फोटो: विकास चौधरी
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कपास किसानों के हितों की रक्षा, एक छलावा!

पिछले कुछ सालों से कपास की खेती का रकबा और इसका सालाना उत्पादन दोनों कम होता जा रहा है। भारत में कपास की खेती धीरे-धीरे अपना आकर्षण खो रही है
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7 अगस्त, 2025 को कृषि वैज्ञानिक एम.एस. स्वामीनाथन के अंतर्राष्ट्रीय जन्म शताब्दी समारोह के अवसर पर बोलते हुए प्रधानमंत्री ने कहा, “हमारे लिए अपने किसानों का हित सर्वोच्च प्राथमिकता है. भारत अपने किसानों के, पशु-पालकों के और मछुआरे भाई बहनों के हितो के साथ कभी भी समझौता नहीं करेगा और मैं जानता हूं व्यक्तिगत रूप से मुझे बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी, लेकिन मैं इसके लिए तैयार हूंं। मेरे देश के किसानों के लिए, मेरे देश के मछुआरों के लिए, मेरे देश के पशुपालकों के लिए, भारत आज तैयार खड़ा है। हम किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में लगातार काम कर रहे हैंं।”

लेकिन इस भाषण के चंद दिनों बाद ही उनकी सरकार ने कच्चे कपास के आयात पर लगने वाले सभी सीमा शुल्कों को 19 अगस्त 2025 से 30 सितम्बर 2025 तक के लिए अस्थायी तौर पर हटा दिया। यह छूट कपड़ा उद्योग को समर्थन देने के लिए उनकी मांग पर दी गई। बाद में इसे बढ़ा कर 31 दिसंबर 2025 तक कर दिया गया।

भारत में कच्चे कपास के आयात पर 11 प्रतिशत आयात शुल्क लगता था, जिसमें 5 प्रतिशत बेसिक कस्टम ड्यूटी, 5 प्रतिशत कृषि संरचना और विकास कर और दोनों पर 10 प्रतिशत सामाजिक कल्याण सरचार्ज शामिल था। यह शुल्क कपास किसानों के हितों की रक्षा के लिए 2 फरवरी, 2021 से लगाया गया था।

भारत सरकार के इस कदम की न केवल भारतीय कपड़ा उद्योग ने, बल्कि अमेरिकी कृषि विभाग (यूएसडीए) ने भी सराहना की। इस संदर्भ में यूएसडीए ने जो आधिकारिक बयान जारी किया उसमे कहा कि इससे "अमेरिकी कपास की बुकिंग बढ़ेगी"। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) के संस्थापक अध्यक्ष अजय श्रीवास्तव का कहना है कि अमेरिका "इस छूट का सबसे बड़ा लाभार्थी होगा।"

संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा भारत में कपास का सबसे अधिक निर्यात किया जाता है। छूट देने का यह समय अमरीकी कपास किसानों के लिए जितना मुफीद है। भारतीय कपास किसानों के लिए उतना ही नुकसानदेह हैहै, क्योंकि अमेरिका में कपास की नई फसल अगस्त से बाजार में आनी शुरू हो जाती है और भारत में अक्टूबर से।

अगस्त और सितंबर भारतीय कपास किसानों के लिए सबसे अधिक लाभदायक महीने हो सकते थे, जब उन्हे उनकी उपज के लिए अच्छी कीमतें मिलने की संभावना थी। अब, आयातित कपास की आमद से घरेलू कपास की कीमतें भी गिर जाएंगी।

इस छूट की सूचना जारी होने के दिन ही कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (सीसीआई) ने कपास की फ्लोर प्राइस 600 रुपए प्रति कैंडी (1 कैंडी = 356 किग्रा) कम कर दी और अगले दिन फिर 500 रुपए प्रति कैंडी की कमी की।

इस तरह, सिर्फ 10 दिनों के अंदर सरकार ने खुद ही कपास के फ्लोर प्राइस को कुल 1,700 रुपए प्रति कैंडी कम कर दिया। इसके बावजूद कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सीएआई) के अतुल गडात्रा ने प्रेस को बताया, "सीसीआई की कीमतें अभी भी मिलों की उम्मीदों से ज्यादा हैं, इसलिए सीसीआई को अपनी कीमतें कम से कम 2,000 रुपए प्रति कैंडी और कम करनी होंगी।"

कपास उत्पादन में संयुक्त राज्य अमेरिका दुनिया में तीसरे स्थान पर है। वहां घरेलू कपास की खपत बहुत कम है। अमरीका कुल उत्पादन का लगभग 85 प्रतिशत कपास निर्यात करता है।

