खतरे में खेती, सातवीं कड़ी: फसल बचाएं या जान? जंगली जानवरों के आतंक से खाली हो रहे उत्तराखंड के गांव

चकबंदी से बंजर जमीन को हरा-भरा बनाने वाले किसान आज सूअर, बंदर, हाथी और गुलदार के आतंक से खेत छोड़ने को मजबूर, मुआवजा और सुरक्षा नीतियां नाकाफी साबित
ऑस्कर तक पहुंची कहानी के नायक विद्या दत्त शर्मा आज भी संघर्षरत हैं। सफल पर्वतीय खेती का प्रतीक बने यह किसान अब अपने बाग को जंगली जानवरों से बचाने के लिए अकेले आवाज उठाने को मजबूर हैं।
फोटो : राजू सजवान
ऑस्कर तक पहुंची कहानी के नायक विद्या दत्त शर्मा आज भी संघर्षरत हैं। सफल पर्वतीय खेती का प्रतीक बने यह किसान अब अपने बाग को जंगली जानवरों से बचाने के लिए अकेले आवाज उठाने को मजबूर हैं। फोटो : राजू सजवान
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उत्तराखंड के पौड़ी जिले के सांगुड़ा गांव के विद्या दत्त शर्मा पर्वतीय खेती के एक प्रेरक उदाहरण माने जाते हैं। उनकी जीवन यात्रा और खेती के प्रति समर्पण ने मोतीबाग जैसी चर्चित डॉक्यूमेंट्री को जन्म दिया, जिसे 2019 में भारत की ओर से ऑस्कर अवार्ड के लिए नामांकित किया गया।

दशकों से खेती, पलायन और पहाड़ के बदलते सामाजिक-आर्थिक हालात से जूझते रहे शर्मा आज भी संघर्ष कर रहे हैं। हाल ही में उन्हें अपने बाग और फसलों को जंगली जानवरों से बचाने की मांग को लेकर अकेले विरोध प्रदर्शन करना पड़ा, जो पहाड़ के किसानों की लगातार बढ़ती चुनौतियों को उजागर करता है।

गणेश सिंह गरीब के पास आज भी लगभग 20 नाली (लगभग 0.4 हेक्टेयर) जमीन है। एक ही चक में, एक साथ। यह अपने आप में पहाड़ के लिए असाधारण बात है। 90 के दशक में राजधानी दिल्ली में रेडियो की दुकान चलाने वाले गणेश ने पहाड़ से पलायन रोकने के लिए चकबंदी आंदोलन की शुरुआत की और करीब 40 साल की उम्र में सब कुछ छोड़कर गांव लौट आए। 

उत्तराखंड के पौड़ी जिले के गांव सुला निवासी गरीब ने चकबंदी की मिसाल पेश करने के लिए खुद स्वैच्छिक चकबंदी कर खेती शुरू की, बंजर जमीन को हरा-भरा किया और मिसाल बने। लेकिन धीरे-धीरे जंगली जानवरों ने खेत उजाड़ दिए। उनकी उम्र अब 88 वर्ष हैं, उनके लगभग सभी खेत फिर बंजर हैं।

दिल्ली से लौटकर गणेश सिंह गरीब ने स्वैच्छिक चकबंदी के जरिए खेती को पुनर्जीवित करने की कोशिश की, लेकिन जंगली जानवरों के लगातार हमलों ने उन्हें खेती छोड़ने पर मजबूर कर दिया। आज उनकी जमीन फिर से परती पड़ी है।
फोटो: राजू सजवान
दिल्ली से लौटकर गणेश सिंह गरीब ने स्वैच्छिक चकबंदी के जरिए खेती को पुनर्जीवित करने की कोशिश की, लेकिन जंगली जानवरों के लगातार हमलों ने उन्हें खेती छोड़ने पर मजबूर कर दिया। आज उनकी जमीन फिर से परती पड़ी है। फोटो: राजू सजवान

