जलवायु परिवर्तन: सूने पड़े मलिहाबाद के आम बागान, घटती पैदावार व बढ़ती लागत से किसान बेहाल

मौसम के बिगड़े चक्र, कीट-रोगों की बढ़ती मार और रसायनों पर बढ़ती निर्भरता से मलिहाबाद के आम बागान अब पहले जैसे नहीं दिखते
उत्तर प्रदेश के मलिहाबाद में आम के पेड़। फोटो: देविंद्र सिंह
उत्तर प्रदेश के मलिहाबाद में आम के पेड़। फोटो: देविंद्र सिंह
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सुबह का वक्त है। हल्की धूप आम के पेड़ों की पत्तियों से छनकर जमीन पर गिर रही है, लेकिन इस खूबसूरत दृश्य के पीछे एक गहरी चिंता छिपी हुई है। राजकुमार सिंह अपने बाग के बीच खड़े हैं, उनकी नजर बार-बार उन डालियों पर जाती है, जहां कुछ दिन पहले तक बौरों की भरमार थी। आज वही डालियां सूनी लग रही हैं। हवा के हर झोंके के साथ जैसे उनकी उम्मीदें भी बिखर गई हों। कहते हैं, “इस बार भी शायद कुछ खास नहीं होगा…।”

उत्तर प्रदेश के मलिहाबाद में पिछले कई वर्षों से आम की बागवानी कर रहे राजकुमार सिंह के लिए आम सिर्फ एक फसल नहीं है, यह उनकी पहचान है, उनका जीवन है, उनकी पीढ़ियों की मेहनत का नतीजा है,, लेकिन इस बार मौसम ने फिर से उनके भरोसे को तोड़ दिया। शुरुआत में बौर अच्छे आए थे, घने, मजबूत, उम्मीद से भरे हुए। मगर कुछ ही दिनों पहले आई आंधी और बारिश ने आधे से ज़्यादा बौर गिरा दिए।

वे पेड़ों की ओर देखते हुए कहते हैं, “एक रात की बारिश और तूफान… और सब खत्म, हम लोग साल भर इंतज़ार करते हैं, और मौसम एक झटके में सब ले जाता है।”

राजकुमार सिंह अकेले नहीं हैं। लखनऊ से करीब 33 किलोमीटर दूर माल ब्लॉक के अमलौली गाँव से लेकर पूरे मलिहाबाद क्षेत्र तक यही कहानी बार-बार दोहराई जा रही है। हर किसान के चेहरे पर चिंता की लकीरें हैं, हर बाग में उम्मीद और निराशा की मिली-जुली तस्वीर दिखाई देती है।

मलिहाबाद, जिसे कभी आमों का गढ़ कहा जाता था, आज जलवायु परिवर्तन की मार झेल रहा है। यहां के किसान अब मौसम के भरोसे नहीं रह गए हैं, क्योंकि मौसम अब भरोसेमंद नहीं रहा।

मौसम की मार सिर्फ उत्पादन तक सीमित नहीं है। इसका असर किसानों की जेब पर भी साफ दिखाई दे रहा है।

राजकुमार कहते हैं, “खर्च लगातार बढ़ रहा है। दवाइयां महंगी हो गई हैं, मजदूरी बढ़ गई है, पानी के लिए भी ज्यादा खर्च करना पड़ता है। लेकिन आमदनी? वो कम होती जा रही है।”

जब फसल सही रहती है तो एक एकड़ में लगभग पांच सौ कैरेट (एक कैरेट में 20-25 किलो आम) आम का उत्पादन हो जाता है, लेकिन पिछले कुछ साल में 400-350 कैरेट आम का उत्पादन ही हो पाता है, अगर खर्च की बात करें तो सिंचाई और दवाई में लगभग 25 हज़ार का का खर्च हो जाता है, पहले जहां एक दो पानी ही लगता था, अब चार से पांच सिचाई करनी पड़ती है।

देश के कुल आम उत्पादन में उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी लगभग 34% है। मलिहाबाद, माल और काकोरी जैसे इलाकों में फैले करीब 11,500 हेक्टेयर में आम की खेती होती है।