चीन पहले अमेरिकी कपास का सबसे बड़ा आयातक था, लेकिन ट्रंप के टैरिफ के चलते चीन अमरीकी कपास का आयात कम कर रहा है। इसलिए संयुक्त राज्य अमेरिका एक वैकल्पिक बाजार की तलाश में था, जो उसे भारत में मिल सकता था।

भारत, दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कपास उत्पादक मुल्क है. यहा कुल उत्पादन के 95 प्रतिशत कपास की घरेलू खपत है और 5 प्रतिशत की बचत भी, लेकिन उच्च गुणवत्ता वाले या अति लंबे रेशे के कपास (ईएलएस) का उत्पादन बहुत कम है। इसकी मांग को आयात के जरिए पूरा किया जाता है।

एक अमेरिकी कृषि व्यापार निकाय कॉटन काउंसिल इंटरनेशनल इस आयात शुल्क को हटवाने की कोशिश शुरू से ही कर रहा था।

अमेरिका में उगाए गए पीमा कॉटन को बढ़ावा देने वाला एक गैर-लाभकारी लक्जरी ब्रांड सुपिमा के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मार्क लेवकोविट्ज ने कहा था, "हम इसे अमेरिकी पाइमा (उच्च गुणवत्ता वाले कपास) या 32 मिलीमीटर या उससे ज़्यादा लंबे रेशे वाले कपास के आयात से हटवाने में सफल रहे हैं, लेकिन छोटे रेशे के कपास के आयात पर यह शुल्क अभी भी है।"

दरअसल, भारत सरकार ने उच्च गुणवत्ता वाले या अति लंबे रेशे के कपास (ईएलएस) के आयात पर से 11 प्रतिशत कस्टम ड्यूटी 20 फरवरी, 2024 से हटा दी, लेकिन यह छोटे रेशे के कपास के आयात पर लगती रही। मार्क लेवकोविट्ज इसी का जिक्र कर रहे थे। उन्होंने यह बयान जून 2024 में कॉटन काउंसिल इंटरनेशनल द्वारा आयोजित एक गोलमेज बैठक के दौरान प्रेस को दिया था।

इस कदम से सरकार भारतीय कपड़ा निर्यातकों के मुनाफे को कुछ हद तक सुरक्षित तो कर लेगी, लेकिन इसका खामियाजा निश्चित रूप से भारतीय किसानों को भुगतना पड़ेगा, जो किसी भी तरह से उचित नहीं है, खासकर तब जब सरकार किसानों के कल्याण और उनकी आय दोगुनी करने का दावा बड़े जोर-शोर से कर रही है।

इस प्रेस विज्ञप्ति में सरकार ने कपड़ा निर्माताओं और उपभोक्ताओं दोनों के हितों की बात की, लेकिन कपास किसानों का जिक्र करना भूल गई थी, लेकिन जब 28 अगस्त 2025 को दूसरी प्रेस रिलीज जारी की, जिसके तहत छूट की अवधि 30 सितंबर 2025 से बढ़ा कर 31 दिसंबर 2025 तक की गई। उसमें यह जोर देकर कहा गया है, "आयातित कपास अक्सर खास औद्योगिक जरूरतों को पूरा करता है और वह घरेलू कपास का विकल्प नहीं है।"

लेकिन जब खास औद्योगिक जरूरतों को पूरा करने वाले उच्च-गुणवत्ता के कपास (ईएलएस) के आयात को पहले ही किसी भी तरह की इंपोर्ट ड्यूटी से मुक्त कर दिया गया था, तो उसका जिक्र इस प्रेस रिलीज में करना एक भ्रम पैदा करता है।

हालांकि, इस बार किसानों के हितों का बहुत अच्छे से ध्यान रखा गया. इस संदर्भ में कहा गया कि "किसानों के हितों की रक्षा कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (सीसीआई ) द्वारा संचालित न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तंत्र के माध्यम से की जाती है, जो यह सुनिश्चित करता है कि किसानों को उनकी उत्पादन लागत से कम से कम 50 प्रतिशत अधिक मूल्य प्राप्त हो।"

लेकिन पहले भारत में कपास की खेती के हालात पर एक संक्षिप्त नजर डालना बहुत जरूरी है। यहां कपास की खेती मुख्य रूप से 99 प्रतिशत खरीफ फसल के रूप में की जाती है।

तमिलनाडु और उसके पड़ोसी राज्यों के कुछ हिस्सों में इसे रबी फसल के रूप में उगाया जाता है। भारत दुनिया का एकमात्र देश है- जहां कपास की सभी चारों प्रजातियां- गॉसिपियम आर्बोरियम, गॉसिपियम हर्बेसियम, गॉसिपियम बारबाडेंस और गॉसिपियम हिर्सुटम उगाई जाती हैं, जिनमें से पहली दो को एशियाई कपास, तीसरी को मिस्र की कपास और आखिरी को अमेरिकी या अपलैंड कपास के नाम से भी जाना जाता है।