 इसी तरह 2014 में नोएडा में एक मीडिया कंपनी की नौकरी छोड़ कर उत्तराखंड अपने गांव लौटे सुधीर सुंदरियाल बताते हैं कि उनके पोखड़ा ब्लॉक में 60 ग्राम सभाएं हैं। यहां लगभग 95 फीसदी खेती बंजर हो चुकी हैं। खेती छोड़ने की प्रमुख वजह जंगली जानवर हैं। खासकर इस क्षेत्र में सूअरों का आतंक है। 

सूअर रातों रात खेत के खेत उजाड़ देते हैं। अपना उदाहरण देते हुए वह बताते हैं कि वह लगभग 80 नाली जमीन पर खेती कर रहे हैं। यह जमीन उनकी नहीं है, लेकिन अपने ही नहीं बल्कि दूसरे गांव के लोगों ने भी अपनी जमीन उन्हें खेती करने के लिए दी है, जहां वह जैविक खेती करते हैं। यहां अकसर उनकी फसल को सूअर चौपट कर देते हैं।

सुंदरियाल कहते हैं कि कुछ सालों से क्षेत्र में बाघ (गुलदार) का खतरा बढ़ गया है। गुलदार के हमले से लोग मारे जा रहे हैं। डर के मारे में खेतों में जाना बंद कर दिया है। उनका दावा है कि उनके पोखड़ा ब्लॉक के 50 से अधिक ग्राम पंचायतों में 90 फीसदी से अधिक खेती बंजर हो चुकी है। 

दशकों से पलायन का दंश झेल रहे उत्तराखंड के ये तीन उदाहरण बताते हैं कि इस राज्य में रिवर्स पलायन की कोशिशें भी जानवरों के आगे दम तोड़ रही हैं।

जानवरों के हमले के कारण न केवल लोग खेती छोड़ रहे हैं, बल्कि पलायन भी बढ़ा है। उत्तराखंड ग्राम्य विकास एवं पलायन निवारण आयोग की अप्रैल 2026 में जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य में जंगली जानवरों से फसलों को नुकसान से खेती प्रभावित होती है और लोग पलायन करने को मजबूर होते हैं। 

अपनी इस रिपोर्ट में आयोग ने 2018 में प्रकाशित पहली अंतरिम रिपोर्ट के हवाले से बताया है कि पलायन के मुख्य कारणों में जंगली जानवरों द्वारा खेती को होने वाला नुकसान पांचवें स्थान (5.61 प्रतिशत) पर है। 

इस रिपोर्ट में आयोग ने जिलावार आकलन भी किया था और पाया था कि अल्मोड़ा में सबसे अधिक (10.99 प्रतिशत) पलायन का कारण जंगली जानवरों के द्वारा खेती को नुकसान पहुंचाना था। 

इसके बाद चंपावत (6.65 प्रतिशत) नैनीताल (6.38 प्रतिशत) व पौड़ी गढ़वाल (6.27 प्रतिशत) का नंबर आता है। 

जिलावार के इन आंकड़ों से पता चलता है कि जंगली जानवरों द्वारा खेती को नुकसान पहुंचाने के कारण सबसे अधिक पलायन पर्वतीय जिलों से ही हुआ है। हालांकि सुंदरियाल कहते हैं कि 2018 की इस रिपोर्ट के बाद भी सरकार की ओर से कोई प्रयास नहीं किया गया और जानवरों का आतंक साल दर साल बढ़ता ही जा रहा है। 

लगातार जंगली जानवरों के आतंक से निश्चित है कि राज्य के किसानों की फसल हानि, बुवाई में कमी, पशुधन संख्या में गिरावट और आर्थिक नुकसान/जोखिम का सामना हर दिन उठाना पड़ रहा है। जैसे- जंगली सूअर, नीलगाय, बंदर, हाथी आदि द्वारा प्रमुख फसलों (गेहूं, मक्का, दालें, मोटा अनाज, फल–सब्जियां) को क्षति पहुंचा रहे हैं। 

