कपास का शाप: गुलाबी सुंडी को नियंत्रित करने में मददगार साबित हो सकती है यह तकनीक

परीक्षणों से पता चला है कि इस तकनीक की मदद से नुकसान में 90 फीसदी की कमी आई है और पैदावार बेहतर हुई है
गुलाबी सुंडी द्वारा खाए कपास के फल को दिखाता एक किसान; फोटो: विकास चौधरी/सीएसई
गुलाबी सुंडी द्वारा खाए कपास के फल को दिखाता एक किसान; फोटो: विकास चौधरी/सीएसई
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देश के कपास उत्पादक राज्यों में किसान गुलाबी सुंडी से निपटने के लिए जूझ रहे हैं, जो फसलों पर कहर बनकर टूटा है। गुलाबी सुंडी को पिंक बॉलवर्म (पीबीडब्ल्यू) के नाम से भी जाना जाता है। हाल के वर्षों में देखें तो इस कीट ने किसानों को भारी नुकसान पहुंचाया है। यहां तक की आनुवंशिक रूप से संशोधित कीट-प्रतिरोधी कपास की किस्म, बीटी कॉटन (बोलगार्ड II बीज), भी उसे रोकने में कामयाब नहीं रही है। हालांकि बीटी कपास की इस किस्म को गुलाबी सुंडी जैसे कीटों से बचाने के लिए ही बनाया गया था।

डाउन टू अर्थ द्वारा इसकी जमीनी हकीकत को समझने के लिए की गई पड़ताल से पता चला है कि हरियाणा, राजस्थान और पंजाब में इसकी वजह से कपास की पैदावार को 80 से 90 फीसदी का नुकसान हुआ है। 

गौरतलब है कि गुलाबी सुंडी एक ऐसा कीड़ा है, जो कपास के विकसित होते फलों पर अंडा देता है। इस तरह वो फलों के कुछ हिस्से को नुकसान पहुंचाता है। लार्वा इसे चट करने के लिए बीजों के गोलाकार कोष में प्रवेश कर जाते हैं, जिन्हें बॉल्स कहा जाता है। इसके अंदर वो कीटनाशकों से सुरक्षित हो जाते हैं क्योंकि कीटनाशकों के छिड़काव का उसके अंदर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

आईसीएआर-सेंट्रल इंस्टीट्यूट फॉर कॉटन रिसर्च, नागपुर के निदेशक वाईजी प्रसाद ने डीटीई को जानकारी दी है कि वैज्ञानिक गुलाबी सुंडी के खिलाफ प्रभावी नई जीन की खोज का प्रयास कर रहे हैं। प्रसाद का कहना है कि, "इसके लिए उन्होंने पौधों के 8,000 नमूनों की जांच की है, ताकि ऐसे पौधों का पता लगाया जा सके जो प्राकृतिक रूप से गुलाबी सुंडी के खिलाफ प्रभावी हैं।“ हालांकि उन्होंने माना कि कपास को अधिक प्रतिरोधी बनाने के लिए उन्हें ट्रांसजीन या जीन एडिटिंग जैसी तकनीकों की आवश्यकता पड़  सकती है।

उन्होंने बताया कि जीन की पहचान होने और नई किस्म विकसित होने के बाद भी विभिन्न परीक्षणों से गुजरने में वक्त लगेगा। साथ ही इसके लिए जेनेटिक मैनिपुलेशन और जेनेटिक इंजीनियरिंग के मूल्यांकन के लिए बनाई समीक्षा समिति से मंजूरी हासिल करने और सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र के बीच साझेदारी विकसित करने में समय लगेगा।

प्रसाद ने तत्काल समाधान के रूप में यह सुझाव दिया कि हमें फसलों पर बारीकी से नजर रखने और फसलें कब बढ़ रही है उस समय के आधार पर कीट प्रबंधन योजना का उपयोग करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

वहीं वैज्ञानिकों का एक दल एक ऐसी तकनीक पर परीक्षण कर रहा है जो अमेरिका में सफल साबित हुई है। दक्षिण एशिया जैव प्रौद्योगिकी केंद्र, जोधपुर (राजस्थान) के संस्थापक-निदेशक भागीरथ चौधरी का कहना है कि इस तकनीक को पीबीकेनॉट या पीबी रोप एल कहा जाता है।