भारत में कुल 60 लाख किसान परिवार कपास की खेती से अपनी आजीविका चलाते हैं। इसके अलावा 4-5 करोड़ अन्य लोग भी इसके व्यापार संबंधी दूसरी गतिविधियों से जुडे़ हुए रहते हैं।

वर्ष 2024-25 में कुल 114.47 लाख हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि पर कपास की खेती की गई थी, जो दुनिया के कुल 314.79 लाख हेक्टेयर कपास की खेती के क्षेत्र का 36.36 प्रतिशत है।

कपास की खेती के क्षेत्रफल के मामले में भारत दुनिया में पहले स्थान पर है और उत्पादन के मामले में चीन के बाद दूसरे स्थान पर है, लेकिन यहां इसकी औसत उपज 437 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है, जो दुनिया की औसत उपज 833 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की तुलना में बहुत कम है।

पिछले कुछ सालों से कपास की खेती का रकबा और इसका सालाना उत्पादन दोनों कम होता जा रहा है। यह साल 2024-25 में पिछले दस सालों में सबसे कम रहा। ऐसा लगता है कि भारत में कपास की खेती धीरे-धीरे अपना आकर्षण खो रही है। अगर हालात ऐसे ही रहे तो भारत जल्द ही नेट एक्सपोर्ट करने वाले देश के बजाय नेट इंपोर्ट करने वाला देश बन सकता है।

तो क्या न्यूनतम समर्थन मूल्य के जरिए किसानों के हितों की रक्षा असरदार तरीके से हो पा रही है। जैसा कि नाम से ही पता चलता है, न्यूनतम समर्थन मूल्य किसानों की उपज का वह मूल्य है जिसे सरकार समय-समय पर इस तरह निर्धारित करती है, ताकि उन्हें अपनी फसलों का उचित मूल्य मिले।

कपास के मामले में इसे सुनिश्चित करने के लिए सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सीधा किसानों से कपास खरीदती है। यह कार्य कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया द्वारा लगभग 550 केंद्रों के माध्यम से किया जाता है।

यहां दो सवाल हैं: पहला-क्या सरकार द्वारा समय-समय पर तय किया जाने वाला न्यूनतम समर्थन मूल्य वास्तव में किसानों की उपज का उचित मूल्य है? दूसरा, सरकार इस कीमत पर कितने किसानों से कितनी मात्रा में कपास खरीदती है?

न्यूनतम समर्थन मूल्य का निर्धारण ए-2+एफएल फार्मूले के आधार पर किया जाता है, जबकि किसान संगठन इसका निर्धारण डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन द्वारा सुझाए गए सी-2 फॉर्मूले के आधार पर करने की मांग करते आ रहे हैं।

न्यूनतम समर्थन मूल्य को मंजूरी कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी) की सिफारिशों के आधार पर आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति देती है, जिसकी अध्यक्षता कोई और नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री खुद करते हैं, जो "किसानों के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता" देने और किसानों की आय दोगुनी करने के का दावा करते हैं।

उदाहरण के लिए, मध्यम रेशे वाली कपास के लिए ए-2+एफL फॉर्मूले के आधार पर तय की गई एमएसपी कपास वर्ष 2024-25 के लिए 7121 रुपए प्रति क्विंटल है और किसान संगठनों के अनुसार यह सी-2 फॉर्मूले के आधार पर 10,075 रुपए प्रति क्विंटल होनी चाहिए। बाजार की कीमत तो अक्सर एमएसपी से भी कम रहती है।

कपास किसानों को सरकारी सहायता के देने के तौर पर सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य पर उनसे कितना कपास खरीदती है यह जानने के लिए कपास के कुल उत्पादन और सीसीआई द्वारा उनसे एमएसपी पर की गई कपास की खरीददारी का पिछले दस सालों का आंकडा नीचे तालिका-1 में देखा जा सकता है।

पिछले 10 वर्षो में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर की गई सरकारी खरीद
क्रम स.  वर्ष         उत्पादन (लाख गांठो में) सरकारी खरीद (लाख गांठो में) मूल्य (करोड रूपये में) किसानो की संख्या जिनसे खरीद की गई. (लाख में)      
1 2015-16 332 8.95 1928.12 2.02
2 2016-17 351 0 0 0
3 2017-18 370 3.91 899.45 0.89
4 2018-19 333 10.78 2995.65 2.4
5 2019-20 365 124.61 33554.47 24.95
6 2020-21 352.48 99.33 28821.71 20.51
7 2021-22 311.17 0 0 0
8 2022-23 336.6 0 0 0
9 2023-24 325.22 32.84 11712 7.25
10 2024-25 294.25 100.16 37436.73 20.77
Total 3370.72 380.58 117348.13 78.79

