अदालती कटघरे में हमारी थाली
भारत में खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए जिस हरित क्रांति का जश्न हम दशकों से मनाते आ रहे हैं, कहीं वह धीरे-धीरे हमारी नसों में जहर तो नहीं घोल रहा है? क्या उत्पादन और मुनाफे की अंधी दौड़ में हम अपने मानवीय मूल्यों की भी अनदेखी करने से नहीं चूक रहे हैं?
क्या विकास और लाभ की आड़ में कुछ कॉर्पोरेट और हमारी सरकारें आने वाली पीढ़ियों का भविष्य लील रहा है? ऐसे ही कई सवाल के जवाब ढूंढ़ने की कोशिश करती है डीके चेतन के निर्देशन में बनी फिल्म “द इंडिया स्टोरी: स्लो पाइजन इन प्रोग्रेस”।
फिल्म में एक्स-आर्मी ऑफिसर मेजर योगेश पाटिल (श्रेयस तलपड़े) की कहानी को दिखाया गया है, जिसमें योगेश का हंसता-खेलता परिवार तब बिखर जाता है, जब उसको एक दिन पता चलता है कि उसकी 7 साल की मासूम बेटी परी (त्रिशा शारदा) को ब्लड कैंसर हो गया है। उसके उपचार के लिए आर्थिक और मानसिक संघर्ष के चरम तक पहुंचने के बाद भी परी की मौत हो जाती है। बेटी के जाने के गम से टूटने के बजाय, योगेश इस बीमारी के कारणों की जड़ तक पहुंचने का निर्णय करता है।
चिकित्सीय अध्ययनों और गहन पड़ताल से योगेश को एक खौफनाक सच का पता चलता है कि कि उसकी बेटी की मौत किसी कुदरती बीमारी से नहीं, बल्कि रोजमर्रा के खान-पान में अंधाधुंध इस्तेमाल हो रहे जानलेवा रासायनिक कीटनाशकों और खाद्य पदार्थों में मिलावट के कारण हुई है।
जब भ्रष्ट व्यवस्था और पुलिस उसकी शिकायत तक दर्ज करने से इनकार कर देती है, तो वह अदालत का रुख करता है। युवा और संवेदनशील वकील अर्चना पाटिल (काजल अग्रवाल) के साथ मिलकर योगेश बहुराष्ट्रीय रसायन कंपनियों, लापरवाह सरकारी तंत्र और अत्यधिक कीटनाशक इस्तेमाल करने वाले कृषि तौर-तरीकों के खिलाफ कानूनी जंग छेड़ देता है।
इतिहास के कड़वे जख्म
फ़िल्म 'द इंडिया स्टोरी' की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह केवल काल्पनिक पटकथा तक सीमित नहीं रहती, बल्कि भारत के दो अलग-अलग कोनों—पंजाब और केरल—में घटी वास्तविक त्रासदियों को कहानी का मुख्य आधार बनाती है।
फिल्म पंजाब के उस दौर को रेखांकित करती है जब 1960 के दशक में आई 'हरित क्रांति' ने देश को खाद्यान्न संकट से उबारा और पंजाब को 'भारत का अन्नदाता' के तौर पर स्थापित किया। लेकिन फिल्म इस सफलता के पीछे छिपे भयानक सच को बेनकाब करती है।
अधिक पैदावार और रातों-रात मोटा मुनाफा कमाने की होड़ में पंजाब की उपजाऊ मिट्टी को रासायनिक उर्वरकों और विषैले कीटनाशकों से पाट दिया गया। फिल्म में बठिंडा से राजस्थान के बीकानेर जाने वाली कुख्यात 'कैंसर ट्रेन' का दृश्य भी दिखाया गया है, जो बेहद मार्मिक है।
यह ट्रेन रोज सैकड़ों कैंसर पीड़ितों और उनके परिवारों को इलाज के लिए ले जाती है। फिल्म दिखाती है कि जिस पंजाब की धरती ने पूरे देश का पेट भरा, आज वही मिट्टी अपने ही बच्चों के शरीर में जहर घोलने पर मजबूर हो चुकी है।
दूसरी ओर, फिल्म दक्षिण भारत में केरल के कासरगोड जिले में हुई 'एंडोसल्फान कीटनाशक त्रासदी' के भयानक परिणामों को सामने लाती है। कासरगोड के काजू के बागानों में दशकों तक सरकारी और व्यावसायिक शह पर हेलीकॉप्टरों से जहरीले एंडोसल्फान कीटनाशक का हवाई छिड़काव किया गया था।
इसके चलते वहां पीढ़ियों तक जन्मजात विकलांगता, मानसिक मंदता, कैंसर और आनुवंशिक विकृतियों का प्रकोप फैल गया। फिल्म के दृश्य यह याद दिलाते हैं कि कैसे व्यावसायिक लाभ के लिए एक पूरे संपन्न पारिस्थितिकी तंत्र और निर्दोष इंसानी जिंदगियों को दांव पर लगा दिया गया।
स्वार्थ और मुनाफे के लिए मानवीय मूल्यों का क्षरण
फ़िल्म का सबसे विचारोत्तेजक पहलू यह उजागर करना है कि 'अंधा स्वार्थ और लालच किस प्रकार मानवीय मूल्यों, नैतिकता और संवेदनाओं को दीमक की तरह चाट जाता है।'
फिल्म दिखाती है कि कैसे एग्रोकेमिकल कॉर्टेल और बहुराष्ट्रीय कंपनियां भली-भांति जानती हैं कि उनके रासायनिक उत्पाद कैंसरजनक हैं। इसके बावजूद अरबों डॉलर के मुनाफे और बाजार में अपना एकाधिकार बनाए रखने के लिए वे लैब रिपोर्टों में हेरफेर करते हैं, वैज्ञानिकों को चुप कराते हैं और जनस्वास्थ्य की कीमत पर अपनी तिजोरियां भरते हैं। यहां इंसान की जान की कीमत कंपनी के प्रॉफिट मार्जिन से बहुत सस्ती साबित होती है।
