हिमाचल प्रदेश की वन भूमि पर ग्लाइफोसेट का अवैध छिड़काव कर हो रही मटर की खेती, दर्ज होगी एफआईआर

डीएफओ के अनुसार, जो लोग इसके लिए जिम्मेदार हैं, उन्हें भी ढूंढकर कार्रवाई की जा रही है। दोषियों के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज कराई जाएगी
शिकायत पर वन विभाग के अधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर नष्ट किए खेत। फोटो: गुमान सिंह
शिकायत पर वन विभाग के अधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर नष्ट किए खेत। फोटो: गुमान सिंह
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सारांश

  • वन विभाग के अनुसार, रुटीन चेकिंग और पेट्रोलिंग के दौरान हमें ऐसी गतिविधियों की जानकारी मिलती रहती है। बड़े पैमाने पर तो नहीं लेकिन कुछ जगहों पर ऐसे मामले सामने आए हैं

  • इस खतरनाक खरपतवार नाशक को भारत में कीटनाशक अधिनियम, 1968 के तहत सिर्फ चाय के बागानों में खरपतवार को नियंत्रित करने के लिए मंजूरी मिली थी

  • इसका गैर-कानूनी इस्तेमाल कई तरह की खाद्य और गैर-खाद्य फसलों, घरों और संस्थानों के परिसरों में खरपतवार हटाने और हर जगह अनचाही वनस्पति को खत्म करने के लिए किया जा रहा है

  • ग्लाइफोसेट हार्मोन को बाधित करने की क्षमता रखता है। ग्लाइफोसेट और ग्लाइफोसेट आधारित यौगिकों वाले शाकनाशी एस्ट्रोजेनिक मार्गों में जेन रिसेप्टर और अणुओं को बदल सकते हैं जिससे महिलाओं में कई स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पैदा हो सकती हैं

हिमाचल प्रदेश के मंडी सहित अन्य कई जिलों में वन विभाग की जमीन पर अत्यधिक खतरनाक कीटनाशक ग्लाइफोसेट के छिड़काव पर पर्यावरणविदों ने गंभीर चिंता जताई है। उनका कहना है कि यह खतरनाक रसायन राज्य की जैव विविधता और मानव स्वास्थ्य पर बेहद प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। साथ ही कैंसर का कारण बन सकता है।

हिमालय नीति अभियान के संयोजक गुमान सिंह ने बताया कि हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के नाचन फॉरेस्ट डिवीजन के तहत थाची ​​रेंज में वन भूमि पर मटर की फसल लेने के लिए घास और पौधों को हटाने हेतु ग्लाइफोसेट हर्बिसाइड का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर हो रहा है।

गुमान सिंह के मुताबिक, अब वन विभाग के अधिकारी इस फसल को नष्ट कर रहे हैं, लेकिन वे वन भूमि पर ग्लाइफोसेट के इस्तेमाल और जैव-विविधता के विनाश को रोकने में नाकाम रहे हैं। उनका कहना है कि ग्लाइफोसेट का यह इस्तेमाल घोर अपराध है जो जन स्वास्थ्य, पशुधन तथा वन्यजीव और वनस्पति को भारी नुकसान पहुंचाता है।

दर्ज होगी एफआईआर

मंडी के डिवीजनल फॉरेस्ट ऑफिसर (डीएफओ) एसएस कश्यप ने डाउन टू अर्थ को इस संबंध में बताया कि रुटीन चेकिंग और पेट्रोलिंग के दौरान हमें ऐसी गतिविधियों की जानकारी मिलती रहती है। उनका कहना है कि बड़े पैमाने पर तो नहीं लेकिन कुछ जगहों पर ऐसे मामले सामने आए हैं। वह बताते हैं कि हमने इन पर नजर रखने के लिए टीमें गठित की हैं, जो मौके पर जाकर जांच कर रही हैं। एक-दो जगहों पर ऐसी गतिविधियां मिली थीं, जिन्हें नष्ट कर दिया गया है।

उनका कहना है कि बरसात के समय, जब मटर आदि की फसलों का सीजन होता है, उस दौरान इस तरह की प्रैक्टिस देखने को मिलती है। इस बार इस पर काफी हद तक नियंत्रण है। वह बताते हैं कि जो लोग इसके लिए जिम्मेदार हैं, उन्हें भी ढूंढकर उनके खिलाफ कार्रवाई की जा रही है। दोषियों के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज कराई जाएगी।

वह आगे बताते हैं कि कई बार लोग अपनी जमीन के आसपास या दूसरी जगहों पर बीज डाल देते हैं। जब बीज डाला जाता है, तब इसका पता नहीं चलता। पौधे निकलने के बाद ही इसकी जानकारी होती है। इसके बाद विभाग कार्रवाई करता है।

वह बताते हैं कि पिछले साल इस तरह के मामले सराज क्षेत्र में सामने आए थे। इस बार थाची से लेकर धारघाट वाले क्षेत्र में एक-दो जगह ऐसे मामले मिले हैं। वह मानते हैं कि ग्लाइफोसेट के इस्तेमाल से वन की मिट्टी पर पड़ सकता है और आसपास के जलस्रोत भी दूषित हो सकते हैं। इसलिए विभाग इस मामले को गंभीरता से ले रहा है।

