“कई देशों ने चुना गलत रास्ता”

वी आर ईटिंग द अर्थ पुस्तक के लेखक और अमेरिकी पत्रकार माइकल ग्रुनवाल्ड ने शगुन से बातचीत में बताया कि जलवायु संकट से निपटने के कई लोकप्रिय उपाय, जैसे बायोफ्यूल, रिजनरेटिव फार्मिंग और पशुपालन घटाना दरअसल कई मामलों में फायदे से ज्यादा नुकसान पहुंचा सकते हैं
वी आर ईटिंग द अर्थ पुस्तक के लेखक और अमेरिकी पत्रकार माइकल ग्रुनवाल्ड
वी आर ईटिंग द अर्थ पुस्तक के लेखक और अमेरिकी पत्रकार माइकल ग्रुनवाल्ड
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Q

आपकी किताब में टिम सर्चिंगर के शोध के जरिए यह तर्क दिया गया है कि फसलों से बनने वाला एथेनॉल, लैंड यूज चेंज को बढ़ावा देता है। इस वजह से यह जलवायु के लिए पेट्रोल से भी दोगुना नुकसानदेह हो सकता है। इसके बावजूद दुनिया भर की सरकारें एथेनॉल को लगातार बढ़ावा दे रही हैं। भारत में गन्ने और अनाज से बनने वाले एथेनॉल को जिस तरह प्रोत्साहित किया जा रहा है, वह अमेरिका में मक्का आधारित एथेनॉल के इस्तेमाल जैसा ही है। क्या ऐसी नीतियां वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित हैं या फिर खेती से जुड़े दबाव समूहों का असर इनमें ज्यादा है?

A

बायोफ्यूल से होने वाले उत्सर्जन का वास्तविक हिसाब भारत जैसे देशों में और भी प्रतिकूल है, क्योंकि यहां कृषि उत्पादकता अपेक्षाकृत कम है। इसलिए भारत की जैव ईंधन नीति गलत दिशा में जा रही है।

यूरोप ने इस मामले में कुछ सुधार जरूर किए हैं, लेकिन वहां भी स्थिति पूरी तरह संतोषजनक नहीं है। जैसा कि मैंने किताब में लिखा है, यूरोपीय संघ (ईयू) के शुरुआती रिन्यूएबल एनर्जी डायरेक्टिव में यह लक्ष्य रखा गया था कि परिवहन में इस्तेमाल होने वाले 10 प्रतिशत ईंधन बायोफ्यूल से आना चाहिए। बाद में वैज्ञानिक अध्ययनों से यह साबित हो गया कि लैंड यूज चेंज के कारण फसलों से बनने वाले बायोफ्यूल से मिलने वाले कई जलवायु लाभ खत्म हो जाते हैं। इसके बावजूद यह लक्ष्य बरकरार रखा गया क्योंकि इसके पीछे राजनीतिक कारण थे।

बाद में जब इलेक्ट्रिक व्हीकल एक व्यवहारिक विकल्प बनकर सामने आए तब यूरोप ने फसलों से बनने वाले जैव ईंधन के इस्तेमाल पर सीमा तय की। उसने यह भी साफ कर दिया कि फसल आधारित बायोफ्यूल को सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल नहीं माना जाएगा।

वहीं अमेरिका में 2025 में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के “वन बिग ब्यूटीफुल बिल” के तहत लगभग सभी नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की सब्सिडी घटा दी गई लेकिन जैव ईंधन को छूट दी गई। साथ ही यह भी तय किया गया कि जैव ईंधन के उत्सर्जन का आकलन करते समय जमीन के उपयोग में बदलाव से होने वाले उत्सर्जन को नहीं जोड़ा जाएगा।

Q

दूसरी पीढ़ी यानी 2जी या सेलुलोसिक एथेनॉल और जीवाश्म ईंधन के अन्य टिकाऊ विकल्पों को आप किस नजर से देखते हैं?

A

सच कहूं तो ये अब तक कारगर साबित नहीं हुए हैं। कई बार एयरलाइंस इस्तेमाल किए हुए खाना पकाने के तेल से बने ईंधन पर एक विमान उड़ाकर उसे टिकाऊ विमानन ईंधन का भविष्य बताती हैं। लेकिन पूरा विमान बेड़ा ऐसे ईंधन पर नहीं चल सकता। आखिरकार इसके लिए मक्का और सोयाबीन जैसी फसलों पर ही निर्भर होना पड़ेगा।

एक समय दावा किया गया था कि 2025 तक अमेरिका में हर साल 30 अरब गैलन (करीब 1,130 अरब लीटर) सेलुलोसिक एथेनॉल का उत्पादन होगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अब तक दूसरी पीढ़ी के जैव ईंधन उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे हैं।