फिल्म हमारी नियामक संस्थाओं और सरकारी तंत्र के उस खोखलेपन पर भी सवाल उठाती है जहाँ जनस्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए बने नियम-कानून रिश्वत और राजनीतिक दबाव के आगे घुटने टेक देते हैं। प्रतिबंधित और खतरनाक रसायनों को भी बाज़ार में बिकने की हरी झंडी दे दी जाती है, जो शासन-प्रशासन के स्तर पर मानवीय मूल्यों के पूरी तरह ढहने का प्रमाण है।
फ़िल्म किसानों के द्वंद्व को भी संवेदनशीलता से प्रस्तुत करती है।
एक तरफ जहां समाज किसान को 'अन्नदाता' की उपाधि देता है, वहीं दूसरी तरफ बाजार के आर्थिक दबाव और कम लागत में अधिक उपज पाने की आपाधापी में किसान भी जहरीले रसायनों का अनियंत्रित उपयोग करने पर मजबूर हो जाते हैं। जब समाज को पोषण देने वाला हाथ ही ज़हर मिलाने को विवश हो जाए, तो यह नैतिक ताने-बाने का दुखद क्षरण है।
अभिनय, संवाद और निर्देशन
अभिनय की दृष्टि से फ़िल्म में श्रेयस तलपड़े ने योगेश पाटिल के तौर पर एक दुःखी, हताश लेकिन न्याय की जंग लड़ने वाले पिता के रूप में शानदार प्रदर्शन किया है। अपनी मासूम बच्ची को खोने का दर्द और अदालत में उनका आक्रोश दर्शकों की आंखें नम कर देता है। वहीं काजल अग्रवाल ने भी एडवोकेट अर्चना के रूप में एक संयमित और असरदार भूमिका निभाई है, जो कोर्टरूम के दृश्यों में गंभीरता लाती हैं। परी के रूप में बाल कलाकार त्रिशा शारदा ने अस्पताल के दृश्यों में अपनी मासूमियत से सभी को भावुक कर दिया है। मुरली शर्मा और मनीष वाधवा ने भी अपने किरदारों के साथ न्याय किया है।
फ़िल्म के संवाद बेहद सधे हुए और प्रभावशाली लगते हैं। आखरी दृश्य में जब श्रेयस तलपड़े कठघरे में खड़े होकर अपना पक्ष रखते हुए विपक्षी वकील से कहता है, “वकील साहब, क्या आपने कभी अपनी मां को जहर दिया है? तो जरा सोचिए हम रोज अपनी धरती मां को कितना ज़हर पिला रहे हैं।”
एक और संवाद हमें सोचने पर मजबूर करता है कि “जब हमारा देश भुखमरी की चपेट में था, तो उस वक्त हरित क्रांति देश की जरूरत थी, लेकिन खेती के लिए इतनी तकनीकें आ जाने के बात भी घातक रसायनों का उपयोग जारी रखना क्या सही है?” फ़िल्म का एक और संवाद “जब ज़हर बोया है, तो कैंसर तो उगना ही था”, खेती में कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल के दुष्परिणामों को रेखांकित करता है।
निर्देशक चेतन डीके और लेखक सागर बी. शिंदे ने एक अत्यंत संवेदनशील और सामयिक विषय को उठाया है। हालांकि, पटकथा में कुछ जगह अत्यधिक मेलोड्रामा देखने को मिलता है और फ़िल्म का उत्तरार्ध थोड़ा खिंचा हुआ लगता है, फिर भी विषय की महत्ता दर्शकों को बाँधे रखती है।
'द इंडिया स्टोरी: स्लो पॉइजन इन प्रोग्रेस' इसलिए सफल फिल्म नहीं है कि वह हर सवाल का अंतिम जवाब देती है, बल्कि इसलिए कि वह दर्शकों को उन असहज प्रश्नों से रूबरू होने के लिए मजबूर करती है, जिन पर मुख्यधारा का सिनेमा अक्सर चुप्पी साध लेता है।
व्यक्तिगत त्रासदी को पर्यावरण और जनस्वास्थ्य से जुड़ी वास्तविक आपदाओं के साथ बुनते हुए यह फिल्म बीमारी को केवल एक व्यक्ति की नियति नहीं, बल्कि एक व्यापक और संस्थागत विफलता के रूप में देखने का दृष्टिकोण देती है। इसके सभी तर्कों से सहमत होना आवश्यक नहीं, लेकिन इसका मूल संदेश नज़रअंदाज़ करना कठिन है—खाद्य सुरक्षा का आकलन केवल उत्पादन के आंकड़ों से नहीं किया जा सकता।
इसकी वास्तविक कसौटी यह भी है कि हमारी थाली में परोसा जाने वाला भोजन कितना सुरक्षित है, खेती करने वाले समुदाय कितने स्वस्थ हैं, हमारे पारिस्थितिकी तंत्र कितने सुदृढ़ हैं और उनकी रक्षा की जिम्मेदारी निभाने वाली संस्थाएँ कितनी जवाबदेह हैं। इस अर्थ में 'द इंडिया स्टोरी' केवल एक कोर्टरूम ड्रामा नहीं, बल्कि भारत की रासायनिक-निर्भर कृषि व्यवस्था की पर्यावरणीय और मानवीय कीमत पर गंभीर पुनर्विचार का आमंत्रण है।