पिछले कुछ सालों से वन भूमि की जमीन पर मटर की खेती का चलन शुरू हुआ है। फोटो: गुमान सिंह
पिछले कुछ सालों से वन भूमि की जमीन पर मटर की खेती का चलन शुरू हुआ है। फोटो: गुमान सिंह

गैर कानूनी इस्तेमाल

पेस्टीसाइड एक्शन नेटवर्क (पेन) इंडिया लंबे समय से ग्लाइफोसेट के दुष्प्रभावों को देखते हुए इसे प्रतिबंधित करने की मांग कर रहा है। उसके अनुसार, इस खतरनाक खरपतवार नाशक को भारत में कीटनाशक अधिनियम, 1968 के तहत सिर्फ चाय के बागानों में खरपतवार को नियंत्रित करने के लिए इस्तेमाल करने की मंजूरी मिली थी, लेकिन इसका गैर-कानूनी तरीके से कई तरह की खाद्य और गैर-खाद्य फसलों वाले खेतों, घरों और संस्थानों के परिसरों में खरपतवार हटाने और हर जगह अनचाही वनस्पति को खत्म करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।

कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय ने 21 अक्टूबर 2022 की एक राजपत्र अधिसूचना के जरिए देश में ग्लाइफोसेट के इस्तेमाल पर रोक लगाने का आदेश जारी किया था। नोटिफिकेशन के अनुसार, कीटनाशक अधिनियम, 1968 के तहत गठित रजिस्ट्रेशन कमिटी से सलाह-मशविरा करने और एक्सपर्ट कमिटी की रिपोर्ट पर विचार करने के बाद केंद्र सरकार इस बात से संतुष्ट है कि ग्लाइफोसेट के इस्तेमाल से इंसानों और जानवरों की सेहत को खतरा और जोखिम है।

आदेश में कहा गया था, “ग्लाइफोसेट के इस्तेमाल पर रोक है और पेस्ट कंट्रोल ऑपरेटरों (कीट नियंत्रण करने वालों) के अलावा कोई भी व्यक्ति ग्लाइफोसेट का इस्तेमाल नहीं करेगा।” आदेश को लागू करने के तहत सरकार ने रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट रखने वालों से कहा है कि वे आगे की प्रक्रिया के लिए सर्टिफिकेट वापस कर दें।

साथ ही यह भी कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति तीन महीने के अंदर रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट वापस नहीं करता है, तो कीटनाशक अधिनियम 1968 के तहत उचित कार्रवाई की जाएगी। आदेश में यह भी कहा गया है कि हर राज्य सरकार को इस मामले को देखना होगा और राज्य में इस आदेश को लागू करने के लिए अधिनियम और उसके तहत बने नियमों के प्रावधानों के अनुसार जरूरी सभी कदम उठाने होंगे।

पेस्टिसाइड एक्शन नेटवर्क इंडिया में पब्लिक पॉलिसी एक्सपर्ट और कंसल्टेंट एवं दिल्ली स्थित इम्पैक्ट एंड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट में विजिटिंग फैकल्टी (मानद) नरसिम्हा रेड्डी दोंथी डाउन टू अर्थ को बताते हैं कि यह मंत्रालय का ड्राफ्ट नोटिफिकेशन था और इसे फाइनल नहीं किया गया। इसलिए यह देशभर में लागू नहीं हो पाया। वह कहते हैं कि हिमाचल या अन्य स्थानों पर खरपतवारों को हटाने के लिए ग्लाइफोसेट का इस्तेमाल अवैध है क्योंकि इसका रजिस्ट्रेशन केवल चाय के बागानों के लिए हुआ है। वह कहते हैं कि मटर की खेती में इसका इस्तेमाल बहुत खतरनाक है और यह सीधे कैंसर की वजह बन सकता है। इसका छिड़काव करने वाले भी सुरक्षित नहीं हैं। उनका कहना है कि किसानों के इसके दुष्प्रभावों की जानकारी नहीं है। कंपनी कहती है कि इससे किसानों को नुकसान नहीं है लेकिन यह झूठ है।

पेन इंडिया की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्लाइफोसेट हार्मोन को बाधित करने की क्षमता रखता है। ग्लाइफोसेट और ग्लाइफोसेट आधारित यौगिकों वाले शाकनाशी एस्ट्रोजेनिक मार्गों में जेन रिसेप्टर और अणुओं को बदल सकते हैं जिससे महिलाओं में कई स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

पेन इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, 2015 में इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर द्वारा ग्लाइफोसेट को एक संभावित मानव कार्सिनोजेन (कैंसरकारी) के रूप में चिन्हित किया गया है। बाद में हजारों किसानों और कृषि श्रमिकों ने जिन्हें ग्लाइफोसेट आधारित राउंडअप के संपर्कों में आने के बाद कैंसर हुआ था, निर्माता पर मुकदमा दायर किया और मुआवजे के रूप में 10 मिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक प्राप्त किया। प्रसिद्ध शाकनाशी राउंडअप में कुख्यात सक्रिय घटक ग्लाइफोसेट के संपर्क में आने के बाद कैंसर के विकास के संबंध में अमेरिकी की विभिन्न अदालतों में हजारों मुकदमे चल रहे हैं।

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