इसके उलट आज अमेरिका में सोयाबीन से बनने वाले बायोडीजल को ही अगली पीढ़ी या उन्नत जैव ईंधन माना जाने लगा है। अगर सेलुलोसिक एथेनॉल व्यावसायिक रूप से सफल हो गया होता तो आज जेट्रोफा या स्विचग्रास जैसी फसलों की खेती के लिए विशाल इलाके तैयार किए जा चुके होते। इससे बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई और आर्द्रभूमियों का विनाश होता। इस लिहाज से देखें तो इसका सफल न होना शायद धरती के लिए अच्छा ही रहा।

Q

आपकी किताब में यह भी कहा गया है कि पर्यावरण के लिए सबसे बड़ा खतरा औद्योगिक खेती नहीं बल्कि खेती का प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्रों तक फैलना है। इसका एक समाधान आप मौजूदा खेतों से अधिक उत्पादन लेने में देखते हैं। लेकिन यह तर्क उस समय विरोधाभासी लगता है, जब औद्योगिक खेती पर रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक इस्तेमाल और उससे पर्यावरण को होने वाले नुकसान को लेकर सवाल उठ रहे हैं। इन दोनों बातों में आप संतुलन कैसे देखते हैं?

A

मैं औद्योगिक खेती की नहीं, बल्कि अधिक उत्पादन देने वाली खेती की वकालत कर रहा हूं। यह धारणा काफी आम है कि खेती की सबसे बड़ी पर्यावरणीय समस्या उसका ज्यादा गहन होना है। मैं इस चिंता को खारिज नहीं करता। बड़े पैमाने पर चलने वाले कृषि फार्म अक्सर गोबर और दूसरे जैविक कचरे का सही ढंग से प्रबंधन नहीं कर पाते, जिससे नदियां और झीलें प्रदूषित होती हैं। यानी गहन खेती से पर्यावरणीय समस्याएं पैदा हो सकती हैं। लेकिन इससे भी बड़ी समस्या जंगलों, घास के मैदानों और आर्द्रभूमियों को साफ करके उन्हें खेती में बदल देना है, जिसे मैं खेती का विस्तार कहता हूं।

असल पर्यावरणीय नुकसान किसी कम उत्पादन वाले खेत को अधिक उत्पादन वाले खेत में बदलने से नहीं होता। असली नुकसान तब होता है, जब किसी जंगल, घास के मैदान या आर्द्रभूमि को पहली बार खेती में बदला जाता है। उसी समय बड़ी मात्रा में कार्बन वातावरण में पहुंचता है और जैव विविधता का नुकसान होता है।

Q

आपने अपनी किताब में यह भी लिखा है कि रिजनरेटिव या ऑर्गेनिक फार्मिंग में कम पैदावार जलवायु के लिए नुकसानदेह हो सकती है, क्योंकि इससे ज्यादा जंगलों को खेती के लिए साफ करना पड़ता है। वहीं, एग्रोइकोलॉजी के समर्थकों का कहना है कि केवल अधिक पैदावार को ही उत्पादकता का पैमाना नहीं माना जा सकता। क्या इन दोनों सोच के बीच संतुलन बनाया जा सकता है?

A

अधिक पैदावार वाली खेती बेहद जरूरी है। अगर हरित क्रांति नहीं हुई होती तो आज दुनिया की आबादी का पेट भरने के लिए करीब तीन गुना अधिक खेती की जमीन चाहिए होती।

यह सही है कि ज्यादा पैदावार से खेती से जुड़ी हर पर्यावरणीय समस्या हल नहीं होती। लेकिन इसके बिना धरती पर खेती का लगातार फैलाव रोकना भी संभव नहीं है। पैदावार लगातार बढ़ी है, फिर भी अनुमान है कि 2050 तक दुनिया में भारत के लगभग दोगुने क्षेत्रफल के बराबर और जंगल साफ हो सकते हैं। समस्या यह है कि हमारे पास खोने के लिए इतने जंगल बचे ही नहीं हैं।

बेशक, किसी खेत में सिर्फ ज्यादा रासायनिक उर्वरक डाल देना समाधान नहीं है। लेकिन अगर एक एकड़ जमीन से पहले की तुलना में दोगुना भोजन पैदा होता है तो नए जंगलों को खेती में बदलने का दबाव कम हो जाता है।

इस संतुलन का रास्ता भी है। मैंने ब्राजील में इसके उदाहरण देखे हैं और किताब में उनका जिक्र किया है। अगर प्रति हेक्टेयर लगभग 1,000 अमेरिकी डॉलर का निवेश कर बेहतर घास उगाई जाए, पशुओं के चारे की गुणवत्ता सुधारी जाए, चराई के दौरान उन्हें अनाज और खनिज दिए जाएं व रोटेशनल ग्रेजिंग अपनाई जाए तो पशुपालन की उत्पादकता कई गुना बढ़ सकती है।