वहीं बाघ, तेंदुआ और भेड़िया जैसे शिकारी पशुधन (गाय, भैंस, बकरी) पर हमलों से पशुपालकों को भारी नुकसान हो रहा है। इन हिंसक जानवरों के आदमखोर होने के कारण लोगों ने दूरदराज के क्षेत्रों में खेती करना बंद कर दिया है और कई इलाकों में पलायन भी हो रहा है। 

जंगली जानवरों द्वारा अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में नुकसान का स्वरूप भी बदलता है। पहाड़ी इलाकों में बंदर और जंगली सूअर बार-बार छोटे-छोटे नुकसान करते हैं, जबकि तराई क्षेत्रों में हाथी और नीलगाय एक बार में बड़ी मात्रा में फसल नष्ट कर रहे हैं। अध्ययनों के अनुसार कई क्षेत्रों में 30% से 100% तक फसल हानि दर्ज की गई है, जो न केवल किसानों की आय पर सीधा असर डालती है बल्कि खेती से मोहभंग और पलायन को भी तेज करती है।

साल 2020 में इंडियन कौंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च से जुड़े एक अध्ययन में पौड़ी के लैंसडाउन क्षेत्र के लगभग सभी गांवों में फसल क्षति दर्ज की गई, जहां बंदर और जंगली सूअर प्रमुख कारण पाए गए। 

रबी सीजन (दिसंबर–जनवरी) के दौरान किए गए इस अध्ययन में कुल 65.2 एकड़ कृषि क्षेत्र के नुकसान का आकलन किया गया, जिसमें सबसे अधिक प्रभावित फसल गेहूं (लगभग 52.68 एकड़) रही। इसके अलावा प्याज (6.95 एकड़), आलू (2.98 एकड़), सरसों (1.98 एकड़) और लहसुन (0.63 एकड़) भी प्रभावित हुए। 

वहीं खरीफ सीजन (जून–अगस्त) में नुकसान का स्वरूप कुछ अलग दिखा। इस अवधि में 23.85 एकड़ धान और 10.9 एकड़ मक्का की फसल जंगली जानवरों द्वारा नष्ट की गई। ये आंकड़े बताते हैं कि नुकसान केवल एक फसल या मौसम तक सीमित नहीं है, बल्कि साल भर कृषि उत्पादन पर दबाव बना रहता है।

क्षेत्रीय स्तर पर देखें तो कोटद्वार रेंज सबसे अधिक प्रभावित पाई गई, जहां कुल 99.41 एकड़ कृषि भूमि में से 58.75 एकड़ (लगभग 59%) क्षेत्र नुकसान की चपेट में आया। इस इलाके में हाथी सबसे बड़ा कारण रहे, जिन्होंने अकेले 56.94 एकड़ (करीब 97%) नुकसान किया, जबकि जंगली सूअर का योगदान केवल 1.79 एकड़ रहा। 

कोटद्वार का तराई क्षेत्र, कालागढ़ टाइगर रिजर्व से निकटता और बड़े कृषि क्षेत्र के कारण फसल पर हमलों की संभावना अधिक पाई गई। इस तरह के आंकड़े यह दिखाते हैं कि उत्तराखंड में फसल नुकसान केवल व्यापक ही नहीं, बल्कि क्षेत्र-विशिष्ट और जानवर-विशिष्ट संकट के रूप में उभर रहा है, जहां कुछ इलाकों में एक ही प्रजाति पूरे कृषि तंत्र को प्रभावित कर रही है। 

इसी तरह एक अन्य शोध के अनुसार 71.4% किसानों ने जंगली जानवरों को कृषि की सबसे बड़ी समस्या बताया। कई मामलों में नुकसान आंशिक नहीं बल्कि पूरी फसल नष्ट होने तक पहुंच जाता है, जिससे खेती की लागत तक निकालना मुश्किल हो जाता है।

राज्य में अलग-अलग कारणों से खेती का क्षेत्रफल और उत्पादन कम हो रहा है। इन कारणों में जंगली जानवर एक बड़ी वजह हैं, जबकि अन्य कारणों में जलवायु परिवर्तन, बारिश, मिट्टी की गुणवत्ता व पुरातन कृषि पद्धतियां शामिल हैं। 