नोट:- कपास वर्ष 2016-17, 2021-22 और 2022-23 में बाजार में कपास की कीमतें एमएसपी से ज़्यादा थीं, इसलिए किसानों को किसी सहायता की जरूरत नहीं पड़ी।

स्रोत:- पीआईबी द्वारा जारी दिनांक 12.08.2025 की प्रेस रिलीज और 24.03.2025 को सम्पन्न हुई सीओसीपीसी मीटिंग में प्रस्तुत रिपोर्ट का अनुलग्नक-IV

इस तालिका से स्पष्ट है कि पिछले 10 सालों में भारत में कपास का कुल उत्पादन 3370.72 लाख गांठे (1गांठ=170 किलोग्राम) रहा, और एमएसपी पर कुल खरीद सिर्फ 380.58 लाख गांठो की गई है।

इसके अनुसार, औसत कपास उत्पादन 337 लाख गांठ प्रति वर्ष है, और एमएसपी पर खरीद 38 लाख गांठ प्रति वर्ष है जो कुल उत्पादन का सिर्फ 11.27 प्रतिशत है और भारत में कपास की खेती करने वाले 60 लाख किसानों में से औसतन सिर्फ 7.88 लाख किसानों से ही एमएसपी पर हर साल कपास खरीदा जाता है।

आर्थिक नजरिए से पिछले 10 सालों में सरकार ने कपास किसानों को सरकारी सहायता के देने के तौर पर उनसे कपास की खरीद पर कुल 117,348.13 करोड़ रुपए खर्च किए।

पहली बात यह कि यह कोई बहुत बडी रकम नहीं है, और दूसरी बात कि यह खर्च कोई खर्च भी नहीं है। यह तो एक निवेश की तरह है, क्योंकि सीसीआईसीआई खरीदे गए कपास को बाजार में बेच देता है।

कपास किसानों को दी जाने वाली यह सरकारी सहायता हर लिहाज से नाकाफी है। इस तथाकथित सरकारी मदद की रकम से कई गुना बडी रकम, कार्पोरेट घरानो और पूंजीपतियों के  कर्ज को सरकार ने बीते 10 सालों में माफ कर दिया है। जिसका सालाना विवरण नीचे दी गई तालिका-2 में देखा जा सकता है:

पिछले 10 वर्षो में माफ किया गया ऋण (करोड रूपए में)    
क्रम सं. वर्ष कुल रकम बडे उद्योग घरानो की रकम
1 2014-15 58786 31723
2 2015-16 70413 40416
3 2016-17 108373 68308
4 2017-18 161328 99132
5 2018-19 236265 148753
6 2019-20 234170 159139
7 2020-21 204272 127050
8 2021-22 175178 69532
9 2022-23 216324 114528
10 2023-24 170270 68366
Total 1635379 926947

स्रोत: लोकसभा सांसद श्री अमरा राम द्वारा पूछे गए तारांकित प्रश्न संख्या 227 का वित्त मंत्री द्वारा 17.03.2025 को दिया गया लिखित उत्तर.

इस तालिका से स्पष्ट है कि इन 10 सालों में माफ किए गए कुल कर्ज 16.35 लाख करोड़ रुपए में से 9.26 लाख करोड़ रुपए बडे उद्योग या कार्पोरेट घरानों का है, जिनमें से 29 बडे़ उद्योग घराने ऐसे हैं जिनमें से हर एक का कर्ज 1,000 करोड़ से ज्यादा था और कुल रकम 61027 करोड़ रुपए थी।

इन दोनों तालिकाओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि सरकार ने औसतन हर साल जितना कुल कर्ज माफ किया, उसका 10वां हिस्सा भी कपास किसानों को कथित सहायता देने पर खर्च नहीं किया, जो वस्तुत: खर्च भी नहीं होता।

कर्ज में डूबे किसानों की दशा बहुत दयनीय है। वे छोटे-छोटे कर्ज भी चुकता कर पाने में समर्थ नहीं होने के कारण आत्महत्या कर रहे हैं। इस साल के पहले तीन महीनों में, महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में जो कपास का इलाका है, कुल 767 किसानों ने आत्म हत्या कर ली। भारत में हर दिन औसतन 30 किसान आत्महत्या करते हैं। लेकिन, इसकी किसे परवाह!

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