इन फार्मों में औद्योगिक खेती की कुछ विशेषताएं भी थीं। वहां फीडलॉट का इस्तेमाल होता था और चरागाहों में उर्वरक भी डाले जाते थे। साथ ही रोटेशनल ग्रेजिंग, कवर क्रॉप और फसल तथा पशुपालन को एक साथ जोड़ने जैसी रिजनरेटिव पद्धतियां भी अपनाई जाती थीं। यानी उन्होंने अधिक उत्पादन वाली खेती और प्रकृति आधारित तरीकों का मेल किया है।

अक्सर यह आलोचना की जाती है कि अधिक पैदावार वाली औद्योगिक फसलों और गहन पशुपालन पर जितना शोध और निवेश हुआ है, उतना एग्रोइकोलॉजी और छोटे किसानों की खेती पर नहीं हुआ। मुझे लगता है कि यह आलोचना सही है। इन क्षेत्रों में कहीं अधिक निवेश की जरूरत है।

Q

अब पशुपालन की बात करते हैं। वैश्विक स्तर पर इंसानी गतिविधियों से होने वाले मीथेन उत्सर्जन का लगभग एक तिहाई हिस्सा पशुपालन से आता है। आपकी किताब कहती है कि कई कैलोरी वाली फसलों को पशुओं को खिलाकर केवल एक कैलोरी मांस पैदा करना भोजन उत्पादन का बहुत अल्प दक्ष तरीका है जबकि विकासशील देशों का नजरिया इससे अलग है। यहां अब भी बड़ी आबादी कुपोषण और बच्चों में आयु के अनुसार कम लंबाई (स्टंटिंग) जैसी समस्याओं से जूझ रही है। पशु आधारित भोजन से आयरन, जिंक और विटामिन बी12 जैसे पोषक तत्व मिलते हैं, जिन्हें केवल पौधों पर आधारित भोजन से पर्याप्त मात्रा में पाना आसान नहीं होता। अगर जलवायु लक्ष्य हासिल करने के लिए पशुपालन कम करना जरूरी है तो उन अरबों लोगों की पोषण संबंधी जरूरतें कैसे पूरी होंगी, जिन्हें आज भी अधिक पशु प्रोटीन की जरूरत है?

A

विकासशील देशों के लोगों को निश्चित रूप से अधिक पशु आधारित भोजन की जरूरत है। मांस की खपत कम करने की जरूरत अमीर देशों में है, खासकर जुगाली करने वाले पशुओं के मांस की खपत कम होनी चाहिए। उदाहरण के लिए, अमेरिका में प्रति व्यक्ति मांस की खपत दुनिया के औसत से लगभग चार गुना और औसत भारतीय की तुलना में करीब 12 गुना है।

इसके साथ ही मुझे वैकल्पिक प्रोटीन की संभावनाओं को लेकर काफी उम्मीद है। चाहे वे पौधों से तैयार किए गए पोषक तत्वों से भरपूर प्रोटीन हों, प्रयोगशाला में विकसित पशु कोशिकाओं से बने उत्पाद हों या फरमेंटेशन से तैयार प्रोटीन, भविष्य में ये पारंपरिक पशुपालन की तुलना में कम लागत और बहुत कम संसाधनों में समान पोषण दे सकते हैं।

अगर वही प्रोटीन 90 प्रतिशत कम जमीन और 80 प्रतिशत कम उत्सर्जन के साथ तैयार किया जा सके, तो यह विकसित और विकासशील दोनों देशों के लिए बड़ी उपलब्धि होगी। उम्मीद है कि भविष्य में ये वैकल्पिक प्रोटीन उन लगभग 6 अरब लोगों तक भी पहुंचेंगे, जो आज बहुत कम या बिल्कुल मांस नहीं खाते। इससे वे पारंपरिक पशुपालन से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान को दोहराए बिना अपनी पोषण जरूरतें पूरी कर सकेंगे। हालांकि इन तकनीकों को बड़े पैमाने पर अपनाने में अभी 10 से 15 साल लग सकते हैं।

Q

आपकी किताब में पशुपालन से होने वाले उत्सर्जन को कम करने वाली कई तकनीकों का जिक्र है। इनमें जीन एडिटेड मवेशी, चारे में मिलाए जाने वाले फीड एडिटिव और कल्टिवेटेड मीट शामिल हैं। इनमें से किस तकनीक में सबसे ज्यादा संभावना दिखाई देती है और क्यों?

A

सबसे पहले बड़े पैमाने पर अपनाई जा सकने वाली तकनीक दरअसल बहुत साधारण है। चरागाहों का बेहतर प्रबंधन करना होगा।

ब्राजील में मैंने जो देखा, उससे लगता है कि दक्षिण अमेरिका के कई देशों में और शायद दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी थोड़े से निवेश से बीफ उत्पादन 300 से 500 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकता है। खासकर खराब हो चुके चरागाहों में इसकी अच्छी संभावना है।

इसके बाद सबसे ज्यादा उम्मीद जीन एडिटिंग से है, हालांकि इसे बड़े पैमाने पर अपनाने में अभी करीब एक दशक लग सकता है।

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