सिंचाई की बजाय वर्षा पर निर्भरता के कारण पहाड़ी इलाकों में खरीफ की फसल बहुत महत्व रखती है। खरीफ सीजन में चावल, मक्का, मंडुआ, सावा (झंगोरा), रामदाना (चौलाई), तुअर, गहत, भट्ट, राजमा जैसी प्रमुख फसलें होती हैं, लेकिन अब खरीफ फसलों की बुआई का क्षेत्रफल व उत्पादन कम हो रहा है। 

पलायन निवारण आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि वर्ष 2016-17 से 2021-22 के बीच खरीफ की फसलों के क्षेत्रफल में 13 प्रतिशत की गिरावट आई है, जबकि रबी की फसलों के क्षेत्रफल में इन पांच सालों में 15 प्रतिशत की गिरावट आई है। 

आयोग की रिपोर्ट के अनुसार राज्य में फसल क्षति के लिए मुख्य रूप से बंदर (36.7%) और जंगली सूअर (22.9%) जिम्मेदार हैं। इसके अलावा बेसहारा पशु (11.0%), लंगूर (9.3%), नीलगाय (5.7%), साही (3.5%), भालू (2.2%) और हाथी (1.5%) भी विभिन्न क्षेत्रों में नुकसान पहुंचाते हैं, जबकि अन्य वन्यजीवों का योगदान लगभग 7.1% है। 

यह स्पष्ट करता है कि कुछ चुनिंदा प्रजातियां ही राज्य में फसल नुकसान का बड़ा कारण बन रही हैं, जिसके चलते कृषि और ग्रामीण जीवन पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। उत्तराखंड में बंदरों से सबसे अधिक नुकसान बागेश्वर (47.4%) में हो रहा है इसके बाद उत्तरकाशी (45.7%), देहरादून (45.0%), टिहरी (44.3%) और पिथौरागढ़ (44.3%) जिलों में बंदरों द्वारा फसल नुकसान की घटनाएं अधिक दर्ज की गई हैं। 

एक और रोचक आंकड़े इस रिपोर्ट में देखने को मिलते हैं।  वन विभाग द्वारा 2015 और 2021 में बंदरों और लंगूरों की जो गणना की गई, उससे पता चला कि इनकी संख्या क्रमशः लगभग 25 प्रतिशत और 32 प्रतिशत तक कम हुई है। 

इस पर टिप्पणी करते हुए रिपोर्ट में लिखा गया, "लेकिन इसके बावजूद फसलों को नुकसान और मानव–वन्यजीव संघर्ष के मामले बढ़ रहे हैं। इसका कारण यह है कि पहले जो बंदर और लंगूर जंगलों में रहते थे, उनमें से लगभग 57 प्रतिशत अब मानव बस्तियों के आसपास रहने और घूमने लगे हैं।" 

मुआवजा की कठिन प्रक्रिया 

एक ओर जहां जंगली जानवरों की वजह से उत्तराखंड में खेती करना लगभग मुश्किल हो गया है। दूसरी ओर,  सरकार की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं।  सरकार की ओर से नुकसान का खामियाजा उठा रहे किसानों को पर्याप्त मुआवजा भी नहीं दिया जा रहा है। 

अभी केंद्र सरकार की ओर से प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में नया प्रावधान किया है, जिसके मुताबिक खरीफ 2026 के सीजन से राज्य के लाखों किसान अब जंगली जानवरों द्वारा फसल नष्ट किए जाने पर बीमा क्लेम कर सकेंगे। पहले केवल ओलावृष्टि या सूखे पर मुआवजा मिलता था, लेकिन अब जंगली जानवर के हमले पर फसल के मूल्य का 100% तक (नुकसान के अनुपात में) कवर मिल सकेगा।

