी मशीनों की आवश्यकता होती है, जो प्रायः वृहद भू-स्वामियों के पास ही उपलब्ध होता है।

इसके अलावा शुगर फैक्ट्रियां किसानों को खरीफ और रबी फसलों से दूर ले जाती जा रही हैं और नगदी फसलों की ओर आकर्षण पैदा कर रही हैं। आज किसान अपनी परंपरागत कृषि को छोड़कर नकदी फसलों के जाल में फंसता जा रहा है। इसने फसलों की विविधता को गंभीर रूप से प्रभावित किया। जैसे, जो किसान एक साल में तीन फसलों का उत्पादन करता था, आज वह एक साल में केवल एक ही फसल का उत्पादन कर रहा है, क्योंकि गन्ने की फसल की उपज के लिए किसानों को पूरे एक वर्ष का इंतजार करना पड़ता है।   

रोजगार के क्षेत्र में भी इसका असर पड़ा है। परंपरागत कृषि में मजदूरों को एक साल में तीन बार रोजगार (धान, गेहूं और दलहन आदि) के अवसर मिलते थे, लेकिन अब वे सीमित होकर साल में केवल एक बार ही रह गए हैं।

इसके चलते प्रवासी मजदूरों की संख्या बढ़ती जा रही है। ऐसे वहां के एक छोटे किसान सोहन शर्मा (नाम परिवर्तित) जो की पश्चिमी चंपारण के लौरिया से संबधित है। उनसे मैंने इस विषय पर बात की तो पाया की उनको केवल कुछ खास महीने मे ही रोजगार मिल पाता था, बाकी दिनों के रोजगार के लिए प्रवास ही करना पड़ता था।

महिलाओं पर इसके प्रभाव को देखें तो वे इससे अधिक प्रभावित हुई हैं। परंपरागत कृषि, अर्थात भरण-पोषण आधारित कृषि में महिलाओं को एक साल में तीन बार रोजगार (धान, गेहूं और दलहन ) के अवसर प्राप्त होते थे।

आज नगदी फसलों के उत्पादन में बढ़ोतरी ने महिलाओं को खेती में मिलने वाले रोजगार के अवसरों से दूर कर दिया है। नगदी फसल के उत्पादन में महिलाएं सांस्कृतिक बाध्यता के कारण अपने परिवार के साथ उस कार्य को स्थानीय स्तर पर नहीं कर पाती हैं, क्योंकि उनके परिवार के पुरुष भी उसी कार्य में लगे होते हैं।

इसलिए ज्यादातर पुरुषों को ही इस कार्य में अवसर मिल पाता है, जिसके कारण महिलाएं खेती के कार्य से अलगाव महसूस कर रही हैं. तथा घरेलू निर्णय मे, उनकी भूमिका कम होती जा रही है, क्योंकि अब वे अर्थोपार्जन मे कोई बड़ी भूमिका नहीं निभा पा रही।

अगर सांस्कृतिक संदर्भ मे देखें तो जब खरीफ फसल (धान) की रोपनी शुरू होती थी तो महिलाओं और पुरुषों दोनों वर्गों को रोजगार के समान अवसर प्राप्त होते थे। रोपनी के दौरान जब इंद्र देव आसमान में छाए होते हैं, तब महिलाएं और पुरुष उनके स्वागत में क्षेत्रीय गीत गाते थे।

एक तरफ इंद्र देव की छाया और दूसरी तरफ क्षेत्रीय गीतों की गूंज; यह दृश्य काफी मनमोहक होता था . महिलाएं और पुरुष दोनों साथ मिलकर कजरी, झुमर जैसे क्षेत्रीय गीत गाते थे. इस दौरान उनके बीच एक भावनात्मक जुड़ाव देखने को मिलता था. लेकिन उधोग ने कृषि के इस सांस्कृतिक पक्ष को धूमिल कर दिया है.  कृषि जो सांस्कृतिक क्रिया थी अब मात्र एक आर्थिक क्रिया बनकर रह गई है।

शुगर फैक्ट्री बनने से पर्यावरण पर भी इसका प्रभाव काफी चिंताजनक दिखाई देता है. क्योंकि फैक्ट्रियों से निकलने वाली प्रदूषित गैस भी वायुमंडल को काफी क्षति पहुंचा रही है, जिसके कारण वर्षा के चक्र पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

इसके अतिरिक्त, फैक्ट्रियों से निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थों का उचित प्रबंधन न होने के कारण वे खेतों की उर्वराशक्ति को भी समाप्त कर देते हैं. प्रायः इन अपशिष्ट पदार्थों को किसी न किसी उपजाऊ भूमि पर छोड़ दिया जाता है, और जिस भूमि पर एक बार इन्हें छोड़ा जाता है वह भूमि लंबे समय तक बंजर हो जाती है।

तथा इसके प्रभाव से गन्ने की फसलों के उत्पादन से मिट्टी की उर्वरा शक्ति खत्म होती जा रही है, क्योंकि नए कीटनाशक और रासायनिक दवाओं का उपयोग प्रचुर मात्रा में हो रहा है , जिससे की  मिट्टी में पाए जाने वाले अन्य उपजाऊ जीवाणु भी नष्ट हो जाते हैं तथा इसका सीधा प्रभाव छोटे किसानों पर पड़ रहा है, क्योंकि उनके  पास भूमि का छोटा हिस्सा होता है, जिससे वह केवल जीवन-निर्वहन के लिए ही खेती कर पाते हैं।

निश्चय ही इन फैक्ट्रीयों की अपनी एक आर्थिक उपयोगिता है, लेकिन यह जरूरी है कि इसके प्रबंधन और संचालन को इस तरह से किया जाए ताकि यह एक समावेशी और सतत विकास का मानक बनें।

लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज में समाजशास्त्र विभाग के शोध छात्र हैं

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