रसायनों का सहारा

मलिहाबादी दशहरी आम को जीआई टैग भी मिला हुआ है, जो इसकी विशिष्टता का प्रमाण है। लेकिन उत्पादन बचाने के लिए किसानों को रसायनों का सहारा लेना पड़ रहा हैं। ऐसा ही एक रसायन है पैक्लोब्यूट्राजोल, जिसे किसान ‘कल्टार’ के नाम से जानते हैं। इसका इस्तेमाल पेड़ों में फूल लाने के लिए किया जाता है। यह रसायन आम के पेड़ों के प्राकृतिक चक्र, जिसे “अल्टरनेट बेयरिंग” कहते हैं को तोड़ देता है। आमतौर पर आम के पेड़ एक साल ज्यादा फल देते हैं और अगले साल कम। लेकिन कल्टार के इस्तेमाल से हर साल फूल आने लगते हैं, जिससे उत्पादन स्थिर रखने की कोशिश की जाती है।

नबीपनाह गांव के किसान महेंद्र सिंह भी अब इस रास्ते पर चल पड़े हैं। उनकी पांच बीघा की बाग है, लेकिन लगातार घटते उत्पादन ने उन्हें मजबूर कर दिया।

वैज्ञानिक इस बढ़ते रासायनिक उपयोग को लेकर चिंतित हैं। उनका कहना है कि अगर इन रसायनों का इस्तेमाल सही तरीके और सीमित मात्रा में न किया जाए, तो यह लंबे समय में पेड़ों को नुकसान पहुंचा सकता है। पेड़ों की वृद्धि रुक सकती है, उनकी उम्र कम हो सकती है और वे कमजोर हो सकते हैं।

केन्द्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक डॉ मनीष मिश्रा कहते हैं,  “किसान हर साल उत्पादन चाहते हैं, लेकिन प्रकृति का अपना चक्र होता है। अगर हम उसे जबरदस्ती बदलने की कोशिश करेंगे, तो उसका असर जरूर पड़ेगा।”

मौसम में बदलाव का असर सिर्फ फूलों और फलों तक सीमित नहीं है। इससे कीट और रोग भी तेजी से बढ़ रहे हैं। पहले जहां एक या दो बार बाग की धुलाई करनी पड़ती थी, अब चार से पांच बार करनी पड़ रही है। इसका सीधा असर लागत पर पड़ता है।

किसानों का कहना है कि अब उन्हें हर समय चौकन्ना रहना पड़ता है, कभी कीटों का हमला, कभी बीमारी, कभी मौसम की मार। मलिहाबाद के मशहूर आम उत्पादक और पद्मश्री से सम्मानित कलीमुल्लाह खान भी इस बदलते हालात से बेहद चिंतित हैं।

वे कहते हैं, “मलिहाबाद में आम का भविष्य कमजोर होता जा रहा है। हमारे बचपन में यहां दवाओं का नाम तक नहीं था। पेड़ खुले होते थे, हवा चलती थी, धूप मिलती थी और फल इतने लगते थे कि लोग मिसाल देते थे।”

कलीमुल्लाह खान की चिंता का एक और कारण है, पेड़ों की बढ़ती संख्या और उनका घनत्व। वे कहते हैं, “पहले यह फल पट्टी थी, अब वन पट्टी बनती जा रही है। पेड़ इतने घने हो गए हैं कि वे एक-दूसरे से लड़ने लगे हैं।”

उनके अनुसार, जब पेड़ों को पर्याप्त जगह नहीं मिलती, तो वे सही तरीके से विकसित नहीं हो पाते। इससे फल भी कम लगते हैं।

कलीमुल्लाह खान की एक और बात बेहद अहम है, प्रकृति के संतुलन को समझना। वे कहते हैं, “कुछ कीड़े ऐसे होते हैं, जो हमारे दुश्मन नहीं, बल्कि दोस्त होते हैं। वे फूलों को फल बनने में मदद करते हैं। लेकिन हम उन्हें भी मार देते हैं, क्योंकि हमें लगता है कि हर कीड़ा नुकसान करता है।”

यह अंधाधुंध कीटनाशकों के इस्तेमाल का नतीजा है, जो प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ रहा है।

मौसम में बदलाव को लेकर वे कहते हैं, “पहले नवंबर-दिसंबर में ठंड पड़ती थी। अब ठंड जनवरी-फरवरी में आती है। आम एक गर्मी का फल है, उसे ठंड में फूल चाहिए और गर्मी में फल बनना चाहिए। लेकिन जब मौसम का समय ही बदल जाएगा, तो फसल कैसे सही होगी?”

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