लेकिन सुंदरियाल बताते हैं कि फसल का नुकसान होने पर वह प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का लाभ नहीं ले पा रहे हैं, क्योंकि उन्होंने जिन खेतों में फसल लगाई है, वे खेत उनके नाम पर नहीं हैं। लोगों ने भरोसे पर उन्हें दिए हैं, लेकिन कोई लिखित समझौता नहीं किया है। 

राज्य में इस साल भालुओं का भी आतंक खूब रहा। बढ़ते आतंक को देखते हुए उत्तराखंड वन विभाग अब भालुओं को उन वन्य जीवों की श्रेणी में शामिल करने का प्रस्ताव तैयार कर रहा है जिनके लिए किसानों को फसल क्षति के मुआवजे का हकदार माना जाएगा। वर्तमान में, भालू राज्य की फसल मुआवजा सूची के दायरे में नहीं आते हैं, जिसमें मुख्य रूप से हाथी, जंगली सूअर, नीलगाय, हिरण और बंदर शामिल हैं।

इसके अलावा, मंत्रालय ने दिसंबर 2023 में जंगली जानवरों के हमलों से मृत्यु या स्थायी अपंगता की स्थिति में दी जाने वाली अनुग्रह राहत (एक्स-ग्रेशिया) की राशि को 5 लाख रुपये से बढ़ाकर 10 लाख रुपये कर दिया है। यह सहायता उक्त योजनाओं के अंतर्गत, धन की उपलब्धता के अधीन दी जाती है तथा इसका भुगतान संबंधित राज्य-विशिष्ट दिशा-निर्देशों/प्रावधानों के अनुसार किया जाता है।

जानवरों को मारने की इजाजत नहीं 

फसलों को लगातार नुकसान पहुंचाने वाले जानवरों को मारने की भी इजाजत लोगों को नहीं है। सुंदरियाल ने बताया, “लगातार प्रयासों के बाद वन विभाग ने जंगली सूअर व नील गाय मारने की इजाजत दे दी। लेकिन नियम है कि इन जानवरों को शिकारी ही मार सकता है। मैंने देहरादून के कुछ शौकिया शिकारियों से संपर्क किया है, जो जल्द ही मेरे यहां आएंगे। अब सवाल यह है कि किसान को ही सूअर मारने का इंतजाम करना होगा।” 

नियम के मुताबिक बंदूक की गोली से ही सूअर को मार सकते हैं, इसके लिए विशेषज्ञ शिकारी को तलाशना होगा। शिकारी कितने दिन में सूअरों को मारेगा, कह नहीं सकते, ऐसे में किसान को शिकारी का सारा खर्च उठाना होगा, जो उत्तराखंड के छोटी जोत वाले किसानों के लिए संभव नहीं है। नियम में भी यह कहा गया है कि किसान को अपने ही खेत में नुकसान कर रहे सूअर को मारना है, लेकिन यह कैसे संभव है, सूअर तुरंत भाग जाएगा या घायल होने के बाद दूसरे के खेत या जंगल में चला जाएगा तो ऐसी परिस्थिति में किसान क्या करेगा? 

फसलों की सुरक्षा के उपाय नहीं

हालांकि उत्तराखंड में जंगली जानवरों से फसलों को बचाने के लिए सरकार ने सौर फेंसिंग, बायो-फेंसिंग और मुआवजा जैसी बहुस्तरीय योजनाएं लागू की हैं, जिन पर हाल के वर्षों में उल्लेखनीय खर्च भी हुआ है। उत्तराखंड में केंद्र और राज्य की योजनाओं के तहत पिछले तीन वर्षों (2023–26) में वन्यजीव-मानव संघर्ष प्रबंधन पर लगभग 59 करोड़ रुपए से अधिक खर्च किए गए हैं, जबकि 2026 में ही 25 करोड़ रुपए फसल घेरबाड़ (fencing) के लिए स्वीकृत किए गए। 