उनके मुताबिक इस तकनीक ने अमेरिकी किसानों की उस कीट से निपटने में मदद की थी, जो पिछले 100 वर्षों से किसानों को प्रभावित कर रहा था। अमेरिकी किसान 2008 में इस तकनीक का उपयोग करने के बाद 2018 में इस कीट से छुटकारा पाने में कामयाब रहे थे।

चौधरी के मुताबिक, गुलाबी सुंडी दुनिया भर में करीब 1.2 करोड़ हेक्टेयर जमीन पर उगाई कपास की पैदावार को प्रभावित कर रही है। इतना ही नहीं इसकी वजह से कपास की गुणवत्ता में भी गिरावट आ रही है। उनका कहना है कि केंद्र 2022 से भारत में एक नई तकनीक पर काम कर रहा है, जो बहुत सफल रहा है। इसकी वजह से घाटे में 90 फीसदी की गिरावट आई है।

यह तकनीक, जो गुलाबी सुंडी की आबादी को नियंत्रित करने की रणनीतियों का एक हिस्सा है, इसे भारत में 2019-20 के दौरान पहली बार केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड और पंजीकरण समिति से आधिकारिक मंजूरी मिली थी।

उनका कहना है कि, "प्रोजेक्ट 'बंधन' के तहत इस तकनीक पर प्रयाग किए जा रहे हैं और इसके लिए कृषि विज्ञान केंद्र, कृषि विश्वविद्यालयों और स्थानीय संस्थानों के साथ मिलकर काम किया जा रहा है।" उनके अनुसार इसके तहत पतंगों के मेटिंग साइकिल को बाधित करना शामिल है।

इस तकनीक में नर कीट को आकर्षित करने के लिए 20 सेंटीमीटर की प्लास्टिक की बनी रस्सी का उपयोग किया जाता है, जिसमें छोटे-छोटे छिद्र होते हैं। इसमें फेरोमोन गॉसीप्लर नामक एक रसायन होता है जिसे मादा पतंगें नरों को आकर्षित करने के लिए छोड़ती हैं। चौधरी का कहना है कि “प्राकृतिक तापमान में यह रस्सी फैलती है और इसमें मौजूद छोटे छिद्र केमिकल को हवा में छोड़ देते हैं।“

“यह रसायन नर पतंगों को भ्रमित करता है और उन्हें असली मादा पतंगों को ढूंढने से रोकता है। इस तरह यह तकनीक उनकी मेटिंग प्रक्रिया और प्रजनन चक्र को बाधित करती है। इसके कारण पतंगों की आबादी में गिरावट आ जाती है और फसलों को होने वाला नुकसान घट जाता है।“

उनका आगे कहना है कि, "इन रस्सियों को तब लगाया जाता है जब फसल 45 दिनों की हो जाती है। इन्हें खेतों के किनारों और अंदर पौधों से बांध दिया जाता है।  आमतौर पर, प्रति एकड़ में करीब 160 रस्सियों का उपयोग किया जाता है। उन्हें करीब  25 वर्ग मीटर की दूरी पर लगाया जाता है।" उन्होंने समझाया कि यह तकनीक कपास के बड़े खेतों में सबसे अच्छा काम करती है, जो कम से कम 40-50 एकड़ के होते हैं।

वे नर पतंगों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए भी फेरोमोन ट्रैप का उपयोग करते हैं। साथ ही इनकी मदद कपास के पौधों में फूल कब आते हैं और हरे रंग के बीजकोष कब निकलते हैं, इसके लिए भी ली जाती है। उन्होंने कहा है कि 2022 में, इस पद्धति ने भारत में 18 अलग-अलग स्थानों पर 1,100 एकड़ भूमि पर कीटों की गतिविधियों को 90 फीसदी तक सफलतापूर्वक कम कर दिया था।

इसकी वजह से कपास की गुणवत्ता में सुधार के साथ-साथ, उपज में प्रति एकड़ डेढ़ क्विंटल का सुधार आया था। उन्होंने बताया कि “इस साल, गुजरात, महाराष्ट्र, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में 11 स्थानों पर 710 एकड़ जमीन पर इसका परीक्षण किया जा रहा है।“चौधरी के मुताबिक भारत सरकार को इस जैव प्रौद्योगिकी उपकरण को अपनाने के साथ-साथ इसे व्यापक पैमाने पर सफल बनाने के लिए भारत के सभी कपास उत्पादक क्षेत्रों में उपयोग करने की आवश्यकता है।

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