इसके अलावा, फसल नुकसान पर मुआवजा दरें भी तय हैं। जैसे धान/गेहूं पर लगभग 15,000 रुपए प्रति एकड़ तक सहायता का प्रावधान है, लेकिन इसके बावजूद सबसे बड़ी समस्या यह है कि सरकार के पास यह बताने के लिए कोई समेकित आंकड़ा उपलब्ध नहीं है कि इन योजनाओं से कुल फसल नुकसान में कितनी कमी आई या कितने किसानों को वास्तविक लाभ मिला।

उत्तराखंड में बंदरों की समस्या से निपटने के लिए उत्तराखंड वन विभाग ने मुख्य रूप से “पकड़ो-नसबंदी-छोड़ो” मॉडल अपनाया है। इस योजना में बंदरों को जाल या पिंजरे से पकड़ा जाता है, फिर उन्हें नसबंदी के लिए केंद्रों जैसे हरिद्वार के चिड़ियापुर रेस्क्यू सेंटर में ले जाया जाता है और बाद में जंगल में छोड़ दिया जाता है। रिपोर्ट्स बताते हैं कि एक बंदर पर औसतन 500 से 800 रुपए खर्च किए जाते हैं। 

राज्य के पौड़ी जिले में पलायन रोकने के लिए काम कर रही संस्था के संयोजक रतन असवाल बताते हैं कि बंदर पकड़ने को लेकर राज्य में खूब खेल हो रहा है। बंदर पकड़ने का ठेका जिन लोगों को दिया जाता है, वो एक जगह से बंदर पकड़ कर आसपास के दूसरे क्षेत्रों में छोड़ देते हैं, जबकि नियमानुसार उन्हें वन विभाग के रेसक्यू केंद्रों में पहुंचाया जाना चाहिए, जहां उनकी नसबंदी की जानी चाहिए। 

वह सोलर बाढ़ पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि सोलर तारों जैसे ही कोई जानवर टकराता है, तो उसे हल्का झटका लगता है, लेकिन इसके साथ ही सोलर फेंसिंग का फ्यूज भी उड़ जाता है, जब तक फ्यूज जोड़ा जाता है, तब तक जानवर खेतों में घुस जाते हैं। इसके अलावा सरकार की ओर से जिन सोलर फेंसिंग पर सब्सिडी दी जाती है, वो बाजार कीमतों के मुकाबले काफी महंगा मिलती हैं। 

जंगल व वन पंचायतों के बीच में काम कर रही लोक प्रबंध विकास संस्था, अल्मोड़ा के संयोजक ईश्वर जोशी कहते हैं कि बंदरों की नसबंदी की प्रक्रिया भी काफी विवादित है। लोगों की शिकायत पर बंदर पकड़ कर नसबंदी के लिए कर्मचारी ले जाते हैं। तय नियम के मुताबिक नसबंदी के बाद उन्हें वहीं छोड़ा जाना चाहिए, जहां बंदरों को पकड़ा गया है, लेकिन कर्मचारी रेस्क्यू सेंटर से दूसरे बंदर लाकर वापस छोड़ देते हैं। जिन बंदरों की नसबंदी हो चुकी होती है, 

उनकी पहचान के लिए कोई निशान भी नहीं लगाया जाता। ऐसे में, कर्मचारी उन बंदरों को भी पकड़ कर रेस्क्यू सेंटर में पहुंचा देते हैं, जो पैसे की बर्बादी से ज्यादा कुछ नहीं है। अपने अनुभाव के आधार पर जोशी सुझाव देते हैं कि हर जिले में चार से पांच किलोमीटर के वन क्षेत्र को चिन्हित कर वहां ऊँची तारबंदी की जानी चाहिए, ताकि जंगली जानवरों को उसी क्षेत्र में सीमित रखा जा सके। जंगलों से बाहर भटक रहे जानवरों को पकड़कर इन सुरक्षित क्षेत्रों में रखा जाए और उनके भोजन की समुचित व्यवस्था भी की जाए। वर्तमान में जानवरों को पकड़ने या उनकी नसबंदी पर जितना खर्च किया जा रहा है, उसकी तुलना में यह व्यवस्था अधिक किफायती सिद्ध हो सकती है।

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